उपराष्ट्रपति ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के 'एकात्म मानव दर्शन' की प्रासंगिकता पर जोर दिया

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उपराष्ट्रपति ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के 'एकात्म मानव दर्शन' की प्रासंगिकता पर जोर दिया

सारांश

उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने एकात्म मानव दर्शन की प्रासंगिकता पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि यह दर्शन आज भी उतना ही आवश्यक है, जो व्यक्ति, समाज और प्रकृति के संबंध को मजबूत करता है।

Key Takeaways

  • एकात्म मानव दर्शन का महत्व आज भी प्रासंगिक है।
  • सच्चा विकास होलिस्टिक होना चाहिए।
  • धर्म के माध्यम से सामंजस्य स्थापित करना आवश्यक है।
  • टेक्नोलॉजी का उपयोग मानव भलाई के लिए होना चाहिए।
  • सामाजिक जीवन में कर्तव्य और सेवा को महत्व देना चाहिए।

नई दिल्ली, २५ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने बुधवार को कर्नाटक स्टेट ओपन यूनिवर्सिटी, मैसूरु में ‘एकात्म मानव दर्शन, भारत का विश्व दृष्टिकोन’ पर अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सम्मेलन का वर्चुअल उद्घाटन किया।

कॉन्फ्रेंस के आयोजन के लिए कर्नाटक स्टेट ओपन यूनिवर्सिटी, मैसूरु, प्रज्ञा प्रवाह और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन की प्रशंसा करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह एकात्म मानव दर्शन (इंटीग्रल ह्यूमनिज्म) के ६० वर्ष पूरे होने का अवसर है, जो पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रस्तुत एक गहरा दार्शनिक और सभ्यतागत ढांचा है, जो आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि इंटीग्रल ह्यूमनिज्म व्यक्ति, समाज, प्रकृति और ब्रह्मांड के आपसी संबंध को महत्व देता है। उन्होंने कहा कि आज की दुनिया में, जो बढ़ती फूट, तनाव और विश्वास की कमी का सामना कर रही है, यह दर्शन धर्म के माध्यम से सामंजस्य का मार्ग प्रस्तुत करता है, जो कर्तव्य और सच्चाई, दया और सेवा जैसे मूल्यों से निर्देशित होता है।

उन्होंने कहा कि सच्चा विकास होलिस्टिक होना चाहिए, जिसमें शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का पोषण हो, और प्रकृति के साथ संतुलन बना रहे। उपराष्ट्रपति ने सार्वजनिक जीवन में कर्तव्य और सेवा पर जोर दिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास के विजन का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक विरासत पर आधारित समावेशी और टिकाऊ विकास है, जो वसुधैव कुटुम्बकम के सिद्धांत से जुड़ा हुआ है।

तेजी से बढ़ती तकनीक के संदर्भ में उन्होंने कहा कि जहां मानवता के पास अत्यधिक तकनीकी क्षमताएँ हैं, वहीं नैतिक मार्गदर्शन भी आवश्यक है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि तकनीक को मानव भलाई के लिए काम करना चाहिए और लोक-संग्रह के आदर्श के अनुसार समझदारी से चलना चाहिए।

एकीकृत मानवतावाद के व्यावहारिक प्रयोग का आह्वान करते हुए, उपराष्ट्रपति ने सभी हितधारकों से एक संतुलित और सामंजस्यपूर्ण दुनिया बनाने के लिए नीति और क्रियान्वयन में इसके सिद्धांतों को आगे बढ़ाने का आग्रह किया। उन्होंने सम्मेलन की सफलता के लिए शुभकामनाएँ भी दीं।

यह सम्मेलन २५ से २७ मार्च तक कर्नाटक राज्य मुक्त विश्वविद्यालय (केएसओयू), मैसूरु द्वारा डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है।

Point of View

जिसमें उन्होंने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के 'एकात्म मानव दर्शन' की आवश्यकता पर बल दिया है। यह दृष्टिकोण आज के समाज में सामंजस्य और संबंधों की मजबूती के लिए महत्वपूर्ण है।
NationPress
25/03/2026

Frequently Asked Questions

एकात्म मानव दर्शन क्या है?
एकात्म मानव दर्शन एक दार्शनिक और सभ्यतागत ढांचा है जो व्यक्ति, समाज, प्रकृति और ब्रह्मांड के आपसी संबंध को महत्व देता है।
उपराष्ट्रपति ने इस सम्मेलन में क्या कहा?
उपराष्ट्रपति ने इस दर्शन की प्रासंगिकता पर जोर दिया और कहा कि यह आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यह सम्मेलन कब और कहां आयोजित किया गया था?
यह सम्मेलन २५ से २७ मार्च तक कर्नाटक राज्य मुक्त विश्वविद्यालय, मैसूरु में आयोजित किया गया।
इस दर्शन का उद्देश्य क्या है?
इस दर्शन का उद्देश्य व्यक्ति, समाज और प्रकृति के बीच संतुलन और सामंजस्य स्थापित करना है।
उपराष्ट्रपति ने किसके दृष्टिकोण का उल्लेख किया?
उपराष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास' के दृष्टिकोण का उल्लेख किया।
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