पूर्व नौकरशाहों का खुला पत्र: बिना सबूत 'रिग्ड' चुनाव के आरोप लोकतंत्र को कमज़ोर करते हैं
सारांश
मुख्य बातें
पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल, पूर्व राजदूतों और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारियों सहित पूर्व सिविल सेवकों के एक समूह ने 10 अक्टूबर 2026 को भारत की चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता का बचाव करते हुए एक संयुक्त खुला पत्र जारी किया। पत्र में बिना साक्ष्य के चुनावों को 'रिग्ड' बताने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाते हुए नागरिकों से स्थापित बहुदलीय सुरक्षा उपायों पर भरोसा रखने और सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का सम्मान करने की अपील की गई।
पत्र का मूल संदेश
पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि चुनावों को 'रिग्ड' बताने के लिए इस शब्द का बार-बार और बिना प्रमाण के उपयोग लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों के भरोसे को गंभीर नुकसान पहुँचाता है। पत्र लिखने वाले अधिकारियों ने कहा कि उन्होंने अपने पूरे करियर में भारत के चुनावों का संचालन किया है — मतदाता सूची तैयार करने, मतदान कर्मियों को प्रशिक्षित करने, स्ट्रॉन्ग रूम सील करने और मतगणना की निगरानी जैसे कार्य उनके अनुभव का हिस्सा रहे हैं। पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया कि इन अधिकारियों का किसी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है।
ऐतिहासिक संदर्भ और सुधार की यात्रा
पूर्व अधिकारियों ने अतीत की उन घटनाओं का उल्लेख किया जब बूथों पर हथियारबंद लोगों की मौजूदगी, मतपेटियों में अवैध मतपत्र डालना और मतदाताओं को रोकना जैसी समस्याएँ वास्तविक थीं। उन्होंने याद दिलाया कि बूथ कैप्चरिंग की समस्या इतनी गंभीर थी कि संसद ने 1989 में इसे अपराध घोषित किया। इसके विपरीत, पत्र में दावा किया गया कि बिहार में 2025 का विधानसभा चुनाव बिना किसी पुनर्मतदान के संपन्न हुआ — राज्य के इतिहास में यह पहली बार था — और 1951 के बाद सर्वाधिक मतदान दर्ज की गई, जिसमें महिलाओं ने रिकॉर्ड संख्या में भाग लिया।
चुनावी सुरक्षा उपायों की बहुस्तरीय व्यवस्था
पत्र में चुनावी प्रक्रिया की निगरानी के विभिन्न स्तरों का विस्तार से वर्णन किया गया है। प्रत्येक उम्मीदवार का एजेंट मतदान केंद्र पर उपस्थित रह सकता है और हस्ताक्षरित मतगणना प्रति अपने साथ ले जाता है। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) को एजेंटों के हस्ताक्षर के साथ सील किया जाता है और स्ट्रॉन्ग रूम में सुरक्षित रखा जाता है, जहाँ उम्मीदवारों के प्रतिनिधि निगरानी कर सकते हैं। कागजी पर्चियों से मिलान की व्यवस्था को सर्वोच्च न्यायालय ने 2024 में बरकरार रखा था। पत्र में तर्क दिया गया कि व्यापक धांधली के लिए अलग-अलग दलों की सरकारों के अधीन काम करने वाले हजारों अधिकारियों और हारने वाले दलों के एजेंटों की मिलीभगत अनिवार्य होगी — जिसे अब तक कभी साबित नहीं किया जा सका।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका
पूर्व अधिकारियों ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का बचाव करते हुए बताया कि बिहार की मतदाता सूची का पिछला गहन पुनरीक्षण 2003 में हुआ था। 2025 के पुनरीक्षण में लगभग 22 लाख मृत मतदाताओं, 7 लाख दोहराव वाली प्रविष्टियों और स्थायी रूप से प्रवासित लाखों लोगों के नाम सामने आए। साथ ही लगभग 21.5 लाख नए मतदाताओं को भी जोड़ा गया। पत्र के अनुसार, 27 मई 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत चुनाव आयोग के अधिकार को बरकरार रखा और गलत तरीके से हटाए गए मतदाताओं के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपाय भी जोड़े। अदालत ने मसौदा सूची से बाहर रखे गए सभी 65 लाख लोगों के नाम और कारण प्रकाशित करने का निर्देश दिया।
चुनाव आयोग की संरचना और राजनीतिक जवाबदेही
पत्र में चुनाव आयोग की बहुसदस्यीय संरचना का उल्लेख किया गया, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने 1995 में बरकरार रखा था। इसी आयोग के कार्यकाल में केंद्र में सत्तारूढ़ दल हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, झारखंड और जम्मू-कश्मीर में चुनाव हार चुका है और 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे अपने दम पर बहुमत नहीं मिला। पत्र में कहा गया कि जीत के समय चुनावी व्यवस्था को निष्पक्ष और हार के बाद धांधलीपूर्ण बताना तर्कसंगत नहीं है। पत्र के अंत में नागरिकों से अपनी और परिवार, पड़ोसियों तथा प्रवासी श्रमिकों की मतदाता सूची प्रविष्टियों की जाँच करने और ज़रूरत पड़ने पर दावा दाखिल करने में सहायता करने की अपील की गई।