यूपी सीट बंटवारे में कांग्रेस-सपा की खींचतान: बिहार महागठबंधन के अनुभव से क्या सीखेगा विपक्ष?
सारांश
मुख्य बातें
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच सीट बंटवारे को लेकर उभरती तनातनी, बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले महागठबंधन में सामने आई खींचतान से गहरी समानता रखती है। दोनों ही मामलों में कांग्रेस ने गठबंधन में बड़ी भूमिका की दावेदारी पेश की, जबकि क्षेत्रीय रूप से मजबूत सहयोगी दल अपनी सीटों में कटौती के लिए सहज नहीं दिखा।
उत्तर प्रदेश में मौजूदा स्थिति
2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस-सपा गठबंधन के प्रभावशाली प्रदर्शन ने विपक्षी इंडिया ब्लॉक को उत्तर प्रदेश में नई ऊर्जा दी और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के दीर्घकालिक वर्चस्व को चुनौती दी। इसी उत्साह में कांग्रेस नेता अब आगामी विधानसभा चुनाव के लिए जल्द सीट बंटवारे पर जोर दे रहे हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, कांग्रेस 403 सदस्यीय विधानसभा में 150 से अधिक सीटें चाहती है, जिसे पार्टी 'सम्मानजनक' हिस्सेदारी मानती है। दूसरी ओर, सपा कांग्रेस को लगभग 80 सीटें देने के पक्ष में अधिक सहज बताई जा रही है। दोनों दलों के नेताओं के बीच एक-दूसरे की संगठनात्मक ताकत और चुनावी योगदान को लेकर सार्वजनिक बयानबाजी शुरू हो चुकी है।
हालांकि, दोनों पक्षों के नेताओं ने यह भी संकेत दिया है कि अंतिम निर्णय शीर्ष नेतृत्व — कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव — के स्तर पर होगा।
बिहार महागठबंधन की गूंज
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले भी यही परिदृश्य सामने आया था। राहुल गांधी की बढ़ी राजनीतिक सक्रियता से उत्साहित कांग्रेस ने राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के साथ सीट बंटवारे में बड़ी हिस्सेदारी की माँग की थी। पार्टी ने 2020 विधानसभा चुनाव की तरह लगभग 70 सीटों पर जोर दिया था।
लेकिन राजद नेता तेजस्वी यादव ने पिछले प्रदर्शन को आधार बनाया — 2020 में कांग्रेस ने 70 सीटों पर लड़कर केवल 19 जीती थीं। राजद का तर्क था कि सीट बंटवारा राजनीतिक आकांक्षाओं के बजाय सिद्ध चुनावी क्षमता पर टिका होना चाहिए। विवाद चरम पर पहुँचने पर तेजस्वी यादव ने यहाँ तक कहा कि राजद बिहार की सभी 243 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने को तैयार है — जिसे कांग्रेस पर दबाव की रणनीति के रूप में देखा गया।
अंततः कांग्रेस 61 सीटों पर चुनाव लड़ने पर राजी हुई, लेकिन परिणाम में उसे केवल 6 सीटें मिलीं — 2020 के मुकाबले 13 कम। वहीं, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने विपक्षी चुनौती को पीछे छोड़ते हुए बड़ी जीत दर्ज की।
छोटे सहयोगियों की उपेक्षा का सबक
बिहार के अनुभव ने एक और महत्वपूर्ण सबक दिया — छोटे सहयोगी दलों की अनदेखी गठबंधन को कमज़ोर कर सकती है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने महागठबंधन में उचित हिस्सेदारी न मिलने का आरोप लगाते हुए स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने की चेतावनी दी थी। हालांकि झामुमो ने अंततः वैसा नहीं किया, लेकिन इस घटनाक्रम का सीट तालमेल पर असर पड़ा।
इसी तरह, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने महागठबंधन में शामिल होने की इच्छा जताई थी। AIMIM नेताओं के अनुसार, उन्होंने लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव से संपर्क किया था, लेकिन उनकी पेशकश स्वीकार नहीं की गई। इसके बाद AIMIM ने तीसरे मोर्चे के तहत 79 में से 28 सीटों पर चुनाव लड़ा और 5 सीटें जीतीं।
मुस्लिम बहुल सीटों पर NDA की सेंध
गौरतलब है कि बिहार में NDA ने मुस्लिम बहुल मानी जाने वाली करीब 16 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की, जिन्हें परंपरागत रूप से विपक्षी दलों का मजबूत गढ़ माना जाता था। बिहार में लगभग 32 विधानसभा सीटें मुस्लिम बहुल मानी जाती हैं, जिनमें से अधिकांश नेपाल सीमा से लगे सीमांचल क्षेत्र में हैं। 2025 के विधानसभा चुनाव में इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत अधिक मतदान भी दर्ज किया गया था।
आगे की राह: क्या यूपी में होगा अलग?
यह ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश देश का सर्वाधिक राजनीतिक महत्व वाला राज्य माना जाता है और यहाँ गठबंधन की रणनीति का असर केवल राज्य की सत्ता तक सीमित नहीं रहेगा। यह विपक्षी इंडिया ब्लॉक की आगे की दिशा और उसके भविष्य को भी परिभाषित कर सकता है।
सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी और अखिलेश यादव बिहार की गलतियों से सबक लेते हुए एक व्यावहारिक और टिकाऊ सीट-बंटवारा फॉर्मूला तय कर पाएँगे, या खींचतान गठबंधन की एकजुटता को कमज़ोर करेगी।