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तमिलनाडु सरकार ने कानून-व्यवस्था विंग को आरटीआई से किया बाहर, पुलिसिंग रिकॉर्ड तक पहुँच सीमित

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तमिलनाडु सरकार ने कानून-व्यवस्था विंग को आरटीआई से किया बाहर, पुलिसिंग रिकॉर्ड तक पहुँच सीमित

सारांश

तमिलनाडु सरकार ने कानून-व्यवस्था विंग को आरटीआई से बाहर कर दिया है — यानी हिरासत में मौत, सांप्रदायिक झड़पों और प्रदर्शनों के रिकॉर्ड तक नागरिकों की पहुँच अब बेहद मुश्किल होगी। भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन के मामले कानूनी रूप से छूट से बाहर हैं, लेकिन असल लड़ाई अब उनकी परिभाषा पर होगी।

मुख्य बातें

तमिलनाडु सरकार ने पब्लिक डिपार्टमेंट के कानून-व्यवस्था विंग को आरटीआई अधिनियम के दायरे से बाहर कर दिया है।
प्रभावित रिकॉर्ड्स में पुलिस गिरफ्तारी, हिरासत, कैदियों की मौत, सांप्रदायिक झड़पें और प्रदर्शनों से जुड़े दस्तावेज़ शामिल हैं।
मासिक कानून-व्यवस्था समीक्षा बैठकों और संसदीय प्रश्नों के लिए तैयार सामग्री भी इस छूट के दायरे में आई।
आरटीआई अधिनियम की धारा 24(4) के तहत भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन की जानकारी इस छूट से बाहर रहेगी।
इस अधिसूचना को राज्य विधानसभा के सामने रखना और राज्य सूचना आयोग की मंजूरी की प्रक्रिया अनिवार्य रहेगी।

तमिलनाडु सरकार ने अपने पब्लिक डिपार्टमेंट के कानून-व्यवस्था विंग को सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के दायरे से बाहर करने का आधिकारिक आदेश जारी कर दिया है। इस फैसले से चेन्नई सहित पूरे राज्य में पुलिसिंग, विरोध-प्रदर्शन और सुरक्षा से संबंधित रिकॉर्ड तक आम नागरिकों की पहुँच प्रतिबंधित हो जाएगी। सरकार ने इस विंग को खुफिया और सुरक्षा कार्यों में संलग्न संस्था के रूप में वर्गीकृत करते हुए यह निर्णय लिया है।

किन रिकॉर्ड्स पर पड़ेगा असर

इस आदेश के लागू होने के बाद आरटीआई के सामान्य अनुरोधों के माध्यम से कई महत्वपूर्ण दस्तावेज़ प्राप्त करना संभव नहीं रहेगा। प्रभावित रिकॉर्ड्स में कानून-व्यवस्था से जुड़ी घटनाओं, सांप्रदायिक और जातीय झड़पों, पुलिस गिरफ्तारी और हिरासत, कैदियों की मौत तथा पुलिस जाँच रिपोर्ट के संदर्भ में नियुक्त जाँच आयोगों के कागज़ात शामिल हैं।

इसके अतिरिक्त, मुख्य सचिव के निर्देश पर आयोजित मासिक कानून-व्यवस्था समीक्षा बैठकों और विशेष परिस्थितियों में बुलाई गई बैठकों के विवरण भी इस छूट के दायरे में आ जाएँगे। ये बैठकें अशांति के आकलन, पुलिसिंग प्रबंधन की समीक्षा और प्रशासनिक निर्णय लेने के लिए होती हैं।

उल्लेखनीय है कि यह आदेश लोकसभा और राज्यसभा में कानून-व्यवस्था से संबंधित प्रश्नों के उत्तर हेतु तैयार की गई सामग्री पर भी लागू होगा। इसके साथ ही छात्रों, किसानों और राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के प्रदर्शनों से जुड़े रिकॉर्ड, मानहानिकारक लेख, समाचार क्लिपिंग और भाषण — जिनकी यह विंग जाँच करती है — भी इसी प्रतिबंध के अंतर्गत आएँगे।

सरकार का पक्ष

तमिलनाडु सरकार का कहना है कि कानून-व्यवस्था से जुड़ी सभी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती, क्योंकि इससे राज्य की सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इस अधिसूचना से विंग को उन रिकॉर्ड्स के लिए अनुरोध अस्वीकार करने का व्यापक आधार मिल गया है, जिनमें जनता का ध्यान खींचने वाली घटनाओं से जुड़ी सामग्री भी शामिल है।

आरटीआई अधिनियम की सीमाएँ और सुरक्षा कवच

हालाँकि, यह छूट असीमित नहीं है। आरटीआई अधिनियम की धारा 24(4) के अंतर्गत राज्य सरकार अधिसूचना के माध्यम से किसी खुफिया या सुरक्षा संगठन को छूट दे सकती है, किंतु भ्रष्टाचार और मानवाधिकारों के उल्लंघन से जुड़ी जानकारी इस छूट के दायरे से बाहर रहती है।

मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित अनुरोधों के लिए राज्य सूचना आयोग की मंजूरी आवश्यक होगी और इनका उत्तर अधिनियम में निर्धारित समय-सीमा के भीतर देना अनिवार्य रहेगा। यह अधिसूचना राज्य विधानसभा के समक्ष भी प्रस्तुत की जानी चाहिए।

आम नागरिकों पर असर और आगे की राह

विशेषज्ञों के अनुसार, इस आदेश का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि विभाग अलग-अलग आवेदनों पर इसे किस प्रकार लागू करता है। उदाहरण के लिए, हिरासत में मौत या पुलिस दुर्व्यवहार की जानकारी माँगने वाले आवेदक अधिनियम के मानवाधिकार उल्लंघन संबंधी प्रावधानों का सहारा ले सकते हैं। ऐसे में इस अधिसूचना के दायरे को लेकर आगे चलकर कानूनी विवाद उभरने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

यह ऐसे समय में आया है जब पारदर्शिता और पुलिस जवाबदेही को लेकर देशभर में बहस तेज़ हो रही है, और नागरिक समाज संगठन लगातार सूचना के अधिकार को मज़बूत बनाने की माँग कर रहे हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसका व्यापक दायरा — जिसमें संसदीय प्रश्नों की तैयारी और विरोध-प्रदर्शन के रिकॉर्ड तक शामिल हैं — पारदर्शिता के लिए गंभीर प्रश्न खड़े करता है। हिरासत में मौत और पुलिस दुर्व्यवहार की जवाबदेही पहले ही मुश्किल रही है; इस छूट से वह और पेचीदा हो जाएगी। सबसे बड़ी चिंता यह है कि 'मानवाधिकार उल्लंघन' की परिभाषा को लेकर विभाग और आवेदकों के बीच जो कानूनी खींचतान शुरू होगी, उसका बोझ आम नागरिकों पर ही पड़ेगा।
RashtraPress
27 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तमिलनाडु सरकार ने कानून-व्यवस्था विंग को आरटीआई से बाहर क्यों किया?
सरकार ने इस विंग को खुफिया और सुरक्षा कार्यों में संलग्न संस्था के रूप में वर्गीकृत किया है और कहा है कि कानून-व्यवस्था से जुड़ी सभी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती। आरटीआई अधिनियम की धारा 24(4) राज्य सरकारों को ऐसे संगठनों को अधिसूचना के ज़रिये छूट देने का अधिकार देती है।
इस फैसले से किन रिकॉर्ड्स तक पहुँच बंद होगी?
पुलिस गिरफ्तारी, हिरासत में मौत, सांप्रदायिक झड़पें, प्रदर्शनों से जुड़े दस्तावेज़, जाँच आयोग नियुक्तियों के कागज़ात और मासिक कानून-व्यवस्था समीक्षा बैठकों के विवरण — ये सभी सामान्य आरटीआई अनुरोधों से बाहर हो जाएँगे। संसदीय प्रश्नों के जवाब हेतु तैयार सामग्री भी इसमें शामिल है।
क्या हिरासत में मौत या पुलिस दुर्व्यवहार की जानकारी अब बिल्कुल नहीं मिलेगी?
नहीं, पूरी तरह बंद नहीं होगी। आरटीआई अधिनियम की धारा 24(4) के तहत भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़ी जानकारी इस छूट के दायरे से बाहर रहती है। हालाँकि ऐसे मामलों में राज्य सूचना आयोग की मंजूरी लेनी होगी और निर्धारित समय-सीमा में जवाब देना अनिवार्य होगा।
क्या इस अधिसूचना को राज्य विधानसभा में पेश करना ज़रूरी है?
हाँ, कानूनी प्रावधानों के अनुसार इस अधिसूचना को तमिलनाडु राज्य विधानसभा के समक्ष प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है। यह प्रक्रिया इस छूट की कानूनी वैधता के लिए ज़रूरी शर्त है।
इस फैसले का आम नागरिकों पर क्या असर पड़ेगा?
जो नागरिक पुलिस कार्रवाई, प्रदर्शनों पर कार्रवाई या हिरासत से जुड़े रिकॉर्ड माँगते थे, उनके सामान्य आरटीआई आवेदन अब खारिज हो सकते हैं। मानवाधिकार उल्लंघन का हवाला देने वाले आवेदकों को राज्य सूचना आयोग की लंबी प्रक्रिया से गुज़रना होगा, जिससे जानकारी मिलना और कठिन हो जाएगा।
राष्ट्र प्रेस
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