क्या एफआईसीसीआई ने बजट 2026-27 के लिए अपनी उम्मीदें साझा की हैं, टैक्स प्रक्रिया को सरल बनाने पर होगा फोकस?
सारांश
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नई दिल्ली, 13 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारत के प्रमुख औद्योगिक संगठन एफआईसीसीआई ने मंगलवार को आम बजट 2026-27 की अपनी अपेक्षाएँ प्रस्तुत की हैं, जिसमें प्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क संग्रह जैसे मुद्दों पर सुझाव दिए गए हैं।
एफआईसीसीआई ने अपने बयान में उल्लेख किया कि आयकर आयुक्त अपील के समक्ष लंबित मामलों को कम करना, नए फेसलेस अपील सिस्टम की सफलता के लिए आवश्यक है और इससे करदाताओं को डिमांड और रिफंड में रुकावटों से राहत मिलेगी।
बयान में यह भी कहा गया कि वर्तमान में आयकर आयुक्त अपील के समक्ष बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं, जिनमें से एक अप्रैल 2025 तक लगभग 5.4 लाख मामले अटके हुए हैं, जिसमें 18.16 लाख करोड़ रुपये की राशि शामिल है।
एफआईसीसीआई के अनुसार, 2025-26 के लिए सेंट्रल एक्शन प्लान (सीएपी) का लक्ष्य 2 लाख मामलों का समाधान करना और विभिन्न शुल्कों (जैसे इंटरनेशनल टैक्स और ट्रांसफर प्राइसिंग, सेंट्रल फेसलेस और जेसीआईटी (अपील)) के लिए 10 लाख करोड़ रुपये की विवादित मांग का निपटारा करना है। लेकिन, यदि क्षमता बढ़ाए बिना या निपटारे के लिए अलग-अलग ट्रैक और टाइमलाइन तय नहीं की गई, तो बैकलॉग को समाप्त करना कठिन होगा।
बयान में आगे कहा गया है कि लंबित मामले कंपनियों की किताबों में कंटिंजेंट लायबिलिटी के रूप में दिखते हैं, जिससे भारतीय प्रमोटरों द्वारा एडीआई निवेशकों को शेयर बेचने पर उनके शेयरों का मूल्यांकन प्रभावित होता है। मामले अधिक लंबित होने के कारण सरकार को भी राजस्व का नुकसान होता है।
एफआईसीसीआई ने सुझाव दिया है कि मुकदमेबाजी में फंसी राशि को निकालने, करदाताओं के लिए वर्किंग कैपिटल की बाधाओं को हल करने और राजस्व संग्रह के हितों को प्रभावित किए बिना, अपील के दौरान मांग पर रोक लगाने के लिए प्रावधानों को तर्कसंगत बनाने की आवश्यकता है।
एफआईसीसीआई ने सीमा शुल्क के नियमों में सुधार की भी मांग की है।
औद्योगिक निकाय का कहना है कि अग्रिम निर्णयों के लिए सीमा शुल्क प्राधिकरण (एएआर) के कार्यालयों का और विस्तार किया जाना चाहिए। साथ ही, सेल्फ-डिक्लेयरिंग एक्सटेंशन की अनुमति देने से व्यापार में निश्चितता बढ़ेगी, अनुपालन का बोझ कम होगा और सीमा शुल्क मामलों में मुकदमेबाजी में कमी आएगी।
वर्तमान में, सीएएआर के कार्यालय केवल नई दिल्ली और मुंबई में हैं, और उनके बीच पूरे भारत का क्षेत्राधिकार विभाजित है। जबकि, देश के दक्षिण और पूर्व में चेन्नई, हैदराबाद और कोलकाता जैसे बंदरगाहों से जुड़े व्यापार से बड़ी संख्या में आवेदन आते हैं।