भारत टेक्सटाइल कचरे का डंपिंग ग्राउंड नहीं, 97% प्री-कंज्यूमर वेस्ट होता है रीसाइकिल: वस्त्र मंत्रालय

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भारत टेक्सटाइल कचरे का डंपिंग ग्राउंड नहीं, 97% प्री-कंज्यूमर वेस्ट होता है रीसाइकिल: वस्त्र मंत्रालय

सारांश

विदेशी मीडिया की आलोचनाओं के जवाब में वस्त्र मंत्रालय ने आँकड़ों की झड़ी लगाई — 97% प्री-कंज्यूमर वेस्ट रीसाइकिल, 90% कचरा घरेलू, ₹22,000 करोड़ की सालाना आर्थिक गतिविधि। IIT दिल्ली का शोध: रीसाइक्लिंग से उत्सर्जन 40% तक घटता है।

मुख्य बातें

वस्त्र मंत्रालय ने 14 मई 2026 को भारत को टेक्सटाइल कचरे का 'डंपिंग ग्राउंड' बताने वाली विदेशी रिपोर्टों को भ्रामक और गलत करार दिया।
'मैपिंग ऑफ टेक्सटाइल वेस्ट वैल्यू चेन इन इंडिया 2026' अध्ययन के अनुसार मैन्युफैक्चरिंग में उत्पन्न 97% प्री-कंज्यूमर वेस्ट रीसाइकिल होता है।
प्रतिवर्ष प्रबंधित 7.8 मिलियन टन कचरे में से 90% से अधिक घरेलू स्रोतों से; आयातित कचरा मात्र ~7% ।
FICCI रिपोर्ट के अनुसार टेक्सटाइल वेस्ट इकोसिस्टम सालाना ₹22,000 करोड़ की आर्थिक गतिविधि उत्पन्न करता है।
IIT दिल्ली के शोध के अनुसार रीसाइक्लिंग से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में नए फाइबर उत्पादन की तुलना में 40% तक कमी।
सरकार ने पोस्ट-कंज्यूमर वेस्ट और श्रमिक सुरक्षा की चुनौतियाँ स्वीकार कीं; NGT उल्लंघनकर्ताओं पर कार्रवाई जारी।

वस्त्र मंत्रालय ने 14 मई 2026 को स्पष्ट किया कि भारत को कपड़ा कचरे का 'डंपिंग ग्राउंड' बताना न केवल भ्रामक है, बल्कि तथ्यात्मक रूप से गलत भी है। मंत्रालय के अनुसार, भारत के पास दुनिया के सबसे बड़े टेक्सटाइल रिकवरी और रीसाइक्लिंग नेटवर्क में से एक है, जो दशकों पुरानी पुनःउपयोग परंपरा पर टिका है।

विवाद की पृष्ठभूमि

हाल के महीनों में कुछ विदेशी मीडिया रिपोर्टों ने — विशेष रूप से पानीपत जैसे टेक्सटाइल क्लस्टर्स को केंद्र में रखते हुए — भारत के रीसाइक्लिंग उद्योग को पर्यावरण और श्रमिक शोषण के नज़रिए से चित्रित किया। मंत्रालय का कहना है कि इन रिपोर्टों ने स्थिरता की दिशा में हुई प्रगति, नियमों के अनुपालन और नई तकनीकों को अपनाने के प्रयासों को नज़रअंदाज़ किया। मंत्रालय ने कहा: 'भारत के टेक्सटाइल सेक्टर को पर्यावरण के प्रति लापरवाह या संरचनात्मक रूप से शोषणकारी बताना मौजूदा सुधारों और स्थिरता को बढ़ावा देने वाले प्रयासों की अनदेखी करता है।'

मुख्य आँकड़े और अध्ययन

सरकार ने 'मैपिंग ऑफ टेक्सटाइल वेस्ट वैल्यू चेन इन इंडिया 2026' अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि मैन्युफैक्चरिंग के दौरान उत्पन्न होने वाले करीब 97 प्रतिशत प्री-कंज्यूमर टेक्सटाइल कचरे को रीसाइकिल कर लिया जाता है। भारत प्रतिवर्ष लगभग 7,073 किलो टन टेक्सटाइल कचरा उत्पन्न करता है। हर साल प्रबंधित किए जाने वाले लगभग 7.8 मिलियन टन कचरे में से 90 प्रतिशत से अधिक घरेलू स्तर पर उत्पन्न होता है, जबकि आयातित कचरे की हिस्सेदारी मात्र करीब 7 प्रतिशत है।

फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (FICCI) की रिपोर्ट के अनुसार, यह टेक्सटाइल वेस्ट इकोसिस्टम हर साल लगभग ₹22,000 करोड़ की आर्थिक गतिविधि उत्पन्न करता है।

