सुप्रीम कोर्ट ने संजय राउत और निखिल वागले को जारी किया नोटिस, न्यायपालिका पर टिप्पणी पड़ी भारी
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 16 अक्टूबर 2026 को शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत और वरिष्ठ पत्रकार निखिल वागले को नोटिस जारी किया, जो सर्वोच्च न्यायालय बार एसोसिएशन (SCBA) के अध्यक्ष प्रदीप कुमार राय द्वारा दाखिल याचिका पर आधारित है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि दोनों की टिप्पणियाँ न्यायपालिका की गरिमा के विरुद्ध थीं।
नोटिस की पृष्ठभूमि
SCBA अध्यक्ष प्रदीप कुमार राय ने कहा कि उन्हें यह याचिका बड़े अफसोस के साथ दाखिल करनी पड़ी। उनके अनुसार, संजय राउत और निखिल वागले दोनों समाज में जिम्मेदार पदों पर हैं, इसलिए उनकी टिप्पणियाँ और भी दुर्भाग्यपूर्ण हैं। राय ने कहा, "मैंने निखिल वागले के लेख कई बार पढ़े हैं और उनके काम को करीब से देखा है। उन दोनों की टिप्पणियाँ बेहद दुर्भाग्यपूर्ण थीं। मेरा मानना है कि ऐसी बातों की कोई आवश्यकता नहीं थी — तथ्यों की जाँच होनी चाहिए थी और अपशब्दों से बचना चाहिए था।"
संस्थान की गरिमा पर जोर
राय ने न्यायिक संस्थाओं के प्रति सम्मान पर जोर देते हुए कहा कि जिस संस्थान में आप काम करते हैं, उसका सम्मान करना आपकी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा, "जिस संस्थान को पूरा देश मानता है, उसके साथ ऐसा व्यवहार उचित नहीं। एक संस्थान स्थायी होता है — लोग आते जाते रहते हैं, लेकिन संस्थान हमसे पहले भी था और हमारे बाद भी रहेगा।" राय ने सभी से अपील की कि वे टिप्पणी करने से पहले जिम्मेदारी से सोचें और न्यायिक संस्थाओं के खिलाफ बोलने से बचें।
ट्विशा शर्मा मामले में ट्रांसफर याचिका
इसी सुनवाई के दौरान, मरहूम ट्विशा शर्मा के पिता नवनिधि शर्मा की ओर से वकील अभिजीत सिन्हा ने एक ट्रांसफर याचिका दाखिल करने की जानकारी दी। याचिका में भोपाल में चल रहे मुकदमे को मध्य प्रदेश से बाहर नई दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट में स्थानांतरित करने की मांग की गई है, क्योंकि पिता दिल्ली NCR क्षेत्र में रहते हैं। सिन्हा ने यह भी बताया कि आरोपी न्यायिक पृष्ठभूमि से है और वहाँ काफी प्रभावशाली है। न्यायालय के समक्ष एक सीलबंद लिफाफे में कुछ सामग्री भी जमा की गई है।
अगली सुनवाई की तारीख
अधिवक्ता जगत सिंह ने बताया कि आज मामले को स्थगित कर दिया गया और अब 26 अक्टूबर को सुबह 10:30 बजे सुनवाई होगी। सर्वोच्च न्यायालय ने एक आदेश पारित किया था, लेकिन उसकी प्रति अभी तक न्यायालय को प्राप्त नहीं हुई थी, जिसके चलते न्यायाधीश आगे की कार्रवाई से पहले आदेश की समीक्षा करना चाहते थे। गौरतलब है कि न्यायपालिका की आलोचना और अवमानना की सीमारेखा पर यह मामला भविष्य में महत्वपूर्ण मिसाल कायम कर सकता है।