'द नर्मदा स्टोरी': आदिवासी महिला के संघर्ष और सिस्टम की सच्चाई पर मुकेश तिवारी, सिमाला प्रसाद की दमदार फिल्म
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश की पृष्ठभूमि पर आधारित क्राइम-ड्रामा फिल्म 'द नर्मदा स्टोरी' जल्द ही बड़े पर्दे पर दस्तक देने वाली है। यह फिल्म एक आदिवासी महिला के न्याय के संघर्ष, व्यवस्थागत भ्रष्टाचार और सामाजिक अन्याय की परतों को उजागर करती है। फिल्म की स्टारकास्ट — अभिनेता इश्तियाक खान, आईपीएस अधिकारी एवं अभिनेत्री सिमाला प्रसाद, अभिनेता मुकेश तिवारी और निर्देशक जैगम इमाम — ने फिल्म के विषय, किरदारों और सामाजिक संदेश पर विस्तार से बात की।
कहानी की पृष्ठभूमि और प्रेरणा
निर्देशक जैगम इमाम ने स्पष्ट किया कि 'द नर्मदा स्टोरी' किसी एक सच्ची घटना पर आधारित नहीं है। उन्होंने बताया, 'यह फिल्म कई घटनाओं, खबरों और फाइलों का मिश्रण है। अलग-अलग इलाकों में होने वाली कई घटनाओं को जोड़कर इसकी कहानी बनाई गई है, इसलिए हम यह दावा नहीं करते कि यह सिर्फ एक घटना की कहानी है।' फिल्म में आदिवासी महिला अग्नि धुर्वे और उसकी बेटी के इर्द-गिर्द बुनी गई कहानी को अभिनेत्री अश्विनी कालसेकर ने भावनात्मक गहराई के साथ पर्दे पर उतारा है। इमाम ने बताया कि एडिटिंग और साउंड के दौरान खुद उनकी आँखें नम हो गई थीं।
किरदारों का अनूठा अंदाज़
अभिनेता मुकेश तिवारी फिल्म में एक पुलिस अधिकारी की भूमिका में हैं। उन्होंने बताया कि उनके किरदार में एक व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण है — जहाँ एक ट्यूबलाइट बदलना भी जिंदगी का बड़ा काम बन जाता है। 'हमने इस किरदार में हल्की कॉमेडी डालने की कोशिश की है, ताकि गंभीर माहौल के बीच दर्शकों को एक अलग अनुभव मिल सके,' उन्होंने कहा। वहीं इश्तियाक खान का किरदार रहस्यमयी और बहुआयामी है। उन्होंने बताया, 'कई बार इंसान बुराई से लड़ते-लड़ते खुद उसी रास्ते पर चल पड़ता है। यह किरदार धीरे-धीरे बदलता है और दुनिया से मिले दर्द से भी ज्यादा खतरनाक रूप दुनिया को दिखाना चाहता है।'
आईपीएस अधिकारी की नज़र से महिला पुलिसकर्मी का संघर्ष
वास्तविक जीवन में आईपीएस अधिकारी रह चुकीं सिमाला प्रसाद फिल्म में एक महिला सब-इंस्पेक्टर की भूमिका में हैं। उन्होंने कहा, 'लोगों को लगता है कि वर्दी पहनने वाले सभी लोग एक जैसे होते हैं, लेकिन हर व्यक्ति की जिम्मेदारी और संघर्ष अलग होते हैं।' उनका मानना है कि सिनेमा समाज की सोच बदलने में सक्षम है, खासकर महिलाओं की सुरक्षा और न्याय जैसे मुद्दों पर। उन्होंने कहा, 'फिल्मों के जरिए हम सिर्फ समस्याएं नहीं दिखाते, बल्कि उनके समाधान की दिशा भी बताते हैं।'
सिस्टम बनाम इंसान — असली विलेन कौन?
मुकेश तिवारी ने स्पष्ट किया कि फिल्म किसी एक व्यक्ति को अपराधी नहीं ठहराती। 'यहाँ परिस्थितियाँ अपराध को जन्म देती हैं। कोई व्यक्ति अनजाने में अपराध का हिस्सा बन जाता है और कई बार सिस्टम का शिकार भी होता है,' उन्होंने कहा। निर्देशक जैगम इमाम ने जोड़ा कि फिल्म में मनोरंजन और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाए रखना उनकी सबसे बड़ी चुनौती थी। कहानी की परतें धीरे-धीरे खुलती हैं और हर किरदार का एक अलग पक्ष सामने आता है।
युवा दर्शकों से सीधा संवाद
इमाम ने बताया कि फिल्म में सोशल मीडिया पर लोकप्रिय कलाकारों की मौजूदगी युवा दर्शकों को आकर्षित करेगी, लेकिन फिल्म के भीतर जो गंभीर सामाजिक संदेश हैं, उन्हें एक अलग और प्रभावी अंदाज़ में पेश किया गया है। 'द नर्मदा स्टोरी' मनोरंजन के साथ-साथ आदिवासी समुदाय, महिला सशक्तिकरण और व्यवस्था की जवाबदेही जैसे विषयों पर दर्शकों को सोचने पर मजबूर करने का प्रयास है।