पीएम मोदी ने एक्स पर साझा किया संस्कृत सुभाषित: 'सत्य, शुभ और ज्ञानवर्धक वचन सुनें'
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 अगस्त 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक संस्कृत सुभाषित साझा किया, जिसमें उन्होंने नागरिकों से सत्य, शुभ और ज्ञानवर्धक वचन ग्रहण करने तथा कल्याणकारी विचारों को जीवन में अपनाने का आह्वान किया। यह उनकी नियमित रूप से सोशल मीडिया पर प्राचीन भारतीय ज्ञान-परंपरा साझा करने की श्रृंखला का हिस्सा है।
मोदी का सोमवार का सुभाषित
प्रधानमंत्री ने अपनी पोस्ट में लिखा: 'हम सत्य, शुभ और ज्ञानवर्धक वचन सुनें, कल्याणकारी विचारों को अपनाएं। स्वस्थ शरीर, उत्तम आचरण और श्रेष्ठ गुणों के साथ जीवन को लोकहित में समर्पित करें तथा सत्य, प्रामाणिक और जनहितकारी सूचनाओं का प्रसार कर राष्ट्र और समाज को जागरूक, सशक्त तथा समरस बनाएं।'
इसके साथ उन्होंने ऋग्वेद का यह श्लोक भी साझा किया: 'भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥ स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥' — जिसका आशय है कि हम अपने कानों से शुभ सुनें, नेत्रों से शुभ देखें, दृढ़ अंगों और स्वस्थ शरीर के साथ देवताओं की स्तुति करते हुए ईश्वर-प्रदत्त आयु को सार्थक बनाएं।
पिछले सुभाषितों की श्रृंखला
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी ने 7 अगस्त को भी एक संस्कृत श्लोक साझा किया था: 'किं चन्द्रमाः प्रत्युपकारलिप्सया करोति गोभिः कुमुदावबोधनम्। स्वभाव एवोन्नतचेतसां सतां परोपकारव्यसनं हि जीवितम्॥' इस श्लोक का अर्थ है कि जिस प्रकार चंद्रमा बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के अपनी किरणों से कुमुदिनी को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार महान और उदार हृदय वाले सज्जन स्वाभाविक रूप से परोपकार करते हैं।
इससे पहले 6 अगस्त को प्रधानमंत्री ने मातृभूमि-वंदना का श्लोक साझा किया था: 'विश्वस्वं मातरमोषधीनां ध्रुवां भूमिं पृथिवीं धर्मणा धृताम्। शिवां स्योनामनु चरेम विश्वहा॥' जिसका अर्थ है कि सभी श्रेष्ठ वनस्पतियों और औषधियों को धारण करने वाली, धर्म से पोषित और कल्याणकारी मातृभूमि की हम सदैव सेवा करें।
सुभाषित-परंपरा का महत्व
यह ऐसे समय में आया है जब सोशल मीडिया पर भ्रामक सूचनाओं और असत्य के प्रसार को लेकर व्यापक चिंता जताई जा रही है। प्रधानमंत्री का 'सत्य और जनहितकारी सूचनाओं के प्रसार' पर जोर इस संदर्भ में विशेष रूप से प्रासंगिक माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री द्वारा प्राचीन भारतीय ग्रंथों — वेद, उपनिषद और नीतिशास्त्र — से नियमित रूप से सुभाषित साझा करने की यह परंपरा उनके सांस्कृतिक कूटनीति और 'विरासत पर गर्व' के व्यापक संदेश से जुड़ती है।
आगे की दिशा
प्रधानमंत्री की यह सुभाषित-श्रृंखला आगे भी जारी रहने की संभावना है, जो भारतीय दर्शन और वैदिक ज्ञान को आधुनिक सार्वजनिक विमर्श से जोड़ने का प्रयास करती है।