पीएम मोदी के विदेश दौरों से किसानों की आय बढ़ेगी: पुणे के किसान हाजी नाजिम शेख ने की कृषि विजन की तारीफ
सारांश
मुख्य बातें
पुणे के प्रगतिशील किसान हाजी नाजिम शेख ने 21 मई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वैश्विक कृषि प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि जब भी पीएम विदेश दौरों पर जाते हैं और भारतीय कृषि उत्पादों की बात करते हैं, तो इससे किसानों की आमदनी बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता है। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक खाद्य सुरक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चर्चा तेज है।
किसान की राय: विदेश दौरों का कृषि पर असर
हाजी नाजिम शेख ने कहा, 'भारत को हमेशा कृषि प्रधान देश माना जाता है। कृषि प्रधान देश के प्रधानमंत्री जब भी दूसरे देशों में जाते हैं, वे कृषि की बात करते हैं और किसानों की फिक्र करते हैं। इससे भविष्य में किसानों को जरूर लाभ मिलेगा और उनकी आय भी बढ़ेगी।' उनका मानना है कि अनाज को लेकर पूरी दुनिया में जो अनिश्चितता बनी रहती है, उस परिस्थिति में प्रधानमंत्री मोदी के प्रयास निश्चित रूप से सफल होंगे।
मिलेट्स को वैश्विक पहचान दिलाने की तारीफ
पुणे के किसान हाजी नाजिम शेख ने मोटे अनाज — यानी मिलेट्स (बाजरा, ज्वार और रागी) — को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रोत्साहित करने के लिए प्रधानमंत्री के विजन की विशेष प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी के ठोस प्रयासों के कारण ही भारत का यह पारंपरिक और पौष्टिक आहार आज दुनिया भर की डाइनिंग टेबल तक पहुँच सका है।
संयुक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष
हाजी नाजिम शेख ने कहा, 'पीएम मोदी ने वैश्विक मंचों पर हमेशा भारत की बात रखी है। इसी प्रयास के परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र ने 2023 को 'अंतर्राष्ट्रीय मिलेट्स (मोटा अनाज) वर्ष' घोषित किया। इसका पूरा श्रेय प्रधानमंत्री मोदी को जाता है।' गौरतलब है कि भारत की पहल पर संयुक्त राष्ट्र महासभा ने यह निर्णय लिया था, जिसे वैश्विक कृषि कूटनीति की एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है।
ज़मीनी स्तर पर बढ़ती स्वीकार्यता
वैश्विक मंचों पर भारत के बढ़ते प्रभाव और देश के पारंपरिक खान-पान को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के प्रयासों की सराहना अब जमीनी स्तर पर भी होने लगी है। पुणे जैसे कृषि-समृद्ध क्षेत्र के किसानों का यह नजरिया दर्शाता है कि कृषि कूटनीति का सकारात्मक संदेश ग्रामीण भारत तक पहुँच रहा है। आने वाले समय में यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि इन वैश्विक प्रयासों का लाभ किस हद तक सीधे किसानों की आमदनी में परिलक्षित होता है।