रणछोड़राय की कथा: भक्त बोदना की श्रद्धा से द्वारका छोड़ बैलगाड़ी में डाकोर पधारे श्रीकृष्ण
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात के खेड़ा जिले में स्थित डाकोर भगवान श्रीकृष्ण के रणछोड़राय स्वरूप के सबसे प्रतिष्ठित तीर्थस्थलों में से एक है, जहाँ प्रतिवर्ष देशभर से लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। इस धाम की महिमा केवल उसके भव्य मंदिर तक सीमित नहीं है — यहाँ की लोकपरंपरा में एक ऐसी अलौकिक कथा जीवित है, जिसके अनुसार स्वयं भगवान श्रीकृष्ण अपने परम भक्त की अटूट श्रद्धा से विभोर होकर द्वारका छोड़ एक साधारण बैलगाड़ी में बैठकर डाकोर चले आए।
भक्त बोदना की अनन्य भक्ति
इस कथा का केंद्र हैं भगवान कृष्ण के परम भक्त बोदना, जिनकी पत्नी का नाम गंगाबाई बताया जाता है। मान्यता के अनुसार, पूर्वजन्म में बोदना गोकुल में विजयआनंद नामक ग्वाले थे और भगवान कृष्ण के प्रति उनके मन में गहरी आस्था थी। कलियुग में उनका जन्म गुजरात में बोदना के रूप में हुआ और वे श्रीकृष्ण के अनन्य उपासक बन गए।
उनकी भक्ति का स्वरूप अनूठा था — वे हर छह महीने में हाथ में तुलसी का पौधा लेकर द्वारका पहुँचते और भगवान को तुलसी दल अर्पित करते। परंतु जब वे लगभग 72 वर्ष के हुए, तो वृद्धावस्था के कारण इतनी लंबी यात्रा उनके लिए कठिन होने लगी। शरीर थकने लगा, किंतु भगवान के दर्शन की लालसा जरा भी कम नहीं हुई।
भगवान का वचन और बैलगाड़ी की यात्रा
लोककथा के अनुसार, भक्त की पीड़ा देख भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं बोदना को दर्शन दिए और कहा कि अगली बार वे द्वारका आते समय अपने साथ एक बैलगाड़ी लेकर आएँ — भगवान ने वचन दिया कि वे उनके साथ डाकोर चलेंगे। भक्त ने यह वचन शिरोधार्य किया।
बोदना जब बैलगाड़ी लेकर द्वारका पहुँचे, तो वहाँ के पुजारियों ने आश्चर्य से पूछा कि इस गाड़ी की क्या आवश्यकता है। बोदना ने सरल भाव से उत्तर दिया कि वे भगवान को अपने साथ डाकोर ले जाने आए हैं। पुजारियों को उनकी बात पर विश्वास नहीं हुआ। रात में मंदिर के गर्भगृह के द्वार बंद कर दिए गए।
कथा के अनुसार, आधी रात को भगवान कृष्ण ने स्वयं मंदिर के बंद द्वार खोले, बोदना को जगाया और उनके साथ चल पड़े। बोदना भगवान की प्रतिमा को बैलगाड़ी में विराजमान कर डाकोर की ओर प्रस्थान कर गए।
मार्ग में मीठी नीम का चमत्कार
डाकोर के निकट बिलेश्वर महादेव मंदिर के पास दोनों ने कुछ समय विश्राम किया। लोकमान्यता है कि उस स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण ने एक नीम की शाखा को स्पर्श किया, जिससे उस शाखा का स्वाद मीठा हो गया, जबकि शेष शाखाएँ कड़वी ही रहीं। आज भी इस मीठी नीम की कथा डाकोर की लोकपरंपरा में बड़े प्रेम से सुनाई-सुनाई जाती है।
द्वारका के पुजारियों का आगमन और गंगाबाई का बलिदान
जब द्वारका के पुजारियों को ज्ञात हुआ कि मंदिर में प्रतिमा नहीं है, तो वे बोदना का पीछा करते हुए डाकोर पहुँच गए। घबराए हुए बोदना को मान्यतानुसार भगवान ने निर्देश दिया कि वे प्रतिमा को गोमती तालाब में छिपा दें। इसके बाद बोदना पुजारियों से बात करने पहुँचे, परंतु इसी विवाद के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।
पुजारी प्रतिमा को वापस द्वारका ले जाने की जिद पर अड़े रहे। तब कथा के अनुसार भगवान कृष्ण ने बोदना की पत्नी गंगाबाई को स्वप्न में निर्देश दिया कि वे प्रतिमा के वजन के बराबर सोना देकर पुजारियों को संतुष्ट करें। गरीब गंगाबाई के पास केवल सोने की एक छोटी-सी नथ थी। मान्यता है कि उस क्षण भगवान की प्रतिमा चमत्कारिक रूप से इतनी हल्की हो गई कि उसका वजन उसी नथ के बराबर निकला।
डाकोर में रणछोड़राय का शाश्वत वास
भगवान ने पुजारियों को यह भी आश्वासन दिया कि छह महीने बाद द्वारका के एक कुएँ में उनकी प्रतिमा का प्रतिरूप प्रकट होगा। इस प्रकार डाकोर में भगवान रणछोड़राय का स्थायी वास स्वीकार किया गया। यह कथा आज भी लाखों श्रद्धालुओं को डाकोर की ओर खींचती है और भक्ति तथा ईश्वरीय कृपा की अमर मिसाल के रूप में जीवित है।