पर्यावरणीय लाभ: IIT दिल्ली का शोध

IIT दिल्ली के शोधकर्ताओं द्वारा पानीपत क्लस्टर के आँकड़ों पर आधारित एक अध्ययन में पाया गया कि टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और जीवाश्म ईंधन की खपत में नए फाइबर उत्पादन की तुलना में 40 प्रतिशत तक की कमी आती है। यह निष्कर्ष उन आलोचनाओं का सीधा जवाब है जो पानीपत के रीसाइक्लिंग उद्योग को पर्यावरण के लिए हानिकारक बताती हैं।

चुनौतियों की स्वीकृति और सुधार की राह

सरकार ने पोस्ट-कंज्यूमर वेस्ट प्रबंधन, अनौपचारिक इकाइयों और श्रमिक सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को स्वीकार किया, परंतु साथ ही यह भी कहा कि उद्योग धीरे-धीरे अधिक औपचारिक व्यवस्था, स्वच्छ तकनीकों और मज़बूत पर्यावरणीय नियमों की ओर बढ़ रहा है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) जैसी नियामक संस्थाएँ नियमों का पालन न करने वाली इकाइयों के खिलाफ कार्रवाई जारी रखे हुए हैं। गौरतलब है कि यह स्पष्टीकरण ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर फास्ट-फैशन उद्योग की आलोचना तेज़ हो रही है और विकसित देश अपने कपड़ा कचरे के निपटान के लिए वैकल्पिक बाज़ार तलाश रहे हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन वे मुख्यतः प्री-कंज्यूमर — यानी कारखाने के — कचरे पर केंद्रित हैं; पोस्ट-कंज्यूमर वेस्ट की रीसाइक्लिंग दर का कोई समतुल्य दावा नहीं किया गया, जो वास्तव में विवाद का केंद्र है। यह ऐसे समय में आया है जब यूरोपीय संघ 'एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी' नियम लागू कर रहा है और पश्चिमी फास्ट-फैशन ब्रांड अपने कचरे के गंतव्य को लेकर दबाव में हैं। अनौपचारिक क्षेत्र की स्वीकृति और NGT की कार्रवाई का उल्लेख सकारात्मक है, पर बिना सार्वजनिक अनुपालन डेटा के यह आश्वासन अधूरा लगता है। असली कसौटी यह होगी कि क्या भारत पानीपत जैसे क्लस्टर्स के लिए पारदर्शी, सत्यापन-योग्य पर्यावरण और श्रम मानक स्थापित कर पाता है।
RashtraPress
14 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत को टेक्सटाइल कचरे का डंपिंग ग्राउंड क्यों कहा जा रहा था?
कुछ विदेशी मीडिया रिपोर्टों ने पानीपत जैसे क्लस्टर्स में पर्यावरण और श्रमिक समस्याओं को उजागर करते हुए दावा किया था कि भारत पश्चिमी देशों के फास्ट-फैशन कचरे का प्रमुख गंतव्य बन गया है। वस्त्र मंत्रालय ने इन रिपोर्टों को एकांगी और भ्रामक बताया है।
भारत में कितना टेक्सटाइल कचरा रीसाइकिल होता है?
'मैपिंग ऑफ टेक्सटाइल वेस्ट वैल्यू चेन इन इंडिया 2026' अध्ययन के अनुसार, मैन्युफैक्चरिंग के दौरान उत्पन्न होने वाले करीब 97 प्रतिशत प्री-कंज्यूमर टेक्सटाइल कचरे को रीसाइकिल कर लिया जाता है। भारत प्रतिवर्ष लगभग 7,073 किलो टन टेक्सटाइल कचरा उत्पन्न करता है।
भारत में आयातित टेक्सटाइल कचरे की हिस्सेदारी कितनी है?
सरकार के अनुसार, हर साल प्रबंधित किए जाने वाले लगभग 7.8 मिलियन टन टेक्सटाइल कचरे में से 90 प्रतिशत से अधिक घरेलू स्तर पर उत्पन्न होता है। आयातित कचरे की हिस्सेदारी केवल करीब 7 प्रतिशत है।
टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग से पर्यावरण को क्या फायदा होता है?
IIT दिल्ली के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन के अनुसार, पानीपत क्लस्टर में टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और जीवाश्म ईंधन की खपत में नए फाइबर उत्पादन की तुलना में 40 प्रतिशत तक की कमी आती है।
टेक्सटाइल वेस्ट इकोसिस्टम भारत की अर्थव्यवस्था में कितना योगदान देता है?
FICCI की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का टेक्सटाइल वेस्ट इकोसिस्टम हर साल लगभग ₹22,000 करोड़ की आर्थिक गतिविधि उत्पन्न करता है। यह आँकड़ा इस क्षेत्र के व्यापक आर्थिक महत्व को रेखांकित करता है।
राष्ट्र प्रेस
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