वैश्विक तापमान 2026-2030 में रिकॉर्ड के करीब रहने की चेतावनी, 1.9°C तक वृद्धि संभव: WMO रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और ब्रिटेन के मेट ऑफिस की संयुक्त रिपोर्ट ने 28 मई 2026 को चेतावनी दी है कि 2026 से 2030 के बीच वैश्विक औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक काल (1850-1900) के स्तर से 1.3°C से 1.9°C तक अधिक रह सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, इस अवधि में कम से कम एक वर्ष 2024 को पीछे छोड़ते हुए अब तक का सबसे गर्म वर्ष बन सकता है।
रिपोर्ट के प्रमुख आँकड़े
रिपोर्ट में बताया गया है कि 2026 से 2030 के बीच किसी एक वर्ष के अब तक का सबसे गर्म वर्ष बनने की संभावना 86 प्रतिशत है। इसके अलावा, 91 प्रतिशत संभावना है कि इस अवधि में कम से कम एक वर्ष ऐसा होगा जब वैश्विक औसत सतही तापमान अस्थायी रूप से पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.5°C अधिक हो जाएगा।
गौरतलब है कि वर्ष 2024 में वैश्विक औसत सतही तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से पहले ही लगभग 1.55°C अधिक दर्ज किया जा चुका है।
अल नीनो की भूमिका
रिपोर्ट के प्रमुख लेखक डॉ. लियोन हरमैनसन ने कहा, '2026 के अंत तक अल नीनो की स्थिति बनने का अनुमान है, जिससे 2027 के रिकॉर्ड तोड़ गर्म वर्ष बनने की संभावना बढ़ जाती है।' रिपोर्ट के अनुसार, मध्य उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के नीनो 3.4 क्षेत्र में तापमान पूर्वानुमान अल नीनो जैसी परिस्थितियों की ओर संकेत करते हैं, विशेष रूप से 2027 और 2028 में।
यह ऐसे समय में आया है जब वैज्ञानिक समुदाय पहले से ही जलवायु परिवर्तन की गति को लेकर गहरी चिंता व्यक्त कर रहा है। आर्कटिक क्षेत्र में तापमान वृद्धि वैश्विक औसत की तुलना में अधिक रहने की संभावना रिपोर्ट में अलग से रेखांकित की गई है।
पेरिस समझौते का संदर्भ
पेरिस समझौते के तहत देशों ने वैश्विक औसत सतही तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2°C से काफी नीचे रखने और इसे 1.5°C तक सीमित करने का लक्ष्य तय किया है। हालाँकि, रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि अगले पाँच वर्षों का औसत तापमान 1.5°C से ऊपर जाने की संभावना को पेरिस समझौते के उल्लंघन के रूप में नहीं देखा जाएगा, क्योंकि यह समझौता लगभग 20 वर्षों की दीर्घकालिक तापमान वृद्धि को आधार मानता है।
आम जनता और पर्यावरण पर असर
वैज्ञानिक समुदाय लगातार चेतावनी देता रहा है कि यदि तापमान वृद्धि 1.5°C से अधिक होती है, तो चरम मौसम की घटनाएँ — जैसे भीषण गर्मी, बाढ़ और सूखा — और अधिक गंभीर हो सकती हैं। साथ ही, जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन की संभावनाएँ भी सीमित हो जाएंगी, जिसका सबसे अधिक असर कृषि-निर्भर और तटीय आबादी पर पड़ेगा।
यह रिपोर्ट उस समय आई है जब दुनिया भर की सरकारें जलवायु वित्तपोषण और उत्सर्जन कटौती पर नई प्रतिबद्धताएँ तय करने की कोशिश कर रही हैं। आने वाले वर्षों में तापमान प्रवृत्तियाँ इन नीतिगत बहसों को और तेज़ कर सकती हैं।