6 अगस्त 2026
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पश्चिम बंगाल में मस्जिद लाउडस्पीकर विवाद: इमाम बोले- पुलिस बना रही दबाव, BJP विधायक ने कहा- कानून सर्वोपरि

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पश्चिम बंगाल में मस्जिद लाउडस्पीकर विवाद: इमाम बोले- पुलिस बना रही दबाव, BJP विधायक ने कहा- कानून सर्वोपरि

सारांश

पश्चिम बंगाल में मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने का विवाद अब सड़क से संसद तक पहुँचने की राह पर है। नखोदा मस्जिद के इमाम ने पुलिसिया दबाव का आरोप लगाया है, जबकि BJP ने कानून की सर्वोच्चता का तर्क दिया — यह टकराव धर्म, कानून और राजनीति के चौराहे पर खड़ा है।

मुख्य बातें

नखोदा मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद शफीकुल वजमी ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल पुलिस मस्जिदों पर लाउडस्पीकर हटाने का मौखिक दबाव बना रही है।
इमाम के अनुसार, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की गाइडलाइन के तहत अजान दी जा रही है — आवासीय क्षेत्रों में सीमा 65 से 70 डेसीबल है।
मौलाना ने मुख्यमंत्री और DGP से मामले में हस्तक्षेप और जाँच की माँग की।
BJP विधायक सौरव सिकदर ने कहा कि राज्य में कानून का शासन है और किसी को नियमों से छूट नहीं।
राज्य सरकार की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।

पश्चिम बंगाल में मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने का मुद्दा तेज़ी से राजनीतिक और सामाजिक विवाद का रूप लेता जा रहा है। कोलकाता की ऐतिहासिक नखोदा मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद शफीकुल वजमी ने 6 अगस्त को आरोप लगाया कि राज्य पुलिस मस्जिद प्रबंधन समितियों पर लाउडस्पीकर हटाने का अनुचित दबाव बना रही है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के विधायक सौरव सिकदर ने स्पष्ट किया कि राज्य में कानून का शासन सर्वोपरि है और किसी भी समुदाय को नियमों से छूट नहीं मिल सकती।

इमाम का आरोप: मौखिक धमकी, लिखित नोटिस नहीं

मौलाना शफीकुल वजमी ने कहा कि राज्य के विभिन्न इलाकों में पुलिस इमामों और मस्जिद कमेटी के ज़िम्मेदारों को थाने बुलाकर लाउडस्पीकर हटाने के लिए दबाव बना रही है। उनके अनुसार, यदि कोई सरकारी आदेश जारी हुआ है, तो संबंधित अधिकारियों को लिखित नोटिस देना अनिवार्य है। उन्होंने कहा, 'केवल मौखिक रूप से बुलाकर धमकाना न तो कानूनी है और न ही लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप।'

ध्वनि सीमा और कानूनी ढाँचा

मौलाना ने ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण के मौजूदा कानूनी ढाँचे का हवाला देते हुए कहा कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने क्षेत्रवार ध्वनि सीमाएँ निर्धारित की हैं — औद्योगिक क्षेत्रों में 75 से 80 डेसीबल, व्यावसायिक क्षेत्रों में 70 से 75 डेसीबल, आवासीय क्षेत्रों में 65 से 70 डेसीबल और साइलेंस ज़ोन में 45 से 50 डेसीबल। उन्होंने दावा किया कि राज्य की मस्जिदों में अजान सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की गाइडलाइन के दायरे में ही दी जा रही है। यदि कोई मस्जिद तय सीमा से अधिक ध्वनि का उपयोग कर रही है, तो उसे नोटिस देकर सुधार का अवसर मिलना चाहिए, न कि सीधे लाउडस्पीकर हटाने या तोड़ने की धमकी।

मुख्यमंत्री और डीजीपी से हस्तक्षेप की अपील

मौलाना वजमी ने मुख्यमंत्री से इस मामले में व्यक्तिगत हस्तक्षेप की माँग करते हुए कहा कि सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी समुदाय को अनावश्यक परेशानी न हो। उन्होंने राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) से भी मामले की जाँच कर उचित कार्रवाई करने की माँग की। यह मुद्दा ऐसे समय में उठा है जब देश के कई राज्यों में धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर के उपयोग को लेकर न्यायिक और प्रशासनिक विमर्श जारी है।

