29 अगस्त 2026
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नमो भारत कॉरिडोर को मिलेगी 110 मेगावॉट सौर ऊर्जा, बिजली की 60% जरूरत होगी पूरी

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नमो भारत कॉरिडोर को मिलेगी 110 मेगावॉट सौर ऊर्जा, बिजली की 60% जरूरत होगी पूरी

सारांश

दिल्ली-मेरठ नमो भारत कॉरिडोर अब सिर्फ तेज़ नहीं, बल्कि हरित भी होगा। ₹450 करोड़ की लागत से जालौन में बनने वाला 110 मेगावॉट का सोलर प्लांट कॉरिडोर की 60% बिजली जरूरत पूरी करेगा, सालाना 1.77 लाख टन CO₂ बचाएगा और 25 वर्षों तक बिजली लागत स्थिर रखेगा।

मुख्य बातें

एनसीआरटीसी ने एनएनआरएल के साथ 110 मेगावॉट कैप्टिव सोलर पावर प्लांट के लिए पावर परचेज एग्रीमेंट (पीपीए) पर हस्ताक्षर किए।
परियोजना उत्तर प्रदेश के जालौन में विकसित होगी; अनुमानित लागत ₹450 करोड़ , फंडिंग 80:20 डेट-इक्विटी मॉडल पर।
सौर ऊर्जा से कॉरिडोर की 60% बिजली जरूरत पूरी होगी और परिचालन बिजली खर्च में 25% तक कमी का अनुमान।
पीपीए की अवधि 25 वर्ष ; परियोजना अगले 24 महीनों में परिचालित होने का लक्ष्य।
सालाना करीब 1.77 लाख टन CO₂ उत्सर्जन में कमी आने का अनुमान।
28 अगस्त 2026 को रक्षाबंधन पर कॉरिडोर ने रिकॉर्ड 1.68 लाख दैनिक यात्री दर्ज किए; कुल यात्राएँ 4 करोड़ पार।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र परिवहन निगम (एनसीआरटीसी) ने दिल्ली-मेरठ नमो भारत कॉरिडोर को हरित ऊर्जा से संचालित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए एनएनआरएल (एनआईआरएल एनसीआरटीसी रिन्यूएबल्स लिमिटेड) के साथ 110 मेगावॉट के कैप्टिव सोलर पावर प्लांट के लिए पावर परचेज एग्रीमेंट (पीपीए) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते के तहत कॉरिडोर की कुल बिजली आवश्यकता का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा सौर ऊर्जा से पूरा किया जाएगा। यह परियोजना देश की आरआरटीएस और मेट्रो परिवहन प्रणालियों के लिए अपनी तरह की पहली कैप्टिव सोलर पहलों में से एक मानी जा रही है।

समझौते का विवरण और प्रमुख पक्ष

इस पीपीए पर हस्ताक्षर समारोह में एनसीआरटीसी के प्रबंध निदेशक शलभ गोयल, एनआईआरएल के निदेशक वित्त एवं सीएमडी डेजिगनेट डॉ. प्रसन्ना कुमार आचार्य, एनसीआरटीसी की निदेशक वित्त नमिता मेहरोत्रा और निदेशक इलेक्ट्रिकल्स एंड रोलिंग स्टॉक महेंद्र कुमार सहित दोनों संस्थाओं के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे। एनएनआरएल, एनसीआरटीसी और एनआईआरएल का संयुक्त उपक्रम है, जबकि एनआईआरएल, नेवेली लिग्नाइट कॉरपोरेशन (एनएलसी) की 100 प्रतिशत सहायक कंपनी है।

परियोजना की लागत और संरचना

लगभग ₹450 करोड़ की अनुमानित लागत वाली यह परियोजना उत्तर प्रदेश के जालौन शहर में विकसित की जाएगी। इसे 80:20 डेट-इक्विटी फंडिंग मॉडल के तहत तैयार किया जाएगा और उत्तर प्रदेश सोलर एनर्जी पॉलिसी का लाभ भी लिया जाएगा। सोलर प्लांट से उत्पन्न बिजली को उत्तर प्रदेश स्टेट ग्रिड के माध्यम से उत्तर प्रदेश और दिल्ली में स्थित एनसीआरटीसी के रिसीविंग सबस्टेशनों तक पहुँचाया जाएगा। परियोजना को अगले 24 महीनों के भीतर परिचालित करने का लक्ष्य है।

आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा लाभ

दिल्ली-मेरठ नमो भारत कॉरिडोर के कुल परिचालन खर्च में बिजली की हिस्सेदारी करीब 30 से 35 प्रतिशत है। अधिकारियों के अनुसार, परियोजना के चालू होने के बाद बिजली खर्च में लगभग 25 प्रतिशत तक की कमी आने का अनुमान है। पीपीए के तहत एनसीआरटीसी 25 वर्षों की अवधि तक तय टैरिफ पर सोलर प्लांट से बिजली खरीदेगा, जिससे बिजली की कीमतों में उतार-चढ़ाव का कॉरिडोर संचालन पर पड़ने वाला असर कम होगा और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी। गौरतलब है कि यह ढाँचा परंपरागत ग्रिड-निर्भरता से एक सुविचारित विदाई है।

