नवरात्रि नवमी पर रूपाल में मां वरदायिनी की पल्ली, लाखों श्रद्धालुओं ने घी चढ़ाकर मांगा आशीर्वाद
सारांश
मुख्य बातें
गांधीनगर के रूपाल गांव में 20 अक्टूबर 2026 को नवरात्रि की आश्विन शुक्ल नवमी पर मां वरदायिनी की ऐतिहासिक पल्ली यात्रा निकली, जिसमें लाखों श्रद्धालु उमड़े और पल्ली पर शुद्ध घी अर्पित कर अपनी मनोकामनाएं पूर्ण कीं। गुजरात के विभिन्न क्षेत्रों से आए भक्त घी के पीपे और बर्तन लेकर पहुंचे, और पूरा रूपाल मां के जयकारों से गूंज उठा।
पल्ली की परंपरा और पांडवकालीन मान्यता
रूपाल की पल्ली यात्रा की जड़ें पांडवकाल तक जाती हैं। लोकमान्यता के अनुसार, पांडव अपने 12 वर्ष के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास के दौरान रूपाल के जंगलों में आए थे, जहाँ बरखेड़ा के वृक्ष के नीचे उन्होंने अपने शस्त्र छिपाए थे। शस्त्रों की रक्षा के लिए उन्होंने मां वरदायिनी से प्रार्थना की थी।
युद्ध में विजय प्राप्त करने के पश्चात पांडवों, भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी ने माँ के सम्मान में सोने की पल्ली बनवाई थी। इसी मान्यता के साथ आश्विन शुक्ल नवमी के दिन पल्ली यात्रा निकालने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
पल्लीरथ की तैयारी और सामूहिक भागीदारी
खेजड़े की लकड़ी से तैयार होने वाला यह पल्लीरथ केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि अठारह आलम की एकता और सामूहिक संस्कृति का भी जीवंत प्रमाण है। गांव के विभिन्न समाज — वाल्मीकि, नाई, कुम्हार, पिंजारा, पांचाल, माली और ब्राह्मण समाज — अपनी-अपनी पारंपरिक सेवाएं देते हैं, जो इस परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत बनाए रखती है।
सुथार समुदाय के एक कारीगर ने बताया, 'रूपाल गांव गांधीनगर जिले में स्थित है और इस गांव में वरदायिनी माता का मंदिर है।' पल्ली तैयार होने के बाद विधि-विधान से पूजा-अर्चना संपन्न की जाती है, उसके बाद पल्ली यात्रा आरंभ होती है।
घी की नदियाँ और श्रद्धालुओं की आस्था
पल्ली जैसे-जैसे रूपाल के अलग-अलग चौकों और गलियों से होकर गुजरती है, श्रद्धालु उस पर निरंतर घी अर्पित करते जाते हैं। देखते ही देखते सड़कों पर घी बहने लगता है और कई स्थानों पर घी की नदियों जैसा अद्भुत दृश्य निर्मित हो जाता है।
बच्चे के जन्म के बाद माँ के दर्शन कराने की विशेष मान्यता है। महिलाएं सिर पर घड़ुलिया लेकर गरबा करती हैं, जबकि युवा पल्ली को एक चौक से दूसरे चौक तक ले जाते हैं।
वाल्मीकि समाज की पारंपरिक भूमिका
रूपाल की पल्ली से जुड़ी एक विशेष परंपरा वाल्मीकि समाज की सेवा से संबंधित है। पल्ली पर घी अर्पित होने के बाद सड़कों पर एकत्र हुए घी को वाल्मीकि समाज के लोग संग्रहित करते हैं और उसे अपने घर ले जाते हैं। यह प्रक्रिया पल्ली से जुड़ी पारंपरिक व्यवस्था का अभिन्न अंग मानी जाती है।
गांव के विभिन्न समाजों की यह सामूहिक भागीदारी रूपाल की पल्ली को धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक एकता, आपसी सहयोग और सर्वधर्म समभाव का संदेश देने वाला अनूठा उत्सव बनाती है। आने वाले वर्षों में भी यह परंपरा रूपाल की पहचान के रूप में जीवित रहेगी।