भवानी मंडी चुनाव: BJP के वरिष्ठ नेता रामलाल गुर्जर ने 40 साल बाद छोड़ी पार्टी, बहू संग थामा कांग्रेस का हाथ
सारांश
मुख्य बातें
राजस्थान के भवानी मंडी नगर परिषद चुनाव से ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। नामांकन प्रक्रिया के अंतिम दिन 31 अगस्त को पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व अध्यक्ष रामलाल गुर्जर ने लगभग 40 वर्षों की सदस्यता के बाद BJP छोड़ दी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) में शामिल हो गए। उनके साथ उनकी बहू और पूर्व अध्यक्ष पिंकी गुर्जर तथा पूर्व सांसद सुगना गुर्जर ने भी कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की।
कांग्रेस में शामिल होने की वजह
रामलाल गुर्जर ने स्पष्ट किया कि उन्होंने यह निर्णय इसलिए लिया क्योंकि कांग्रेस ने उन्हें सम्मान और स्नेह दिया। उनके अनुसार, लगभग 40 वर्षों तक BJP से जुड़े रहने के बावजूद उन्होंने अंततः दल बदलने का फैसला किया। डग्ग विधानसभा क्षेत्र के उपाध्यक्ष चेतन गहलोत, ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष रॉड सिंह परमार और नगर निगम कांग्रेस अध्यक्ष विनय अस्तोलिया ने तीनों नेताओं को कांग्रेस का स्कार्फ भेंट कर औपचारिक रूप से पार्टी में स्वागत किया।
भवानी मंडी के राजनीतिक समीकरण पर असर
तीन प्रमुख राजनीतिक हस्तियों के एक साथ कांग्रेस में शामिल होने से भवानी मंडी के स्थानीय राजनीतिक समीकरणों में उल्लेखनीय बदलाव आने की आशंका जताई जा रही है। भवानी मंडी नगर परिषद में कुल 45 वार्ड हैं और इस बार 250 से अधिक उम्मीदवारों के मैदान में उतरने की उम्मीद है। BJP और कांग्रेस के अलावा आम आदमी पार्टी (AAP) और निर्दलीय उम्मीदवार भी चुनाव में भाग लेने की तैयारी में हैं।
नौ वार्ड बनेंगे निर्णायक
चुनावी विश्लेषकों के अनुसार, नगर परिषद बोर्ड के गठन की दृष्टि से नौ वार्ड विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। इनमें वार्ड संख्या 4, 12, 14, 17, 26 और 33 प्रमुख माने जा रहे हैं। दोनों प्रमुख दल इन वार्डों में मज़बूत उम्मीदवार उतारने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। यह ऐसे समय में आया है जब BJP और कांग्रेस ने अभी तक अपने उम्मीदवारों की पूरी सूची जारी नहीं की है — रिपोर्टों के अनुसार, पार्टियाँ आंतरिक विद्रोह की संभावना को कम करने के लिए सूचियाँ देर से जारी करने की रणनीति अपना रही हैं।
बहुकोणीय मुकाबले की संभावना
कई वार्डों में त्रिकोणीय या चौतरफा मुकाबले की स्थिति बन सकती है, जिससे किसी भी एक दल के लिए स्पष्ट बहुमत हासिल करना कठिन हो सकता है। ऐसे परिदृश्य में AAP और निर्दलीय पार्षद 'किंगमेकर' की भूमिका में आ सकते हैं। गौरतलब है कि जिन उम्मीदवारों को पसंदीदा पार्टी से टिकट नहीं मिलता, वे निर्दलीय के रूप में मैदान में उतर सकते हैं, जिससे मुकाबला और अधिक अप्रत्याशित हो जाएगा। नामांकन के बाद पार्टी चिन्हों के वितरण से चुनावी तस्वीर और स्पष्ट होने की उम्मीद है।