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कराची में 30 लाख बंगाली नागरिकता से वंचित, पाक-बांग्लादेश 'भाईचारे' की पोल खुली

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कराची में 30 लाख बंगाली नागरिकता से वंचित, पाक-बांग्लादेश 'भाईचारे' की पोल खुली

सारांश

पाकिस्तान बांग्लादेश को भाईचारे का संदेश दे रहा है, लेकिन कराची की झुग्गियों में 30 लाख बंगाली तीन पीढ़ियों से पहचान पत्र तक के लिए तरस रहे हैं। 'डेली वादा' की रिपोर्ट इस विरोधाभास को बेनकाब करती है।

मुख्य बातें

कराची की मछर कॉलोनी और मूसा कॉलोनी में अनुमानित 30 लाख बांग्लादेशी मूल के बंगाली रहते हैं।
इन्हें राष्ट्रीय पहचान पत्र (CNIC) नहीं दिया जाता — वोट, बैंक खाता, संपत्ति और सरकारी नौकरी सभी से वंचित।
यह आबादी 1971 के विभाजन की विरासत है; तीन पीढ़ियाँ पाकिस्तान में पली-बढ़ी हैं।
जुलाई 2024 में शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद पाक-बांग्लादेश संबंधों में सुधार शुरू हुआ।
उपप्रधानमंत्री इशाक डार सहित पाकिस्तानी नेता ढाका गए; सैन्य सहयोग और व्यापार मार्ग फिर शुरू हुए।
बांग्लादेशी मीडिया 'डेली वादा' ने रिपोर्ट में कहा — बंगालियों की दुर्दशा दूर किए बिना भाईचारे का दावा खोखला है।

कराची की मछर कॉलोनी और मूसा कॉलोनी की तंग, खुले नालों वाली झुग्गी बस्तियों में अनुमानित 30 लाख बांग्लादेशी मूल के बंगाली नागरिक बुनियादी दस्तावेज़ों तक से वंचित हैं — और यह विडंबना उस समय और गहरी हो जाती है जब पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच कूटनीतिक नज़दीकियाँ तेज़ी से बढ़ रही हैं। बांग्लादेशी मीडिया संस्थान 'डेली वादा' की एक रिपोर्ट में इस मानवीय संकट को उजागर करते हुए कहा गया है कि इस्लामाबाद का ढाका के प्रति 'भाईचारे का संदेश' तब तक खोखला है, जब तक कराची की झुग्गियों में रहने वाले इन लाखों लोगों की दशा नहीं बदलती।

1971 की विरासत: कौन हैं ये 30 लाख लोग

रिपोर्ट के अनुसार, यह आबादी 1971 के रक्तरंजित विभाजन की सीधी विरासत है। जब पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर स्वतंत्र बांग्लादेश बना, तब लाखों बंगाली पश्चिमी पाकिस्तान — विशेष रूप से कराची के बंदरगाहों और मछली उद्योग से जुड़े इलाकों — में रह गए। समय के साथ उनकी संख्या बढ़ती गई और आज तीन पीढ़ियाँ पाकिस्तान की धरती पर पली-बढ़ी हैं।

रिपोर्ट में कहा गया, 'ये लोग उर्दू बोलते हैं, क्रिकेट मैचों में पाकिस्तानी झंडा लहराते हैं और आर्थिक योगदान देते हैं — फिर भी उन्हें राष्ट्रीय पहचान पत्र तक नहीं दिया जाता।' पाकिस्तानी धरती पर पैदा होने और आधी सदी से अधिक समय से वहाँ रहने के बावजूद सरकार उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करती है।

दस्तावेज़ की कमी: एक अदृश्य दीवार

रिपोर्ट में बताया गया कि राष्ट्रीय पहचान पत्र (CNIC) के बिना ये लोग व्यावहारिक रूप से सरकारी व्यवस्था में अदृश्य हैं। वे न वोट दे सकते हैं, न बैंक खाता खोल सकते हैं, न संपत्ति खरीद सकते हैं और न ही किसी आधिकारिक नौकरी के लिए आवेदन कर सकते हैं।

कराची की बंगाली कॉलोनियों के युवाओं के लिए दस्तावेज़ीकरण की यह कमी एक ऐसी दीवार बन जाती है जिसे पार करना संभव नहीं। रिपोर्ट के अनुसार, इन बच्चों को केवल उनके ऐतिहासिक मूल की वजह से शिक्षा के अधिकार से भी वंचित रखा जा रहा है।

पाक-बांग्लादेश कूटनीतिक सुधार की पृष्ठभूमि

रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2024 के विद्रोह के दौरान शेख हसीना की सरकार के सत्ता से हटने के बाद दोनों देशों के बीच एक दशक से चले आ रहे तनावपूर्ण संबंधों में सुधार आने लगा। पाकिस्तानी राजनयिकों और सैन्य अधिकारियों ने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के साथ संबंध प्रगाढ़ करने की पहल की।

