पालि-प्राकृत सेंटर ऑफ एक्सीलेंस मगध में हो: संतोष सुमन ने केंद्र सरकार से की पुनर्विचार की माँग
सारांश
मुख्य बातें
बिहार सरकार में लघु जल संसाधन मंत्री और हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संतोष कुमार सुमन ने 6 अक्टूबर 2026 को पालि और प्राकृत भाषाओं के अध्ययन, शोध एवं संरक्षण के लिए बिहार के मगध क्षेत्र में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित करने की माँग उठाई है। उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय से इस संबंध में पुनर्विचार का आग्रह किया है, यह तर्क देते हुए कि इन भाषाओं की ऐतिहासिक जड़ें ओडिशा या गुजरात से कहीं अधिक गहरी मगध की भूमि से जुड़ी हैं।
मौजूदा निर्णय और विवाद
शिक्षा मंत्रालय के 1 अक्टूबर 2026 के कार्यालय ज्ञापन के अनुसार शास्त्रीय भाषाओं के लिए पाँच सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित किए जाने हैं। इस निर्णय के तहत पालि के लिए सेंटर केंद्रीय विश्वविद्यालय, ओडिशा में और प्राकृत के लिए सेंटर केंद्रीय विश्वविद्यालय, गुजरात में स्थापित करने की घोषणा की गई है। डॉ. सुमन ने इस पहल को महत्वपूर्ण बताते हुए भी इसके भौगोलिक आवंटन पर आपत्ति जताई है।
मगध की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दावेदारी
डॉ. सुमन के अनुसार पालि और प्राकृत की विरासत केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं है — इनकी गहरी जड़ें मगध की उस भूमि में हैं जिसने बौद्ध, जैन और प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा को विश्वव्यापी स्तर पर प्रसारित किया। उन्होंने नालंदा, राजगीर, गया, पाटलिपुत्र और वैशाली जैसे ऐतिहासिक स्थलों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन स्थानों की विरासत ही मगध और बिहार की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करती है।
गौरतलब है कि भगवान बुद्ध ने अपने उपदेश मुख्यतः पालि भाषा में दिए थे और मगध उनके ज्ञानोदय का केंद्र रहा है। ऐसे में इस भाषा के अध्ययन केंद्र को उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से दूर स्थापित करना, कई विद्वानों की दृष्टि में अकादमिक रूप से असंगत माना जा सकता है।
प्रस्तावित संस्थागत आधार
डॉ. सुमन ने सुझाया कि दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय अथवा नालंदा विश्वविद्यालय जैसे संस्थान पालि-प्राकृत सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के लिए ठोस अकादमिक आधार बन सकते हैं। उनका मानना है कि ऐसे केंद्र से पांडुलिपियों का संरक्षण, डिजिटाइजेशन और अनुवाद कार्य को नई दिशा मिलेगी तथा नई पीढ़ी प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ सकेगी।
केंद्र सरकार से आग्रह
डॉ. सुमन ने स्पष्ट कहा कि मगध की धरती को उसकी भाषायी और सांस्कृतिक विरासत के अनुरूप यह अकादमिक सम्मान मिलना प्राचीन ज्ञान परंपरा के संरक्षण की दिशा में सार्थक कदम होगा। यह माँग ऐसे समय में आई है जब केंद्र सरकार शास्त्रीय भाषाओं के पुनरुद्धार को नई शिक्षा नीति के तहत प्राथमिकता दे रही है। बिहार, जो पहले ही नालंदा विश्वविद्यालय के पुनरुद्धार का केंद्र बन चुका है, इस अकादमिक पहल में अपनी स्वाभाविक भागीदारी का दावा प्रस्तुत करता दिख रहा है।