पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने जज राजीव गोयल को किया सस्पेंड, सुधीर परमार को बरी करने पर उठे सवाल
सारांश
मुख्य बातें
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने 29 मई 2026 को पंचकूला स्थित सीबीआई कोर्ट के तत्कालीन स्पेशल जज राजीव गोयल को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। यह कार्रवाई उस विवादास्पद फैसले के बाद हुई जिसमें गोयल ने निलंबित जज सुधीर परमार, उनके भतीजे अजय परमार और रियल एस्टेट फर्मों के तीन प्रतिनिधियों को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज मामले से बरी कर दिया था। हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 235 के तहत प्राप्त शक्तियों का उपयोग करते हुए यह निलंबन आदेश जारी किया।
निलंबन आदेश में क्या कहा गया
हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश और न्यायाधीशों ने हरियाणा सिविल सर्विसेज (दंड एवं अपील) नियम, 2016 के नियम 4(बी) के साथ संविधान के अनुच्छेद 235 के अंतर्गत यह निर्णय लिया। राजीव गोयल, जो अब कैथल में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद पर थे, के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने के उद्देश्य से यह निलंबन लागू किया गया है।
निलंबन की अवधि के दौरान गोयल का मुख्यालय कैथल में रहेगा और उन्हें जिला एवं सत्र न्यायाधीश, कैथल की अनुमति के बिना मुख्यालय न छोड़ने का निर्देश दिया गया है। वे हरियाणा सिविल सर्विसेज (सामान्य) नियम, 2016 के अनुसार जीवन-यापन भत्ते के हकदार रहेंगे। गौरतलब है कि आदेश में आरोपों की प्रकृति या अनुशासनात्मक कार्रवाई के आधारों का विशेष उल्लेख नहीं किया गया है।
सुधीर परमार मामले की पृष्ठभूमि
यह घटनाक्रम न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के एक बड़े मामले से जुड़ा है। निलंबित जज सुधीर परमार को अप्रैल 2023 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक कथित रिश्वत मामले में उनके आवास पर हरियाणा एंटी-करप्शन ब्यूरो (एसीबी) की छापेमारी के बाद निलंबित किया था। इसके बाद प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 2024 में परमार के विरुद्ध कथित रिश्वतखोरी रैकेट से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोप-पत्र दायर किया।
ईडी ने अगस्त 2023 में अपनी मुख्य अभियोजन शिकायत और अक्टूबर 2023 में परमार सहित 10 आरोपियों के विरुद्ध एक अनुपूरक शिकायत दर्ज की थी। केंद्रीय एजेंसी के अनुसार, यह जांच हरियाणा एसीबी द्वारा दर्ज प्राथमिकी से शुरू हुई और कथित अपराध की आय का पता लगाने का प्रयास किया गया।
ईडी के आरोप और कथित वित्तीय लेन-देन
ईडी ने आरोप लगाया है कि सुधीर परमार को आईआरईओ और एम3एम ग्रुप के प्रमोटरों से न्यायिक कार्रवाइयों में अनुकूल निर्णय दिलाने के बदले में कथित तौर पर लगभग ₹7 करोड़ का अवैध लाभ मिला। एजेंसी के अनुसार, यह कथित लाभ नकद भुगतान के साथ-साथ बिना किसी सहायक दस्तावेज़ के उनके रिश्तेदारों के बैंक खातों में स्थानांतरित किए गए ऋण के माध्यम से दिया गया।
केंद्रीय एजेंसी ने दावा किया कि सुधीर परमार को मिला गैरकानूनी फायदा उनके रिश्तेदारों के बैंक खातों में ट्रांसफर किया गया था — जो आरोपों के अनुसार धन-शोधन की एक सुनियोजित कड़ी थी।
न्यायिक जवाबदेही पर व्यापक सवाल
यह ऐसे समय में आया है जब न्यायपालिका में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज है। एक ही अदालत में क्रमिक रूप से तैनात दो जजों — पहले सुधीर परमार, फिर राजीव गोयल — के विरुद्ध कार्रवाई इस मामले को असाधारण बनाती है। आलोचकों का कहना है कि यह प्रकरण उच्च न्यायालयों द्वारा अधीनस्थ न्यायपालिका की निगरानी तंत्र की समीक्षा की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
हाईकोर्ट द्वारा अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया अभी प्रारंभिक चरण में है और आगे की जांच के परिणाम स्पष्ट नहीं हैं।