पर्यावरणीय प्रभाव

अनुमानों के अनुसार, पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के स्थान पर सौर ऊर्जा के उपयोग से प्रतिवर्ष करीब 1.77 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी लाई जा सकेगी। इसके साथ ही नाइट्रोजन ऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड जैसे प्रदूषकों के उत्सर्जन में भी कमी आने की उम्मीद है। यह ऐसे समय में आया है जब दिल्ली-एनसीआर वायु प्रदूषण की गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है।

नमो भारत कॉरिडोर की बढ़ती लोकप्रियता

वर्तमान में दिल्ली-मेरठ नमो भारत कॉरिडोर पर प्रतिदिन करीब एक लाख यात्री सफर कर रहे हैं और कुल यात्री यात्राओं का आँकड़ा 4 करोड़ से अधिक हो चुका है। 28 अगस्त 2026 को रक्षाबंधन के अवसर पर कॉरिडोर ने अब तक की सर्वाधिक दैनिक यात्री संख्या दर्ज की, जब 1.68 लाख से अधिक यात्रियों ने नमो भारत ट्रेनों में सफर किया। फरवरी 2026 में पूरे कॉरिडोर पर परिचालन शुरू होने के बाद से यात्रियों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस रैपिड रेल प्रणाली को सुशासन का उदाहरण बताते हुए इसके समय पर पूरा होने और बेहतर सेवा की सराहना की है।

एनसीआरटीसी का मानना है कि यह सोलर परियोजना आने वाले समय में अन्य शहरी और क्षेत्रीय ट्रांजिट नेटवर्क के लिए भी एक अनुकरणीय मॉडल बन सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी क्रियान्वयन की होगी — भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की बड़ी नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएँ प्रायः समय-सीमा और ग्रिड-एकीकरण की अड़चनों से जूझती हैं। 24 महीने की परिचालन समयसीमा महत्वाकांक्षी है, खासकर जब बिजली को जालौन से दिल्ली-एनसीआर के सबस्टेशनों तक राज्य ग्रिड के जरिए पहुँचाना हो। यह भी विचारणीय है कि 25 साल का तय टैरिफ लंबे समय में बाज़ार दरों के सापेक्ष फायदेमंद रहेगा या नहीं — यह सौर ऊर्जा की तेज़ी से गिरती लागत के संदर्भ में एक खुला प्रश्न है। फिर भी, आरआरटीएस प्रणाली में कैप्टिव सोलर का यह प्रयोग शहरी परिवहन के डीकार्बनाइज़ेशन की दिशा में एक सुविचारित और दीर्घदृष्टि वाला कदम है।
RashtraPress
29 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नमो भारत कॉरिडोर के लिए 110 मेगावॉट सोलर पावर परियोजना क्या है?
यह एनसीआरटीसी और एनएनआरएल के बीच हस्ताक्षरित पावर परचेज एग्रीमेंट (पीपीए) के तहत उत्तर प्रदेश के जालौन में विकसित होने वाला 110 मेगावॉट का कैप्टिव सोलर पावर प्लांट है। इसकी अनुमानित लागत ₹450 करोड़ है और यह दिल्ली-मेरठ नमो भारत कॉरिडोर की 60% बिजली जरूरत पूरी करेगा।
यह सोलर परियोजना कब तक चालू होगी?
अधिकारियों के अनुसार, परियोजना को अगले 24 महीनों के भीतर परिचालित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए उत्तर प्रदेश सोलर एनर्जी पॉलिसी का भी लाभ लिया जा रहा है।
इस परियोजना से नमो भारत कॉरिडोर को आर्थिक फायदा क्या होगा?
परियोजना के चालू होने के बाद बिजली खर्च में लगभग 25 प्रतिशत तक की कमी आने का अनुमान है। 25 वर्षों के तय टैरिफ वाले पीपीए से बिजली की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर कम होगा और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।
इस सोलर परियोजना का पर्यावरणीय लाभ क्या होगा?
अनुमानों के अनुसार, इस परियोजना से प्रतिवर्ष करीब 1.77 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी आएगी। इसके अलावा नाइट्रोजन ऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड जैसे प्रदूषकों के उत्सर्जन में भी कमी आने की उम्मीद है।
एनएनआरएल क्या है और इसका नमो भारत परियोजना से क्या संबंध है?
एनएनआरएल (एनआईआरएल एनसीआरटीसी रिन्यूएबल्स लिमिटेड) एनसीआरटीसी और एनआईआरएल का संयुक्त उपक्रम है। एनआईआरएल, नेवेली लिग्नाइट कॉरपोरेशन (एनएलसी) की 100 प्रतिशत सहायक कंपनी है। यही एनएनआरएल इस 110 मेगावॉट सोलर प्लांट को विकसित और संचालित करेगी।
राष्ट्र प्रेस
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