क्या रोज़ 15-20 मिनट योग की वायु मुद्रा करने से पेट में गैस और जोड़ों के दर्द से राहत मिलेगी?
सारांश
Key Takeaways
- वायु मुद्रा का अभ्यास पेट की गैस और जोड़ों के दर्द में राहत देता है।
- यह मुद्रा तंत्रिका तंत्र को संतुलित करती है।
- रक्त संचार में सुधार करती है।
- पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद है।
- दैनिक 15-20 मिनट का अभ्यास करें।
नई दिल्ली, 22 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। आज मोबाइल और लैपटॉप पर अत्यधिक समय बिताने, अस्वस्थ खानपान और भागदौड़ भरी दिनचर्या ने हमारे शरीर को आंतरिक रूप से थका दिया है। इस स्थिति में लोग अक्सर पेट की समस्याओं, गैस, कब्ज, बेचैनी, घबराहट, जोड़ों के दर्द या नींद न आने जैसी परेशानियों को नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि ये संकेत हैं कि शरीर का संतुलन बिगड़ रहा है।
आयुर्वेद के अनुसार जब शरीर के भीतर ऊर्जा का प्रवाह रुकता है, तभी बीमारियों का जन्म होता है। इस ऊर्जा को संतुलित करने का एक सरल तरीका हस्त मुद्राएं हैं। उंगलियों के माध्यम से हम सीधे मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र से जुड़ते हैं।
उंगलियों की एक विशिष्ट मुद्रा का शरीर पर गहरा प्रभाव पड़ता है। आयुर्वेद के अनुसार हमारा शरीर पंचभूतों - आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी से निर्मित है। इनमें से यदि कोई तत्व असंतुलित होता है, तो इसका सीधा प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ता है। इसमें वायु तत्व को सबसे ज्यादा अस्थिर माना गया है। यदि यह तत्व शरीर में बिगड़ जाए, तो गैस, अपच, कब्ज, बेचैनी, जोड़ों का दर्द, दिल की धड़कन का बढ़ना और घबराहट जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
इसी वायु तत्व को शांत और संतुलित करने के लिए योग में एक विशेष मुद्रा को वायु मुद्रा कहा जाता है। यह मुद्रा देखने में आसान है, लेकिन इसका प्रभाव शरीर के भीतर गहराई तक जाता है। आयुर्वेद का मानना है कि अंगूठा अग्नि तत्व का प्रतीक है और तर्जनी उंगली वायु तत्व का। जब हम तर्जनी उंगली को मोड़कर अंगूठे के नीचे दबाते हैं, तो अग्नि तत्व वायु पर नियंत्रण कर लेता है।
वायु मुद्रा करने की विधि बहुत सरल है। किसी शांत स्थान पर बैठ जाएं। रीढ़ को सीधा रखें और आंखें बंद कर लें। अब तर्जनी उंगली को मोड़कर अंगूठे के नीचे दबाएं और बाकी तीन उंगलियों को सीधा रखें। सांस को सामान्य रखें। इस मुद्रा में बैठते ही शरीर धीरे-धीरे रिलैक्स होने लगता है। रोजाना कम से कम 15 से 20 मिनट तक इसका अभ्यास करने से बेहतर परिणाम मिलते हैं।
सुबह खाली पेट शांत मन से किया गया अभ्यास अधिक प्रभावी माना जाता है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर इसे कुर्सी पर बैठकर या चलते-फिरते भी किया जा सकता है।
वायु मुद्रा का प्रभाव शरीर के तंत्रिका तंत्र पर सबसे पहले दिखाई देता है। यह मुद्रा नर्व्स पर काम करती है, जिससे बेचैनी, घबराहट और तनाव धीरे-धीरे कम होने लगते हैं। जब दिमाग शांत होता है, तब शरीर के अंग भी बेहतर तरीके से कार्य करने लगते हैं। पाचन तंत्र पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है।
गैस, सूजन और अपच जैसी समस्याएं इसलिए होती हैं क्योंकि आंतों में वायु फंस जाती है। वायु मुद्रा इस फंसी हुई ऊर्जा को बाहर निकलने में मदद करती है, जिससे पेट हल्का महसूस होता है।
इस मुद्रा से रक्त संचार भी बेहतर होता है। जब रक्त प्रवाह सुधरता है तो जोड़ों और मांसपेशियों तक पोषण पहुंचता है। यही कारण है कि जोड़ों के दर्द, साइटिका और मांसपेशियों की जकड़न में भी यह मुद्रा सहायक मानी जाती है।