मन की बात: पीएम मोदी ने बताया बुद्ध के संदेश का महत्व, चिली में स्तूप और भारतीय गुरु की कहानी
सारांश
Key Takeaways
- पीएम नरेंद्र मोदी ने 26 अप्रैल को 'मन की बात' के 133वें एपिसोड में भगवान बुद्ध के विचारों की प्रासंगिकता पर विस्तार से बात की।
- चिली की कोचीगुआज घाटी में लद्दाख के द्रुबपोन ओत्जर रिनपोछे के नेतृत्व में एक संस्था बुद्ध के विचारों को वैश्विक स्तर पर फैला रही है।
- पीएम मोदी ने कहा — "शांति हमारे भीतर से शुरू होती है" और स्वयं पर विजय को सबसे बड़ी जीत बताया।
- बुद्ध पूर्णिमा (वैशाख पूर्णिमा) बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण — तीनों घटनाओं का पर्व है।
- भगवान बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में नेपाल के लुंबिनी में हुआ था और 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में उन्होंने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया।
- यह संबोधन भारत की बौद्ध सॉफ्ट पावर कूटनीति के व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
नई दिल्ली, 26 अप्रैल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' के 133वें एपिसोड में भगवान गौतम बुद्ध के जीवन दर्शन और उनके कालजयी संदेशों की गहरी प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने दक्षिण अमेरिका के देश चिली में एक भारतीय गुरु के नेतृत्व में संचालित संस्था का विशेष उल्लेख किया, जो बुद्ध के विचारों को वैश्विक स्तर पर फैला रही है। बुद्ध पूर्णिमा के निकट आते इस कार्यक्रम में पीएम मोदी का यह संबोधन खास महत्व रखता है।
बुद्ध का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक
पीएम मोदी ने कहा कि भगवान बुद्ध का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना हजारों वर्ष पहले था। उन्होंने कहा, "भगवान बुद्ध ने हमें सिखाया है कि शांति हमारे भीतर से शुरू होती है।" उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि स्वयं पर विजय प्राप्त करना ही मनुष्य की सबसे बड़ी जीत होती है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि आज जब पूरी दुनिया तनाव, संघर्ष और अशांति के दौर से गुजर रही है, तब बुद्ध के विचार और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। उनका मानना है कि करुणा और ध्यान को जीवन में उतारकर ही वैश्विक समस्याओं का समाधान संभव है।
चिली में लद्दाखी गुरु का अनोखा प्रयास
पीएम मोदी ने अपने संबोधन में बताया कि चिली की कोचीगुआज घाटी में एक संस्था लद्दाख में जन्मे द्रुबपोन ओत्जर रिनपोछे के मार्गदर्शन में काम कर रही है। यह संस्था ध्यान और करुणा के माध्यम से लोगों को बुद्ध के दर्शन से जोड़ रही है।
इस घाटी में निर्मित स्तूप न केवल आस्था का केंद्र बन चुका है, बल्कि बड़ी संख्या में स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय लोग यहां शांति और सुकून की तलाश में आते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत की बौद्ध परंपरा का प्रभाव आज भी विश्व के सुदूर कोनों तक पहुंच रहा है।
बुद्ध पूर्णिमा का ऐतिहासिक महत्व
बुद्ध पूर्णिमा, जिसे वैशाख पूर्णिमा भी कहते हैं, बौद्ध धर्म का सर्वाधिक पवित्र पर्व माना जाता है। यह तिथि भगवान बुद्ध के जीवन की तीन महत्वपूर्ण घटनाओं — जन्म, ज्ञान प्राप्ति (बोधि) और महापरिनिर्वाण — की स्मृति में मनाई जाती है।
ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, भगवान बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में नेपाल के लुंबिनी में वैशाख पूर्णिमा को हुआ था। वर्षों की कठोर साधना के पश्चात उन्हें बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ और वे सिद्धार्थ से बुद्ध बने। 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में उन्होंने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया।
भारत की सॉफ्ट पावर और वैश्विक प्रभाव
पीएम मोदी का चिली की संस्था का उल्लेख करना केवल एक सांस्कृतिक संदर्भ नहीं है — यह भारत की सॉफ्ट पावर की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। गौरतलब है कि मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में बौद्ध सर्किट पर्यटन, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस और बौद्ध कूटनीति को विदेश नीति के महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया है। श्रीलंका, जापान, थाईलैंड और म्यांमार जैसे देशों के साथ बौद्ध धरोहर के आधार पर संबंध मजबूत किए गए हैं।
यह ध्यान देने योग्य है कि जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर है और वैश्विक स्तर पर युद्ध की छाया मंडरा रही है, ऐसे समय में बुद्ध के शांति संदेश को केंद्र में रखना एक सुविचारित कूटनीतिक संकेत भी माना जा सकता है।
मन की बात की पहुंच और प्रभाव
'मन की बात' कार्यक्रम अक्टूबर 2014 से प्रसारित हो रहा है और आकाशवाणी के माध्यम से 22 भाषाओं में करोड़ों श्रोताओं तक पहुंचता है। 133वां एपिसोड ऐसे समय में आया है जब बुद्ध पूर्णिमा 2025 निकट है, जिससे इस संबोधन की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है।
आने वाले दिनों में बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर सरकारी स्तर पर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाने की संभावना है। बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर में विशेष आयोजन होंगे जहां देश-विदेश से बौद्ध अनुयायी एकत्रित होंगे।