सोने-चांदी के ड्यूटी ड्रॉबैक में कटौती: गोल्ड पर ₹57.88 प्रति ग्राम कम, सिल्वर पर ~9% झटका
सारांश
मुख्य बातें
केंद्र सरकार ने 16 अक्टूबर 2026 को सोने और चांदी के आभूषणों तथा कीमती धातु उत्पादों के निर्यात पर लागू ड्यूटी ड्रॉबैक दरों में कटौती की घोषणा की। वित्त मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार, गोल्ड ज्वैलरी पर मिलने वाले रिफंड में 3.1 प्रतिशत और सिल्वर ज्वैलरी व अन्य चांदी उत्पादों पर मिलने वाले रिफंड में करीब 9 प्रतिशत की कमी की गई है। इस निर्णय से भारतीय ज्वैलरी निर्यातकों के मार्जिन पर सीधा असर पड़ने की आशंका है।
ड्यूटी ड्रॉबैक क्या होता है
ड्यूटी ड्रॉबैक वह सरकारी व्यवस्था है जिसके तहत निर्यातकों को उन कस्टम शुल्कों और अन्य करों का रिफंड मिलता है, जो निर्यात योग्य उत्पादों के निर्माण में उपयोग किए गए कच्चे माल या इनपुट पर पहले चुकाए गए होते हैं। इसका मूल उद्देश्य निर्यात को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में प्रतिस्पर्धी बनाना और उत्पादन लागत का बोझ कम करना है।
नई संशोधित दरें
संशोधित अधिसूचना के अनुसार, सोने के आभूषणों पर मिलने वाला ड्यूटी ड्रॉबैक ₹1,851.99 प्रति ग्राम से घटाकर ₹1,794.11 प्रति ग्राम कर दिया गया है — अर्थात निर्यातकों को प्रति ग्राम ₹57.88 कम रिफंड मिलेगा।
चांदी के मामले में कटौती और अधिक है। सिल्वर ज्वैलरी व अन्य चांदी उत्पादों पर यह दर ₹29,501.09 प्रति किलोग्राम से घटाकर ₹26,859.02 प्रति किलोग्राम की गई है — यानी चांदी निर्यातकों को प्रति किलोग्राम ₹2,642.07 कम मिलेगा, जो कि लगभग 9 प्रतिशत की कमी है।
जुलाई 2026 की बढ़ोतरी के बाद यह उलटाव क्यों
गौरतलब है कि सरकार ने इसी वर्ष जुलाई 2026 में ज्वैलरी निर्यात उद्योग को बड़ी राहत दी थी। उस समय बढ़ती उत्पादन लागत और वैश्विक अनिश्चितताओं के मद्देनज़र गोल्ड ज्वैलरी का ड्रॉबैक ₹773.17 प्रति ग्राम से बढ़ाकर ₹1,851.99 प्रति ग्राम किया गया था। इसी तरह सिल्वर उत्पादों की दर ₹14,990.66 प्रति किलोग्राम से बढ़ाकर ₹29,501.09 प्रति किलोग्राम की गई थी। उस फैसले को उद्योग ने भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण कदम माना था।
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक बाज़ार में सोने और चांदी की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी है और निर्यातक पहले से ही मुद्रा दबाव तथा लॉजिस्टिक्स लागत से जूझ रहे हैं।
किस पर पड़ेगा असर
इस निर्णय का सबसे सीधा असर उन ज्वैलरी निर्यातकों, बुलियन कारोबारियों और उन कंपनियों पर पड़ेगा जो बड़े पैमाने पर सोने-चांदी के आभूषण विदेशों में भेजती हैं। कम रिफंड मिलने से उनकी परिचालन लागत बढ़ सकती है और निर्यात लाभप्रदता प्रभावित हो सकती है।
उद्योग से जुड़े जानकारों के अनुसार, यदि वैश्विक बाज़ार में माँग मज़बूत बनी रहती है तो दीर्घकालिक निर्यात पर इसका प्रभाव सीमित रह सकता है। हालाँकि अल्पकाल में यह निर्णय निर्यातकों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित होने की आशंका है।
आगे क्या होगा
उद्योग संगठनों से अपेक्षा की जा रही है कि वे सरकार के समक्ष इस कटौती की समीक्षा की माँग रखेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को अंतरराष्ट्रीय धातु बाज़ार की कीमतों और घरेलू उत्पादन लागत के आधार पर इन दरों की नियमित समीक्षा करनी चाहिए, ताकि भारतीय निर्यातक वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ न जाएँ।