कलकत्ता हाईकोर्ट में PIL: पश्चिम बंगाल के धार्मिक स्थलों से लाउडस्पीकर हटाने का आदेश वापस लेने की मांग
सारांश
मुख्य बातें
कलकत्ता हाईकोर्ट में 10 अगस्त 2026 को एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई, जिसमें पश्चिम बंगाल सरकार के उस आदेश को वापस लेने की माँग की गई है जिसके तहत राज्य के सभी धार्मिक स्थलों से माइक्रोफोन और लाउडस्पीकर हटाने का निर्देश दिया गया है। यह याचिका ऐसे समय में दाखिल हुई है जब विपक्षी दलों और धार्मिक संगठनों में इस आदेश को लेकर तीखी प्रतिक्रिया देखी जा रही है।
याचिका का विवरण और याचिकाकर्ता
यह PIL तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लोकसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने वकील दानिश फारूकी की ओर से दाखिल की है। याचिका को कलकत्ता हाईकोर्ट के कार्यवाहक न्यायाधीश तपब्रता चक्रवर्ती की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष प्रस्तुत किया गया है, हालाँकि अभी सुनवाई की तारीख तय होनी बाकी है।
याचिका में सभी धार्मिक स्थलों — विशेषकर मस्जिदों — से लाउडस्पीकर और माइक्रोफोन हटाने संबंधी कानूनी प्रतिबंधों की वैधता पर सवाल उठाए गए हैं।
मौखिक आदेश पर विवाद
बनर्जी का आरोप है कि मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने का निर्देश मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के मौखिक आदेश के बाद लागू किया गया। उनके अनुसार, पश्चिम बंगाल के नए शासनकाल में यह एक चिंताजनक प्रवृत्ति बन रही है — जहाँ मुख्यमंत्री सार्वजनिक रूप से कुछ और कहते हैं, जबकि पुलिस बिना किसी लिखित आधिकारिक आदेश के उसे लागू कर देती है।
गौरतलब है कि सीएम सुवेंदु अधिकारी ने पहले ही स्पष्ट किया था कि यह आदेश केवल मस्जिदों तक सीमित नहीं है, बल्कि मंदिरों सहित सभी धार्मिक स्थलों पर समान रूप से लागू होगा।
दूसरी याचिका: विरोध रैली की अनुमति की माँग
इसी मामले में एक अलग याचिका कलकत्ता हाईकोर्ट की एकल पीठ में जस्टिस सौगत भट्टाचार्य के समक्ष दायर की गई है। इसमें नॉर्थ बंगाल के राजबाजार से केंद्रीय बंगाल के रानी रशमोनी रोड तक विरोध रैली निकालने की अनुमति माँगी गई है।
यह याचिका अधिवक्ता और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) — CPI(M) के वरिष्ठ नेता सब्यसाची चट्टोपाध्याय ने अब्दुल समद की ओर से दाखिल की है। जस्टिस भट्टाचार्य इस याचिका पर सुनवाई कर सकते हैं।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
विपक्षी दलों ने राज्य सरकार पर आरोप लगाया है कि लाउडस्पीकर हटाने का आदेश विशेष रूप से मस्जिदों को निशाना बनाने के इरादे से लाया गया है। हालाँकि सरकार इस आरोप को खारिज करती है और इसे सभी धर्मों पर समान रूप से लागू नीति बताती है। यह ऐसे समय में हो रहा है जब राज्य में नई सरकार के शुरुआती महीनों में ही कई प्रशासनिक निर्णयों को लेकर तनाव बढ़ रहा है।
आगे क्या होगा
दोनों याचिकाओं पर सुनवाई की तारीख अभी तय होनी बाकी है। अदालत का फैसला राज्य में धार्मिक स्थलों पर ध्वनि-विस्तारक यंत्रों के उपयोग की कानूनी स्थिति तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता, कार्यपालिका की शक्तियों और ध्वनि प्रदूषण नियमों के बीच संतुलन के सवाल को केंद्र में लाता है।