25 अगस्त 2026
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मैसूर में जनजातीय भाषा संरक्षण सम्मेलन: दुर्गादास उइके ने 3 दिवसीय कॉन्क्लेव में की चर्चाओं की अगुवाई

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मैसूर में जनजातीय भाषा संरक्षण सम्मेलन: दुर्गादास उइके ने 3 दिवसीय कॉन्क्लेव में की चर्चाओं की अगुवाई

सारांश

मैसूर में शुरू हुए तीन दिवसीय राष्ट्रीय कॉन्क्लेव में जनजातीय भाषाओं के संरक्षण और 10 राज्यों में स्वीकृत 11 TFFM संग्रहालयों को जीवंत विरासत केंद्रों में बदलने की रणनीति पर विचार हो रहा है — यह 'विकसित भारत 2047' के तहत आदिवासी पहचान को नीति के केंद्र में लाने का प्रयास है।

मुख्य बातें

जनजातीय मामलों के राज्य मंत्री दुर्गादास उइके ने 24 अगस्त को मैसूर में तीन दिवसीय राष्ट्रीय कॉन्क्लेव की अध्यक्षता की।
कॉन्क्लेव 24-26 अगस्त तक आयोजित; जनजातीय भाषाओं के दस्तावेजीकरण, संरक्षण और पुनरुद्धार पर केंद्रित।
मंत्रालय ने 10 राज्यों में 11 जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों (TFFM) को मंजूरी दी है; 4 का उद्घाटन हो चुका है।
जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (TRI) और राज्य जनजातीय कल्याण विभागों को भाषा संरक्षण नेटवर्क में शामिल किया गया।
यह पहल 'विकसित भारत 2047' रोडमैप और 2016 के स्वतंत्रता दिवस भाषण में व्यक्त प्रधानमंत्री के विजन को आगे बढ़ाती है।

जनजातीय मामलों के राज्य मंत्री दुर्गादास उइके ने 24 अगस्त 2026 को मैसूर में आरंभ हुए तीन दिवसीय राष्ट्रीय कॉन्क्लेव में जनजातीय भाषाओं के दस्तावेजीकरण, संरक्षण और पुनरुद्धार तथा देशभर के जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों (TFFM) को सुदृढ़ करने पर हुई राष्ट्रीय विचार-विमर्श की अध्यक्षता की। जनजातीय मामलों के मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार यह कॉन्क्लेव 24 से 26 अगस्त तक आयोजित किया जा रहा है।

कॉन्क्लेव का उद्देश्य और स्वरूप

यह राष्ट्रीय सम्मेलन नीति-निर्माताओं, भाषाविदों, शोधकर्ताओं, प्रौद्योगिकीविदों और आदिवासी समुदायों के प्रतिनिधियों को एक साझा मंच पर लाता है। मंत्रालय के बयान के अनुसार, इसका प्रमुख लक्ष्य जनजातीय भाषाओं के दस्तावेजीकरण और पुनरुद्धार के लिए एक राष्ट्रीय रोडमैप तैयार करना है, जिसमें समुदाय की प्राथमिकताओं को एजेंडे के केंद्र में रखा जाए।

यह आयोजन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'विकसित भारत 2047' के दृष्टिकोण से प्रेरित है, जिसके तहत भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को पुनर्जीवित करना और समावेशी राष्ट्रीय विकास सुनिश्चित करना प्राथमिक लक्ष्य हैं।

जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों की स्थिति

मंत्रालय ने अब तक 10 राज्यों में 11 जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों (TFFM) को मंजूरी दी है, जिनमें से 4 का उद्घाटन हो चुका है। कॉन्क्लेव में इन संग्रहालयों को समकालीन क्यूरेशन, कहानी कहने की कला और समुदाय-आधारित विरासत प्रतिनिधित्व के जीवंत केंद्रों के रूप में विकसित करने पर एक साझा विजन तैयार किया जाएगा।

गौरतलब है कि यह पहल प्रधानमंत्री के 2016 के स्वतंत्रता दिवस भाषण में साझा किए गए उस विजन को आगे बढ़ाती है, जिसमें भारत की स्वाधीनता संग्राम में आदिवासी समुदायों के योगदान को विशेष रूप से मान्यता दी गई थी।

