बड़ा फैसला: राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल भाजपा में शामिल, नितिन नवीन ने मिठाई खिलाकर किया स्वागत
सारांश
Key Takeaways
- राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने 24 अप्रैल 2025 को 'आप' छोड़कर भाजपा की सदस्यता ग्रहण की।
- राज्यसभा में 'आप' के 10 में से 7 सांसदों ने भाजपा विलय दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए — यह संवैधानिक दो-तिहाई सीमा से अधिक है।
- भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने भाजपा राष्ट्रीय कार्यालय में मिठाई खिलाकर तीनों नेताओं का स्वागत किया।
- विलय में शामिल अन्य सांसदों में हरभजन सिंह, राजेंद्र गुप्ता, विक्रम साहनी और स्वाति मालीवाल के नाम भी शामिल हैं।
- 'आप' सांसद संजय सिंह ने इसे 'ऑपरेशन लोटस' बताते हुए ईडी और सीबीआई के दबाव का आरोप लगाया।
- यह विलय पंजाब की भगवंत मान सरकार के लिए राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण संकेत माना जा रहा है।
नई दिल्ली, 24 अप्रैल: राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने आम आदमी पार्टी (आप) से इस्तीफा देकर शुक्रवार को आधिकारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सदस्यता ग्रहण की। तीनों नेता भाजपा के राष्ट्रीय कार्यालय पहुंचे, जहां पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने मिठाई खिलाकर उनका भव्य स्वागत किया। यह घटनाक्रम भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है।
राज्यसभा में 'आप' का विलय — क्या हुआ 24 अप्रैल को?
राघव चड्ढा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर पोस्ट करते हुए बताया कि भारत के संविधान के प्रावधानों का उपयोग करते हुए राज्यसभा में 'आप' के दो-तिहाई से अधिक सांसदों ने भाजपा में विलय कर लिया है। उन्होंने कहा कि 7 सांसदों ने उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए जिसे राज्यसभा के सभापति को सौंपा गया।
चड्ढा ने स्पष्ट किया कि उन्होंने स्वयं दो अन्य सांसदों के साथ व्यक्तिगत रूप से हस्ताक्षरित दस्तावेज सभापति को सुपुर्द किए। उनके अनुसार, हरभजन सिंह, राजेंद्र गुप्ता, विक्रम साहनी और स्वाति मालीवाल भी इस विलय में शामिल हैं।
भाजपा कार्यालय में स्वागत समारोह
तीनों नेताओं के भाजपा राष्ट्रीय कार्यालय पहुंचने पर राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने पारंपरिक तरीके से मिठाई खिलाकर उनका अभिनंदन किया। यह स्वागत समारोह इस बात का प्रतीक था कि भाजपा इस विलय को अपनी बड़ी राजनीतिक जीत के रूप में देख रही है।
राज्यसभा में 'आप' के कुल 10 सांसद हैं। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए किसी दल के कम से कम दो-तिहाई सांसदों का विलय में शामिल होना आवश्यक है — और यह सीमा पार कर ली गई है।
'आप' का पलटवार — 'ऑपरेशन लोटस' का आरोप
आम आदमी पार्टी ने इस पूरे घटनाक्रम को 'ऑपरेशन लोटस' करार दिया है। पार्टी का आरोप है कि ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) और सीबीआई जैसी केंद्रीय एजेंसियों का भय दिखाकर पार्टी नेताओं को तोड़ने की सुनियोजित साजिश रची गई।
'आप' के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि 'ऑपरेशन लोटस' के जरिए भाजपा पंजाब की भगवंत मान सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने इसे पंजाब और पंजाब की जनता के साथ विश्वासघात बताया और कहा कि पंजाब की जनता इसे कभी नहीं भूलेगी।
राजनीतिक विश्लेषण — इस विलय का व्यापक अर्थ
यह घटनाक्रम महज एक दल-बदल नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में एक बड़े शक्ति-संतुलन का संकेत है। गौरतलब है कि 'ऑपरेशन लोटस' की अवधारणा पहले कर्नाटक और मध्य प्रदेश में भी चर्चा में आई थी, जहां विपक्षी विधायकों के दल-बदल ने सरकारें बदल दी थीं।
पंजाब में भगवंत मान सरकार के लिए यह राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण संकेत है। हालांकि राज्यसभा सांसदों के दल-बदल से विधानसभा सरकार सीधे नहीं गिरती, लेकिन यह 'आप' की राष्ट्रीय छवि और संगठनात्मक एकता पर गहरा प्रश्नचिह्न लगाता है।
राघव चड्ढा जैसे युवा और मुखर नेता का भाजपा में जाना, जो कभी अरविंद केजरीवाल के सबसे करीबी चेहरों में गिने जाते थे, पार्टी के लिए एक बड़ा नैतिक और संगठनात्मक झटका है। आने वाले दिनों में राज्यसभा सभापति का इस विलय पर अंतिम निर्णय और 'आप' की कानूनी रणनीति इस पूरे प्रकरण की दिशा तय करेगी।