रिपोर्ट में उल्लेख है कि पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री इशाक डार सहित वरिष्ठ नेता ढाका गए और दोनों देशों के बीच खुफिया साझेदारी, सैन्य सहयोग, छात्रवृत्ति कार्यक्रम और व्यापार मार्गों को फिर से शुरू किया गया।

विशेषज्ञ और मीडिया की राय

'डेली वादा' ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा, 'पाकिस्तान एक ओर बांग्लादेश के साथ कूटनीतिक संबंध मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, जबकि दूसरी ओर उनकी अपनी सीमाओं के भीतर रहने वाले लाखों बंगालियों का जीवन बदहाल है।'

रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया कि यदि इस्लामाबाद का मौजूदा नेतृत्व वास्तव में ढाका के साथ सच्ची साझेदारी चाहता है, तो वह इन 30 लाख लोगों के अस्तित्व को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। गौरतलब है कि यह मुद्दा नया नहीं है — दशकों से इन समुदायों की स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन भी सवाल उठाते रहे हैं।

आगे क्या होगा

फिलहाल पाकिस्तान सरकार की ओर से इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब तक कराची की इन बस्तियों में रहने वाले बंगाली समुदाय को नागरिकता और दस्तावेज़ीकरण के अधिकार नहीं मिलते, तब तक पाक-बांग्लादेश संबंधों की नई शुरुआत का दावा अधूरा रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

हित-आधारित अधिक लगता है। कराची के 30 लाख बंगालियों की अनदेखी दशकों पुरानी है और किसी एक सरकार की नहीं, बल्कि पाकिस्तान की संस्थागत उदासीनता की देन है। असली सवाल यह है कि क्या बांग्लादेश की अंतरिम सरकार इस मुद्दे को द्विपक्षीय वार्ता में उठाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाएगी, या सिर्फ व्यापार और सुरक्षा सहयोग तक सीमित रहेगी। बिना इस मानवीय प्रश्न को केंद्र में रखे, यह 'नई शुरुआत' भी पुरानी कूटनीतिक रस्मअदायगी बनकर रह जाएगी।
RashtraPress
4 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कराची में रहने वाले बंगाली कौन हैं और वे वहाँ कैसे पहुँचे?
ये लोग 1971 के विभाजन की विरासत हैं, जब पूर्वी पाकिस्तान स्वतंत्र बांग्लादेश बना और लाखों बंगाली कराची के बंदरगाहों व मछली उद्योग से जुड़े इलाकों में रह गए। आज उनकी तीन पीढ़ियाँ पाकिस्तान में पली-बढ़ी हैं और अनुमानित संख्या 30 लाख बताई जाती है।
इन बंगालियों को राष्ट्रीय पहचान पत्र क्यों नहीं मिलता?
रिपोर्टों के अनुसार पाकिस्तानी सरकार उन्हें बांग्लादेशी मूल का मानकर CNIC देने से इनकार करती है, भले ही वे पाकिस्तान में पैदा हुए हों। इस दस्तावेज़ के बिना वे वोट, बैंक खाता, संपत्ति और सरकारी नौकरी — किसी से भी वंचित रहते हैं।
पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच संबंध कब और क्यों सुधरे?
जुलाई 2024 में शेख हसीना की सरकार के सत्ता से हटने के बाद दोनों देशों के बीच एक दशक से चले आ रहे तनाव में कमी आई। पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री इशाक डार सहित वरिष्ठ नेता ढाका गए और खुफिया साझेदारी, सैन्य सहयोग तथा व्यापार मार्ग फिर से शुरू हुए।
बांग्लादेशी मीडिया ने इस मुद्दे पर क्या कहा?
'डेली वादा' ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि पाकिस्तान एक ओर बांग्लादेश के साथ कूटनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है, दूसरी ओर अपनी सीमाओं में रहने वाले लाखों बंगालियों की दुर्दशा पर चुप है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जब तक इन बच्चों को शिक्षा का अधिकार नहीं मिलता, तब तक भाईचारे का संदेश खोखला है।
इस मुद्दे का पाक-बांग्लादेश संबंधों पर क्या असर पड़ सकता है?
विश्लेषकों के अनुसार यदि पाकिस्तान इन 30 लाख बंगालियों की नागरिकता और दस्तावेज़ीकरण की समस्या को नहीं सुलझाता, तो दोनों देशों के बीच नई कूटनीतिक शुरुआत की विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहेंगे। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार इस मुद्दे को द्विपक्षीय वार्ता में उठाती है या नहीं, यह देखना अहम होगा।
राष्ट्र प्रेस
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