पाक-अफगान सीमा पर सीजफायर संकट: कुनार हमले में 4 मौतें, 70 घायल; क्षेत्रीय अस्थिरता की चेतावनी
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच मार्च 2026 में हुआ संघर्ष-विराम (सीजफायर) गंभीर खतरे में पड़ गया है। अप्रैल के अंत में पाकिस्तानी सेना द्वारा अफगान क्षेत्र में किए गए हमलों में 4 आम नागरिकों की मौत हो गई और 70 से अधिक लोग घायल हुए, जिनमें महिलाएँ, बच्चे और छात्र शामिल हैं। काबुल स्थित फ्रीलांस शोधकर्ता और पत्रकार एस.एस. अहमद ने 'अफगान डायस्पोरा नेटवर्क' के लिए लिखी अपनी रिपोर्ट में इन घटनाओं का विस्तृत विवरण दिया है।
मुख्य घटनाक्रम
अहमद के अनुसार, पाकिस्तानी सेना के हमलों में कुनार प्रांत में रिहायशी इलाके, एक फ्यूल स्टेशन, एक नशा मुक्ति केंद्र और कुनार यूनिवर्सिटी के छात्र हॉस्टल को निशाना बनाया गया। यह तनाव अफगानिस्तान के कंधार प्रांत के स्पिन बोल्डक के पास हुई एक गोलीबारी के बाद भड़का, जिसमें एक बच्चे की मौत हो गई थी। दोनों पक्ष इस घटना के लिए एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं।
तालिबान ने पाकिस्तानी हमले को 'माफ न किए जा सकने वाला युद्ध अपराध' करार दिया और आरोप लगाया कि जान-बूझकर नागरिक ठिकानों को निशाना बनाया गया। वहीं, पाकिस्तान ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसकी सेना ने यूनिवर्सिटी पर कोई हमला नहीं किया, बल्कि डूरंड रेखा के पास आतंकियों के खतरे का जवाब दे रही थी।
मानवीय संकट की गहराती छाया
अहमद ने रिपोर्ट में बताया कि फरवरी 2026 से अब तक पूर्वी अफगानिस्तान में 1,00,000 से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं। कुनार और नंगरहार प्रांतों में स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी 19 सुविधाएँ आंशिक रूप से या पूरी तरह बंद हो गई हैं। इसके अलावा, 13,000 से अधिक छात्रों की पढ़ाई बाधित हो गई है, क्योंकि शिक्षण संस्थानों पर हमले हुए हैं या उन्हें खाली कराया गया है।
गौरतलब है कि स्कूल, क्लीनिक और पानी की व्यवस्थाएँ या तो क्षतिग्रस्त हो गई हैं या बंद कर दी गई हैं — यह ऐसे समय में हुआ है जब अफगानिस्तान पहले से ही दशकों के संघर्ष की मार झेल रहा है।
क्षेत्रीय मध्यस्थों की भूमिका और चिंताएँ
मार्च में हुए सीजफायर में चीन, तुर्की, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब ने मध्यस्थता की थी। अहमद के अनुसार, ये सभी पक्ष अब स्थिति पर बारीकी से नज़र रख रहे हैं। विशेष रूप से, चीन ने डूरंड रेखा के साथ सुरक्षा स्थिरीकरण में अपनी कूटनीतिक पूंजी लगाई है।
विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि यदि शत्रुता का यह सिलसिला जारी रहा, तो क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाएँ कमज़ोर पड़ सकती हैं और आतंकवाद-रोधी सहयोग में जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
विश्लेषकों की चेतावनी
एक रिपोर्ट के अनुसार, डूरंड रेखा के दोनों ओर होने वाली घटनाओं और आतंकी गतिविधियों से निपटने के लिए किसी विश्वसनीय तंत्र के अभाव में विश्लेषकों ने आगाह किया है कि यह क्षेत्र लंबे समय तक अस्थिरता के दौर में फँस सकता है। अहमद ने ज़ोर देकर कहा कि इन हमलों से अफगानिस्तान का अलगाव और गहरा होता है, और आम नागरिकों को हिंसा के एक नए चक्र का सामना करना पड़ता है — एक ऐसा संघर्ष जो कई सरकारों, गठबंधनों और राजनीतिक युगों से भी अधिक समय से चला आ रहा है।
यह ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नज़र अफगानिस्तान में मानवीय स्थिति पर टिकी है। आने वाले हफ्ते बताएँगे कि मध्यस्थ देश इस नाज़ुक सीजफायर को बचाने में सफल होते हैं या नहीं।