कराची में 30 लाख बंगाली नागरिकता से वंचित, पाक-बांग्लादेश 'भाईचारे' की पोल खुली
सारांश
मुख्य बातें
कराची की मछर कॉलोनी और मूसा कॉलोनी की तंग, खुले नालों वाली झुग्गी बस्तियों में अनुमानित 30 लाख बांग्लादेशी मूल के बंगाली नागरिक बुनियादी दस्तावेज़ों तक से वंचित हैं — और यह विडंबना उस समय और गहरी हो जाती है जब पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच कूटनीतिक नज़दीकियाँ तेज़ी से बढ़ रही हैं। बांग्लादेशी मीडिया संस्थान 'डेली वादा' की एक रिपोर्ट में इस मानवीय संकट को उजागर करते हुए कहा गया है कि इस्लामाबाद का ढाका के प्रति 'भाईचारे का संदेश' तब तक खोखला है, जब तक कराची की झुग्गियों में रहने वाले इन लाखों लोगों की दशा नहीं बदलती।
1971 की विरासत: कौन हैं ये 30 लाख लोग
रिपोर्ट के अनुसार, यह आबादी 1971 के रक्तरंजित विभाजन की सीधी विरासत है। जब पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर स्वतंत्र बांग्लादेश बना, तब लाखों बंगाली पश्चिमी पाकिस्तान — विशेष रूप से कराची के बंदरगाहों और मछली उद्योग से जुड़े इलाकों — में रह गए। समय के साथ उनकी संख्या बढ़ती गई और आज तीन पीढ़ियाँ पाकिस्तान की धरती पर पली-बढ़ी हैं।
रिपोर्ट में कहा गया, 'ये लोग उर्दू बोलते हैं, क्रिकेट मैचों में पाकिस्तानी झंडा लहराते हैं और आर्थिक योगदान देते हैं — फिर भी उन्हें राष्ट्रीय पहचान पत्र तक नहीं दिया जाता।' पाकिस्तानी धरती पर पैदा होने और आधी सदी से अधिक समय से वहाँ रहने के बावजूद सरकार उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करती है।
दस्तावेज़ की कमी: एक अदृश्य दीवार
रिपोर्ट में बताया गया कि राष्ट्रीय पहचान पत्र (CNIC) के बिना ये लोग व्यावहारिक रूप से सरकारी व्यवस्था में अदृश्य हैं। वे न वोट दे सकते हैं, न बैंक खाता खोल सकते हैं, न संपत्ति खरीद सकते हैं और न ही किसी आधिकारिक नौकरी के लिए आवेदन कर सकते हैं।
कराची की बंगाली कॉलोनियों के युवाओं के लिए दस्तावेज़ीकरण की यह कमी एक ऐसी दीवार बन जाती है जिसे पार करना संभव नहीं। रिपोर्ट के अनुसार, इन बच्चों को केवल उनके ऐतिहासिक मूल की वजह से शिक्षा के अधिकार से भी वंचित रखा जा रहा है।
पाक-बांग्लादेश कूटनीतिक सुधार की पृष्ठभूमि
रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2024 के विद्रोह के दौरान शेख हसीना की सरकार के सत्ता से हटने के बाद दोनों देशों के बीच एक दशक से चले आ रहे तनावपूर्ण संबंधों में सुधार आने लगा। पाकिस्तानी राजनयिकों और सैन्य अधिकारियों ने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के साथ संबंध प्रगाढ़ करने की पहल की।
रिपोर्ट में उल्लेख है कि पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री इशाक डार सहित वरिष्ठ नेता ढाका गए और दोनों देशों के बीच खुफिया साझेदारी, सैन्य सहयोग, छात्रवृत्ति कार्यक्रम और व्यापार मार्गों को फिर से शुरू किया गया।
विशेषज्ञ और मीडिया की राय
'डेली वादा' ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा, 'पाकिस्तान एक ओर बांग्लादेश के साथ कूटनीतिक संबंध मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, जबकि दूसरी ओर उनकी अपनी सीमाओं के भीतर रहने वाले लाखों बंगालियों का जीवन बदहाल है।'
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया कि यदि इस्लामाबाद का मौजूदा नेतृत्व वास्तव में ढाका के साथ सच्ची साझेदारी चाहता है, तो वह इन 30 लाख लोगों के अस्तित्व को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। गौरतलब है कि यह मुद्दा नया नहीं है — दशकों से इन समुदायों की स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन भी सवाल उठाते रहे हैं।
आगे क्या होगा
फिलहाल पाकिस्तान सरकार की ओर से इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब तक कराची की इन बस्तियों में रहने वाले बंगाली समुदाय को नागरिकता और दस्तावेज़ीकरण के अधिकार नहीं मिलते, तब तक पाक-बांग्लादेश संबंधों की नई शुरुआत का दावा अधूरा रहेगा।