पीएम मोदी ने साझा किया संस्कृत सुभाषित: शास्त्रज्ञान, विवेक और कार्यकुशलता से बनता है सार्थक विकास का मार्ग
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 30 अक्टूबर 2026 को सोशल मीडिया पर एक प्राचीन संस्कृत सुभाषित साझा किया, जिसमें शास्त्रसम्मत आचरण, वैज्ञानिक दृष्टि और प्रभावी कार्यान्वयन के समन्वय से सतत विकास का संदेश दिया गया है। यह श्लोक मालवा के प्रतापी राजा भोज द्वारा रचित वास्तुशास्त्र ग्रंथ 'समराङ्गणसूत्रधार' के 44वें अध्याय के दूसरे श्लोक से लिया गया है।
कौन सा श्लोक साझा किया
पीएम मोदी द्वारा साझा किया गया संस्कृत श्लोक इस प्रकार है — 'शास्त्रं कर्म तथा प्रज्ञा शीलं क्रिययान्वितम्। लक्ष्यलक्षणयुक्तार्थशास्त्रनिष्ठो नरो भवेत्॥' इसका हिंदी भावार्थ है कि वास्तविक प्रगति शास्त्रज्ञान, विवेक, नैतिक आचरण और कार्यकुशलता के समन्वय से ही संभव होती है।
जब मनुष्य शास्त्रसम्मत आचरण के साथ अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वैज्ञानिक दृष्टि और प्रभावी क्रियान्वयन को अपनाता है, तभी सार्थक एवं सतत विकास का मार्ग प्रशस्त होता है।
समराङ्गणसूत्रधार: ग्रंथ की पृष्ठभूमि
राजा भोज ने 'समराङ्गणसूत्रधार' में एक कुशल वास्तुविद के आवश्यक गुणों की विस्तृत विवेचना की है। इस ग्रंथ के 44वें अध्याय में बताया गया है कि श्रेष्ठ आर्किटेक्ट के पास व्यावहारिक कार्य का अनुभव, तेज बुद्धि और सूझबूझ होनी चाहिए तथा उसका आचरण नैतिक एवं कर्म के प्रति पूर्ण समर्पित होना चाहिए।
गौरतलब है कि यह ग्रंथ भारतीय वास्तुशास्त्र की परंपरा में एक मूलभूत ग्रंथ के रूप में मान्य है और राजा भोज को उनके बहुविध ज्ञान के लिए भारतीय इतिहास में विशेष स्थान प्राप्त है।
श्लोक का व्यापक संदेश
राजा भोज के अनुसार, जो मनुष्य लक्ष्यों और शास्त्रों के सिद्धांतों के निहितार्थ को भलीभाँति समझकर शास्त्रनिष्ठ रहता है, वही सच्चा वास्तुशास्त्री बनने का अधिकारी है। सच्चा ज्ञानी वही है जिसके पास केवल किताबी ज्ञान और बुद्धि ही नहीं, बल्कि उसका चरित्र और कार्य भी उसके ज्ञान के अनुरूप हों।
इस श्लोक के माध्यम से यह भी संदेश दिया गया है कि व्यक्ति को अपने जीवन के उद्देश्य, उसके सही तौर-तरीकों और जीवन को सुचारु रूप से चलाने के व्यावहारिक नियमों के प्रति समर्पित होना चाहिए। यह ऐसे समय में प्रासंगिक है जब आधुनिक शासन में प्राचीन ज्ञानपरंपराओं की प्रासंगिकता पर राष्ट्रीय विमर्श जारी है।
पीएम मोदी की सुभाषित-परंपरा
प्रधानमंत्री मोदी समय-समय पर प्राचीन भारतीय ग्रंथों के श्लोक और सुभाषित सोशल मीडिया पर साझा करते रहे हैं, जो उनके सांस्कृतिक और दार्शनिक संदेश का हिस्सा होते हैं। यह पहल भारतीय ज्ञान परंपरा को समकालीन नीति-विमर्श से जोड़ने के उनके व्यापक प्रयास का अंग मानी जाती है।
आने वाले समय में भी ऐसे सुभाषितों के माध्यम से प्राचीन भारतीय ग्रंथों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने की यह परंपरा जारी रहने की संभावना है।