कलकत्ता हाईकोर्ट: जज सुव्रा घोष ने पूर्व मंत्री सुजीत बोस की जमानत याचिका से खुद को किया अलग, वकील के चैंबर-विजिट पर उठे सवाल
सारांश
मुख्य बातें
कलकत्ता हाईकोर्ट की सिंगल बेंच की जज जस्टिस सुव्रा घोष ने बुधवार, 19 अगस्त 2026 को पश्चिम बंगाल के पूर्व अग्निशमन सेवा मंत्री सुजीत बोस की जमानत याचिका पर फैसला सुनाने से खुद को अलग कर लिया। यह याचिका प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा नगर पालिका नौकरी घोटाले में दर्ज मामले से जुड़ी है। इस कदम की वजह एक ऐसी घटना बनी जिसे जस्टिस घोष ने स्वयं 'बेहद दुर्भाग्यपूर्ण' करार दिया।
चैंबर-विजिट की घटना और अलगाव का फैसला
जस्टिस सुव्रा घोष ने अदालत में स्पष्ट किया कि मंगलवार, 18 अगस्त को पूर्व मंत्री के एक वकील उनके चैंबर में तब पहुँचे जब वह वहाँ मौजूद नहीं थीं। उस वकील ने उनके पर्सनल सेक्रेटरी से कहा कि चैंबर से इस केस से संबंधित एक फाइल उन्हें सौंप दी जाए। इस असाधारण घटना की जानकारी जस्टिस घोष ने तत्काल कलकत्ता हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तपोब्रत चक्रवर्ती को दी और इसके बाद खुद को मामले से अलग करने का निर्णय लिया।
सुनवाई की स्थिति और अगला कदम
गौरतलब है कि इस जमानत याचिका पर सुनवाई 17 अगस्त को ही पूरी हो चुकी थी और जस्टिस घोष ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। लेकिन चैंबर-विजिट की घटना के बाद उन्होंने यह कदम उठाया। अब यह मामला कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तपोब्रत चक्रवर्ती के पास लंबित है, जो यह तय करेंगे कि याचिका किस नई बेंच को भेजी जाएगी।
सुजीत बोस और नगर पालिका नौकरी घोटाला
सुजीत बोस पहले तृणमूल कांग्रेस (TMC) के विधायक और ममता बनर्जी सरकार में अग्निशमन सेवा मंत्री रह चुके हैं। ईडी का आरोप है कि उन्होंने साउथ दमदम नगर पालिका में नौकरी के इच्छुक लोगों के नामों की अवैध सिफारिश की। ट्रायल कोर्ट में ईडी ने दावा किया था कि इस सूची में करीब 150 नौकरी चाहने वालों के नाम शामिल थे।
ईडी के अनुसार भ्रष्टाचार से अर्जित राशि सुजीत बोस और उनके परिवार के सदस्यों के बैंक खातों में जमा की गई थी। गिरफ्तारी से पहले एजेंसी ने उनसे कई दौर में पूछताछ की थी।
गिरफ्तारी और न्यायिक हिरासत
ईडी ने सुजीत बोस को 11 मई 2026 को गिरफ्तार किया था। तब से वह न्यायिक हिरासत में हैं। उन्होंने जमानत के लिए जस्टिस सुव्रा घोष की सिंगल बेंच में याचिका दायर की थी, जो अब नई बेंच को स्थानांतरित होगी।
न्यायिक प्रक्रिया पर असर
यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब पश्चिम बंगाल में ईडी की जाँच से जुड़े कई राजनीतिक मामले अदालतों में विचाराधीन हैं। किसी जज का सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रखने और फिर खुद को अलग करने का यह असामान्य कदम न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। अब सभी की निगाहें कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के उस फैसले पर हैं जो यह तय करेगा कि इस संवेदनशील याचिका की अगली सुनवाई किस बेंच में होगी।