भाषा संरक्षण की जरूरत क्यों

मंत्रालय के बयान के अनुसार, किसी आदिवासी भाषा के विलुप्त होने के साथ ही पारिस्थितिक, औषधीय, कृषि और सांस्कृतिक ज्ञान का एक अमूल्य भंडार भी सदा के लिए खो जाता है। यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब देश की कई जनजातीय भाषाएँ बोलने वालों की घटती संख्या के कारण संकटग्रस्त मानी जा रही हैं।

इसी को ध्यान में रखते हुए मंत्रालय ने जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (TRI) और राज्य जनजातीय कल्याण विभागों के नेटवर्क को इस संरक्षण प्रयास में सक्रिय रूप से शामिल किया है।

आगे की राह

कॉन्क्लेव के समापन पर एक राष्ट्रीय कार्ययोजना तैयार किए जाने की संभावना है, जो जनजातीय भाषाओं के दीर्घकालिक संरक्षण और संग्रहालयों के विस्तार के लिए नीतिगत दिशा तय करेगी। यह सम्मेलन आदिवासी विरासत को मुख्यधारा की सांस्कृतिक नीति से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी क्रियान्वयन की होगी। 10 राज्यों में स्वीकृत 11 TFFM में से केवल 4 का उद्घाटन होना यह दर्शाता है कि घोषणाओं और ज़मीनी अमल के बीच की खाई अभी पाटी नहीं गई है। जनजातीय भाषाओं का विलुप्तिकरण एक सतत प्रक्रिया है — सम्मेलनों से रोडमैप बनते हैं, पर बिना पर्याप्त बजट और स्थानीय TRI क्षमता के, ये रोडमैप दस्तावेज़ों तक सीमित रह जाते हैं। मुख्यधारा की कवरेज जो अक्सर चूकती है वह यह है कि इन संग्रहालयों में क्यूरेशन और डिजिटल दस्तावेजीकरण के लिए प्रशिक्षित जनशक्ति की भारी कमी है।
RashtraPress
25 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मैसूर में आयोजित जनजातीय भाषा कॉन्क्लेव क्या है?
यह जनजातीय मामलों के मंत्रालय द्वारा 24-26 अगस्त को मैसूर में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन है, जिसमें जनजातीय भाषाओं के दस्तावेजीकरण, संरक्षण और पुनरुद्धार तथा देशभर के जनजातीय संग्रहालयों को सुदृढ़ करने पर विचार-विमर्श हो रहा है।
जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय (TFFM) क्या हैं और इनकी वर्तमान स्थिति क्या है?
TFFM वे संग्रहालय हैं जो भारत की स्वाधीनता संग्राम में आदिवासी समुदायों के योगदान को संरक्षित और प्रदर्शित करते हैं। मंत्रालय ने 10 राज्यों में 11 ऐसे संग्रहालयों को मंजूरी दी है, जिनमें से 4 का अब तक उद्घाटन हो चुका है।
दुर्गादास उइके कौन हैं और इस कॉन्क्लेव में उनकी भूमिका क्या है?
दुर्गादास उइके जनजातीय मामलों के राज्य मंत्री हैं। उन्होंने 24 अगस्त को मैसूर में आरंभ हुए इस राष्ट्रीय कॉन्क्लेव में जनजातीय भाषा संरक्षण और संग्रहालय सुदृढ़ीकरण पर हुई चर्चाओं की अध्यक्षता की।
आदिवासी भाषाओं का संरक्षण क्यों ज़रूरी है?
मंत्रालय के अनुसार, किसी आदिवासी भाषा के विलुप्त होने के साथ उससे जुड़ा पारिस्थितिक, औषधीय, कृषि और सांस्कृतिक ज्ञान भी हमेशा के लिए नष्ट हो जाता है। इसीलिए TRI और राज्य जनजातीय कल्याण विभागों को इस नेटवर्क में शामिल किया गया है।
यह कॉन्क्लेव 'विकसित भारत 2047' से कैसे जुड़ा है?
मंत्रालय के बयान के अनुसार, यह कॉन्क्लेव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'विकसित भारत 2047' रोडमैप का हिस्सा है, जिसमें पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को पुनर्जीवित करना और समावेशी राष्ट्रीय विकास सुनिश्चित करना प्रमुख स्तंभ हैं।
राष्ट्र प्रेस
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