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सरकार ने लो-ग्रेड लौह अयस्क के उपयोग को बढ़ाने के लिए नियमों में किया महत्वपूर्ण संशोधन

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सरकार ने लो-ग्रेड लौह अयस्क के उपयोग को बढ़ाने के लिए नियमों में किया महत्वपूर्ण संशोधन

सारांश

केंद्र सरकार ने कम गुणवत्ता वाले लौह अयस्क के बेहतर उपयोग को बढ़ावा देने के लिए नियमों में बदलाव किया है। नए प्राइसिंग नियमों के तहत, लो-ग्रेड लौह अयस्कों को आर्थिक रूप से फायदेमंद बनाने का प्रयास किया गया है।

मुख्य बातें

सरकार ने लो-ग्रेड लौह अयस्क के लिए नए प्राइसिंग नियम लागू किए।
45 प्रतिशत से कम आयरन कंटेंट वाले लौह अयस्क की कीमतों में बदलाव हुआ है।
लो-ग्रेड लौह अयस्क का वैज्ञानिक उपयोग बढ़ेगा।
स्टील उद्योग को कच्चे माल की निरंतर आपूर्ति मिलेगी।
खनिज संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा।

नई दिल्ली, 14 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। कम गुणवत्ता वाले (लो-ग्रेड) लौह अयस्क की बर्बादी को रोकने और इसके उपयोग को बढ़ावा देने हेतु केंद्र सरकार ने नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। खान मंत्रालय ने मंगलवार को बताया कि इस पहल के तहत नए प्राइसिंग नियमों की व्यवस्था की गई है।

इन नए नियमों के अनुसार, 45 प्रतिशत से कम आयरन (एफई) कंटेंट वाले लौह अयस्क जैसे बैंडेड हेमेटाइट क्वार्टजाइट (बीएचक्यू) और बैंडेड हेमेटाइट जैस्पर (बीएचजे) के लिए मूल्य निर्धारण का एक स्पष्ट ढांचा तैयार किया गया है।

नए प्रावधानों के अनुसार, 35 से 45 प्रतिशत के बीच एफई कंटेंट वाले लौह अयस्क की औसत बिक्री कीमत (एएसपी) को 45 से 51 प्रतिशत ग्रेड वाले लौह अयस्क की एएसपी का 75 प्रतिशत निर्धारित किया गया है।

इसी प्रकार, 35 प्रतिशत से कम एफई कंटेंट वाले लौह अयस्क के लिए एएसपी को बेस कीमत का 50 प्रतिशत तय किया गया है।

सरकार के अनुसार, "थ्रेशहोल्ड वैल्यू" का अर्थ उस न्यूनतम गुणवत्ता से है, जिसके नीचे खनिज को आमतौर पर बेकार माना जाता है।

हालांकि, नई तकनीकों की मदद से अब ऐसे लो-ग्रेड लौह अयस्कों को प्रोसेस करके उच्च गुणवत्ता वाले मटेरियल में बदला जा सकता है।

पहले इन लो-ग्रेड लौह अयस्कों के लिए कोई विशेष प्राइसिंग सिस्टम नहीं था, जिसके कारण 45-51 प्रतिशत ग्रेड वाले उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क की कीमतों के आधार पर रॉयल्टी और अन्य शुल्क तय होते थे। इससे इनका प्रोसेसिंग आर्थिक रूप से लाभदायक नहीं था।

सरकार ने कहा कि नया ढांचा इस समस्या को हल करेगा और लो-ग्रेड लौह अयस्क के वैज्ञानिक और बेहतर उपयोग को बढ़ावा देगा।

सरकार यह भी कहती है कि इन संसाधनों के उपयोग से उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क के खत्म होने की चिंता कम होगी, स्टील उद्योग को कच्चे माल की निरंतर आपूर्ति मिलती रहेगी और खनिज संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा।

नए नियमों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि खदान से निकाले गए कच्चे लौह अयस्क को प्रोसेस करने से उसकी आर्थिक कीमत घटती है, तो रॉयल्टी का निर्धारण बिना प्रोसेस किए गए मटेरियल की प्रारंभिक स्क्रीनिंग के बाद किया जाएगा।

मंत्रालय ने बताया कि इससे यह सुनिश्चित होता है कि प्रोसेसिंग के नाम पर खनिज की कीमत को कृत्रिम रूप से कम नहीं किया जा सकेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिससे न केवल खनिज संरक्षण में मदद मिलेगी, बल्कि स्टील उद्योग को कच्चे माल की निरंतर आपूर्ति भी सुनिश्चित होगी।
RashtraPress
17 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सरकार ने लो-ग्रेड लौह अयस्क के लिए नए प्राइसिंग नियम कब लागू किए?
सरकार ने ये नए प्राइसिंग नियम 14 अप्रैल को लागू किए।
लो-ग्रेड लौह अयस्क का क्या मतलब है?
लो-ग्रेड लौह अयस्क का मतलब है वह लौह अयस्क जिसमें आयरन कंटेंट 45 प्रतिशत से कम होता है।
इन नए नियमों का लाभ क्या होगा?
इन नए नियमों से लो-ग्रेड लौह अयस्क का बेहतर उपयोग होगा, जिससे आर्थिक लाभ और खनिज संरक्षण में सहायता मिलेगी।
क्या नए नियमों से स्टील उद्योग को लाभ होगा?
हाँ, नए नियमों से स्टील उद्योग को कच्चे माल की निरंतर आपूर्ति मिलेगी।
क्या लो-ग्रेड लौह अयस्क को प्रोसेस किया जा सकता है?
जी हाँ, नई तकनीकों की मदद से लो-ग्रेड लौह अयस्क को प्रोसेस करके उच्च गुणवत्ता वाले मटेरियल में बदला जा सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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