तिरुवरप्पु श्री कृष्ण मंदिर: एक रहस्यमय स्थान जहां भोग अर्पित करने में देरी से कमजोर हो जाती है प्रतिमा
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली, 6 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारत में अनेक प्राचीन मंदिर हैं, जहां भगवान श्री कृष्ण विभिन्न रूपों में भक्तों के संकटों का समाधान करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि केरल में एक ऐसा मंदिर है, जो पूरे वर्ष 365 दिन खुला रहता है और ग्रहण के दौरान भी पूजा-पाठ नहीं रुकता? हम तिरुवरप्पु श्री कृष्ण मंदिर की बात कर रहे हैं।
थिरुवरप्पु बस स्टैंड के निकट स्थित तिरुवरप्पु श्री कृष्ण मंदिर को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं। यह पहला ऐसा मंदिर है, जहां भगवान श्री कृष्ण को दिन में 10 बार भोग अर्पित किया जाता है। यदि भोग अर्पित करने में कोई विलंब होता है, तो भगवान की प्रतिमा कमजोर लगने लगती है और उनके कमरबंध की स्थिति भी बदल जाती है। यह कारण है कि ग्रहण के समय भी भगवान को नियमित रूप से भोग अर्पित किया जाता है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, एक बार ग्रहण के चलते मंदिर के दरवाजे बंद कर दिए गए थे। जब अगले दिन सुबह दरवाजे खोले गए, तो भगवान श्री कृष्ण की प्रतिमा कमजोर और कमरबंध नीचे खिसक गया था। तब से इस मंदिर को रात को नौ बजे बंद किया जाता है और सुबह 2 बजे खोला जाता है। भगवान को पहला भोग सुबह 3 बजे अर्पित किया जाता है।
मंदिर में कुल्हाड़ी रखने की पुरानी परंपरा भी रही है। इसका उद्देश्य यह है कि यदि मंदिर और गर्भगृह के ताले किसी कारणवश नहीं खुलते, तो कुल्हाड़ी से दरवाजों को खोला जा सके। गर्भगृह में कृष्णजी की काले रंग की प्रतिमा विशेष है, जो पीले वस्त्रों और आभूषणों से सजाई गई है। इस प्रतिमा की चार भुजाएं हैं, जो शंख और अस्त्र धारण किए हुए हैं।
कहा जाता है कि यह स्वंयभू प्रतिमा पांडवों को प्राप्त हुई थी, जिसे उन्होंने एक संत को स्थापित करने के लिए दिया था। यह प्रतिमा भगवान के उस रूप को दर्शाती है, जब उन्होंने कंस का वध किया था। कंस के वध के बाद श्री कृष्ण को भुखार लगी थी और उन्होंने अपनी भूख को शांत करने के लिए इसी स्थान पर आए थे। मंदिर के परिसर में अन्य मंदिर भी स्थित हैं, जैसे कोचंबलम मंदिर, शिव मंदिर, गणपति, सुबरमणियार और सास्ता के मंदिर।