BJP का पक्ष: कानून से ऊपर कोई नहीं

BJP विधायक सौरव सिकदर ने इस विवाद पर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में किसी धर्म का नहीं, बल्कि कानून का शासन चलता है। उन्होंने कहा कि चाहे किसी भी धर्म या समुदाय का व्यक्ति हो, सभी को नियमों का पालन करना होगा। सिकदर ने यह भी कहा कि यदि किसी को प्रशासनिक कार्रवाई पर आपत्ति है, तो वह कानूनी प्रक्रिया के तहत अदालत का दरवाज़ा खटखटा सकता है। उनके अनुसार, किसी धर्मगुरु के विरोध से कानून नहीं बदलता।

आगे क्या होगा

फिलहाल राज्य सरकार की ओर से इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। मामला अदालत तक पहुँचने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, खासकर यदि मस्जिद कमेटियाँ पुलिस की कार्रवाई को लिखित में चुनौती देती हैं। यह विवाद पश्चिम बंगाल की बहुसांस्कृतिक राजनीति में एक नई परत जोड़ता है, जहाँ धर्म, कानून और सत्ता के बीच की रेखा अक्सर बहस का केंद्र बनती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असल में यह उस राजनीतिक तनाव की अभिव्यक्ति है जो पश्चिम बंगाल में धर्म और शासन के बीच लंबे समय से सुलग रहा है। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के स्पष्ट दिशानिर्देश मौजूद हैं — यदि उल्लंघन हो रहा है, तो लिखित नोटिस और विधिसम्मत प्रक्रिया ही एकमात्र वैध रास्ता है। मौखिक दबाव के आरोप, यदि सत्य हैं, तो प्रशासनिक मनमानी के गंभीर संकेत हैं। दूसरी ओर, BJP का 'कानून सर्वोपरि' का तर्क तब तक अधूरा है जब तक यह सभी धर्मों के धार्मिक स्थलों पर समान रूप से लागू न हो — चुनिंदा प्रवर्तन से संवैधानिक समानता का सवाल उठता है।
RashtraPress
6 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पश्चिम बंगाल में मस्जिद लाउडस्पीकर विवाद क्या है?
पश्चिम बंगाल में पुलिस द्वारा मस्जिदों के इमामों और प्रबंधन समितियों पर लाउडस्पीकर हटाने का दबाव बनाए जाने के आरोप सामने आए हैं। नखोदा मस्जिद के इमाम मौलाना शफीकुल वजमी ने 6 अगस्त को इसे गैरकानूनी और लोकतंत्र-विरोधी करार दिया।
मस्जिदों में लाउडस्पीकर के लिए क्या कानूनी नियम हैं?
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने क्षेत्रवार ध्वनि सीमाएँ तय की हैं — आवासीय क्षेत्रों में 65 से 70 डेसीबल और साइलेंस ज़ोन में 45 से 50 डेसीबल। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार इन सीमाओं का उल्लंघन होने पर नोटिस देकर सुधार का अवसर देना अनिवार्य है।
इमाम ने किससे हस्तक्षेप की माँग की है?
मौलाना शफीकुल वजमी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) से मामले की जाँच कर उचित कार्रवाई करने की माँग की है। उन्होंने कहा कि किसी भी समुदाय को अनावश्यक परेशानी नहीं होनी चाहिए।
BJP का इस विवाद पर क्या रुख है?
BJP विधायक सौरव सिकदर ने कहा कि पश्चिम बंगाल में कानून का शासन है और हर नागरिक को नियमों का पालन करना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि किसी को प्रशासनिक कार्रवाई पर आपत्ति हो तो वह अदालत का दरवाज़ा खटखटा सकता है।
क्या राज्य सरकार ने इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान दिया है?
अब तक पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से इस विवाद पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। यदि मस्जिद कमेटियाँ पुलिस की कार्रवाई को कानूनी चुनौती देती हैं, तो मामला अदालत तक पहुँच सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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