क्या सशक्त आत्मा ही विश्व एकता की संकल्पना को साकार करने की आधारशिला है?

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क्या सशक्त आत्मा ही विश्व एकता की संकल्पना को साकार करने की आधारशिला है?

सारांश

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने लखनऊ में आयोजित 'विश्व एकता और विश्वास के लिए ध्यान' समारोह में राजयोग के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना के विकास की बात की। उन्होंने विश्व एकता की संकल्पना के महत्व और सशक्त आत्मा की भूमिका पर जोर दिया। भारत की संस्कृति में 'वासुधैव कुटुम्बकम्' का संदेश हमेशा से प्रासंगिक रहा है।

मुख्य बातें

सशक्त आत्मा विश्व एकता की आधारशिला है।
शांत मन से विश्व शांति की नींव रखी जा सकती है।
राजयोग आध्यात्मिक चेतना का विकास करता है।
भारत की संस्कृति में 'वासुधैव कुटुम्बकम्' का संदेश है।
समाज को समावेशी और मूल्य-आधारित बनाने के लिए सरकार प्रयासरत है।

लखनऊ, 28 नवंबर (राष्ट्र प्रेस)। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा शुक्रवार को लखनऊ में आयोजित 'विश्व एकता और विश्वास के लिए ध्यान' (योग) के राज्य स्तरीय उद्घाटन समारोह में भाग लेते हुए राजयोग के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना के विकास पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि विश्व एकता की संकल्पना को साकार करने के लिए सशक्त आत्मा की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी बताया कि जहां मन शांत, विचार स्वस्थ और भावनाएं शुद्ध होती हैं, वहीं विश्वास टिकता है। राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि शांत और स्थिर मन समाज में शांति का बीज बोता है, जिससे विश्व शांति और विश्व एकता की नींव रखी जाती है।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 'ओम शांति' के संबोधन से शुरुआत की। उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति ने सदैव वासुधैव कुटुम्बकम् का संदेश दिया है, जिसका अर्थ है कि सारा विश्व एक परिवार है। आज, जब विश्व कई प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहा है, यह विचार और भी प्रासंगिक बन जाता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह अभियान विश्व एकता के संकल्प को सिद्ध करने में मदद करेगा।

राष्ट्रपति ने कहा कि भारत सरकार समाज को अधिक समावेशी, शांतिपूर्ण और मूल्य-आधारित बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठा रही है। योग और ध्यान को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देना इसी का एक हिस्सा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मूल्य-आधारित शिक्षा का समावेश इसी दिशा में एक प्रयास है। महिला सम्मान, आत्मनिर्भरता और सामाजिक समावेश के लिए कई राष्ट्रीय कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

वर्ष 2023 में भारत में जी-20 समिट का उल्लेख करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि इसका थीम था 'वन अर्थ, वन फैमिली, वन फ्यूचर'। उन्होंने कहा कि ये पहल मानवता के भविष्य को सुरक्षित और उज्ज्वल बनाने के लिए महत्वपूर्ण हैं। आज का युग सूचना, प्रौद्योगिकी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और अंतरिक्ष अनुसंधान का युग है, जिसने मानव जीवन को और सुविधाजनक बना दिया है।

राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि आज का मानव पहले से अधिक शिक्षित और तकनीकी रूप से सक्षम है, लेकिन समाज में तनाव, असुरक्षा, अविश्वास और एकाकीपन बढ़ रहा है। हमें केवल आगे बढ़ने की यात्रा नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपने भीतर झांकने की भी आवश्यकता है। इसी 'स्व' से साक्षात्कार कराने का काम ब्रह्मकुमारीज ने किया है।

उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति चाहता है कि वह दूसरों पर विश्वास करे, लेकिन विश्वास वहीं टिकता है जहां मन शांत, विचार स्वस्थ और भावनाएं शुद्ध हों। जब हम कुछ क्षण रुककर स्वयं से संवाद करते हैं, तो यह अनुभव होता है कि शांति और आनंद हमारे भीतर है। सशक्त आत्मा ही विश्व एकता की संकल्पना को साकार करने की आधारशिला है।

उन्होंने सभी को आह्वान किया कि आइए, शांति को अपने भीतर जगाएं, विश्वास को अपने विचारों में उतारें और एकता को अपने कर्म में प्रकट करें। राष्ट्रपति मुर्मू ने ब्रह्मकुमारीज के सभी सदस्यों को इस कार्यक्रम के लिए बधाई दी।

कार्यक्रम का शुभारंभ राष्ट्रपति मुर्मू ने दीप प्रज्ज्वलन के साथ किया। उन्होंने ब्रह्मकुमारियों को कलश सौंपा और भ्राताओं को ब्रह्मकुमारीज की ध्वजा प्रदान की। इस अवसर पर राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उपस्थित थे।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किस कार्यक्रम में भाग लिया?
उन्होंने लखनऊ में 'विश्व एकता और विश्वास के लिए ध्यान' (योग) के राज्य स्तरीय उद्घाटन समारोह में भाग लिया।
विश्व एकता की संकल्पना के लिए क्या आवश्यक है?
सशक्त आत्मा की आवश्यकता है।
राष्ट्रपति मुर्मू ने किस विषय पर जोर दिया?
उन्होंने राजयोग के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना के विकास पर जोर दिया।
भारत सरकार ने समाज को कैसे समावेशी बनाने के लिए कदम उठाए हैं?
योग और ध्यान को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देने के साथ-साथ अन्य राष्ट्रीय कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है।
राष्ट्रपति ने किस शब्द से अपने संबोधन की शुरुआत की?
उन्होंने 'ओम शांति' से अपने संबोधन की शुरुआत की।
राष्ट्र प्रेस
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