सीआईआई की चेतावनी: ईंधन, उर्वरक और खाद्य (3एफ) को एकीकृत आर्थिक चुनौती मानकर चले भारत
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) ने 21 मई 2025 को स्पष्ट किया कि ईंधन, उर्वरक और खाद्य पदार्थ — जिन्हें सामूहिक रूप से '3एफ' कहा जा रहा है — तीन अलग-थलग समस्याएँ नहीं, बल्कि एक परस्पर जुड़ी आर्थिक चुनौती है, जिससे निपटने के लिए नई दिल्ली को तत्काल एक समन्वित राष्ट्रीय रणनीति अपनानी होगी। संस्था ने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव ने ऊर्जा, उर्वरक और खाद्य कीमतों पर एक साथ दबाव बना दिया है, जिसका असर लॉजिस्टिक्स लागत, खाद्य महंगाई और रुपये की विनिमय दर पर भी पड़ रहा है।
3एफ की परस्पर निर्भरता: एक साझा संकट
सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने कहा, 'ईंधन, खाद और खाद्य — ये तीन अलग-अलग समस्याएँ नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़ी हुई आर्थिक चुनौतियाँ हैं।' उन्होंने समझाया कि ईंधन की कीमत बढ़ने से उर्वरक महंगे होते हैं, उर्वरक महंगे होने से खाद्य उत्पादन लागत बढ़ती है, और इसका सीधा असर महंगाई, सरकारी राजकोषीय दबाव और आम नागरिकों की क्रय शक्ति पर पड़ता है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत पहले से ही वैश्विक मंदी की आशंकाओं और कमज़ोर होते रुपये से जूझ रहा है।
आयात निर्भरता: भारत की असली कमज़ोरी
सरकारी आँकड़ों के अनुसार, भारत लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल, 90 प्रतिशत फॉस्फेट और 25 प्रतिशत यूरिया आयात करता है। इनमें से अधिकतर आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आती है — जो पश्चिम एशियाई तनाव की स्थिति में सबसे संवेदनशील मार्ग बन जाता है। सीआईआई ने कहा कि इस एकल-बिंदु निर्भरता को समाप्त करना भारत की ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। गौरतलब है कि यह कोई नई चिंता नहीं — वर्षों से नीति-निर्माता इस जोखिम को रेखांकित करते आए हैं, लेकिन संरचनात्मक बदलाव अपेक्षाकृत धीमे रहे हैं।
ईंधन क्षेत्र में सुझाए गए सुधार
सीआईआई ने सरकार की शुरुआती प्रतिक्रिया — उपभोक्ताओं पर ईंधन मूल्य वृद्धि का बोझ सीमित रखने और गैस आपूर्ति को प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की ओर मोड़ने — की सराहना की। आगे के लिए संस्था ने सुझाया कि ई22 से ई30 तक के उच्च एथेनॉल मिश्रण के लिए स्पष्ट रोडमैप तैयार हो, अधिक एथेनॉल उत्पादन वाले राज्यों में फ्लेक्स-फ्यूल वाहन तेजी से लागू किए जाएँ, और लंबी दूरी के ट्रकों के लिए एलएनजी-आधारित राष्ट्रीय ढाँचा विकसित हो जिसमें रिफ्यूलिंग कॉरिडोर और पारदर्शी मूल्य व्यवस्था शामिल हो। इसके साथ ही एलपीजी की जगह इलेक्ट्रिक कुकिंग, एथेनॉल-आधारित ईंधन और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे घरेलू विकल्पों को चरणबद्ध तरीके से बढ़ावा देने की भी सिफारिश की गई।
उर्वरक सब्सिडी सुधार और खाद्य महंगाई से बचाव
उर्वरक क्षेत्र में सीआईआई ने कहा कि बढ़ती वैश्विक कीमतों के कारण सब्सिडी बिल में लगातार वृद्धि का जोखिम है। संस्था ने सुझाया कि सब्सिडी को चरणबद्ध रूप से किसानों के सीधे बैंक खातों में स्थानांतरित किया जाए — डिजिटल बैंकिंग, मोबाइल ऑथेंटिकेशन और भूमि रिकॉर्ड डेटा के माध्यम से। साथ ही यूरिया को भी धीरे-धीरे न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी (एनबीएस) व्यवस्था में शामिल करने की सिफारिश की गई, ताकि मिट्टी की गुणवत्ता पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव और अत्यधिक नाइट्रोजन उपयोग पर लगाम लगाई जा सके।
खाद्य मोर्चे पर सीआईआई ने चेताया कि रिकॉर्ड अनाज उत्पादन के बावजूद टमाटर, प्याज और आलू जैसी फसलों में मूल्य उछाल पूरे बाज़ार को प्रभावित कर सकता है। संस्था ने सुझाया कि अगस्त से नवंबर के माँग-सीजन से पहले प्याज और टमाटर के बफर स्टॉक बाज़ार में जारी किए जाएँ, जमाखोरी और सट्टेबाजी पर सख्त कार्रवाई हो, अंतर-राज्यीय कृषि उपज परिवहन सुगम बनाया जाए, कोल्ड स्टोरेज नेटवर्क मजबूत हो और किसान-से-उपभोक्ता सीधे बाज़ारों को प्रोत्साहन मिले।
दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा की राह
बनर्जी ने कहा कि घरेलू विकल्पों को मजबूत करना 'सिर्फ तात्कालिक समाधान नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक सुरक्षा की बुनियाद है।' सीआईआई ने घरेलू तेल और गैस खोज में तेजी, स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व का विस्तार, कच्चे तेल के आयात स्रोतों में विविधता, और कोल गैसीफिकेशन, बायो-सीएनजी, मेथनॉल ब्लेंडिंग तथा परमाणु ऊर्जा जैसे वैकल्पिक स्रोतों पर गति बढ़ाने की माँग की। उन्होंने कहा कि यदि भारत अभी सही निर्णय लेता है, तो वह भविष्य के वैश्विक संकटों का सामना कहीं अधिक मजबूती से कर सकेगा।