PM मोदी ने एक्स पर शेयर किया गीता का श्लोक: स्वाभाविक कर्म से मिलती है परम सिद्धि
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार, 30 सितंबर 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 18 (मोक्षसंन्यासयोग) के श्लोक 45 को साझा किया और उसका विस्तृत अर्थ समझाया। यह पोस्ट कर्मयोग के उस सिद्धांत को रेखांकित करती है जिसके अनुसार अपने स्वाभाविक कर्म में तत्परता से लगा मनुष्य परम सिद्धि प्राप्त करता है।
कौन सा श्लोक शेयर किया
मोदी ने अपनी पोस्ट में संस्कृत श्लोक — 'स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।' — को उद्धृत किया। इसका अर्थ बताते हुए उन्होंने लिखा: 'जो मनुष्य अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्पर रहते हैं, वे परम सिद्धि को प्राप्त करते हैं। इसलिए अपने कर्मों में लगे मनुष्यों को यह अवश्य सुनना और जानना चाहिए कि अपने कर्मों का पालन करते हुए परम सिद्धि किस प्रकार प्राप्त की जाती है।'
श्लोक का गहरा संदेश
गीता के इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति का कर्म उसके स्वभाव और प्रकृति के अनुसार निर्धारित होता है। जो व्यक्ति अपने उस स्वाभाविक कर्म को पूरी निष्ठा और तत्परता से संपन्न करता है, वही उसकी सिद्धि का मार्ग बन जाता है — किसी अन्य के कर्म की नकल आवश्यक नहीं।
उदाहरण के रूप में — एक शिक्षक का धर्म पढ़ाना है, एक सैनिक का धर्म देश की रक्षा करना है और एक किसान का धर्म खेती करना है। यदि सभी अपने-अपने कर्म को ईमानदारी से निभाएँ, तो समाज में संतुलन बना रहता है और व्यक्ति को आत्मिक संतुष्टि भी मिलती है।
स्व-धर्म और विकास की अवधारणा
इस श्लोक में यह भी संकेत मिलता है कि जैसे-जैसे व्यक्ति की क्षमता और अनुभव बढ़ता है, उसका स्व-धर्म भी परिवर्तित होता जाता है। यह आध्यात्मिक उन्नति की एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति अपने उत्तरदायित्व का निष्ठापूर्वक निर्वहन करते हुए आगे बढ़ता है।
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी अपने सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से नियमित रूप से विभिन्न धर्मग्रंथों के श्लोक और उनके जीवन में महत्व को साझा करते रहते हैं। यह पोस्ट भी उसी परंपरा का हिस्सा है जो कर्म, कर्तव्य और आत्म-अनुशासन के मूल्यों को जनमानस तक पहुँचाती है।
सांस्कृतिक और सामाजिक प्रासंगिकता
स्व-धर्म की अवधारणा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत प्रासंगिक है। जब प्रत्येक व्यक्ति अपनी भूमिका को पहचानकर उसे श्रेष्ठता से निभाता है, तो समाज का समग्र ताना-बाना सुदृढ़ होता है। यह सोच भारतीय दर्शन की उस दीर्घकालीन परंपरा का हिस्सा है जो कर्तव्य को ही उपासना मानती है।
आने वाले समय में भी इस तरह के संदेश सार्वजनिक विमर्श में नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों की भूमिका को और सशक्त बनाते रहेंगे।