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भारत ने ट्रंप प्रशासन की नीति के चलते वैकल्पिक व्यापारिक साझेदारियों पर दिया जोर

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भारत ने ट्रंप प्रशासन की नीति के चलते वैकल्पिक व्यापारिक साझेदारियों पर दिया जोर

सारांश

भारत और अमेरिका के बीच संबंधों में बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। ट्रंप प्रशासन की नीतियों का असर भारत की व्यापारिक रणनीतियों पर पड़ा है, जिससे नई साझेदारियों की तलाश की जा रही है। जानिए इस नए संदर्भ में भारत की आर्थिक दिशा क्या होगी।

मुख्य बातें

भारत और अमेरिका के संबंधों में बदलाव के संकेत।
भारत को वैकल्पिक साझेदारियों की खोज।
सीपीटीपीपी में शामिल होने का महत्व।
यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौता ।
भारत की आर्थिक रणनीति में बदलाव।

नई दिल्ली, 5 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। अमेर‍िकी राष्‍ट्रपत‍ि डोनाल्‍ड ट्रंप प्रशासन की दबाव बनाने वाली रणनीति के कारण भारत और अमेर‍िका के बीच संबंधों में महत्वपूर्ण परिवर्तन के संकेत मिल रहे हैं। फॉरेन अफेयर्स पत्रिका में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, नई दिल्ली को इस समय वैकल्पिक साझेदारियों की खोज करनी पड़ रही है। भारत को पहले यह उम्मीद थी कि अमेरिका, चीन से प्रतिस्पर्धा के लिए उनकी साझेदारी को प्राथमिकता देगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

इस लेख में बताया गया है कि जनवरी में यूरोपीय संघ के साथ हुए व्यापार समझौते ने नई दिल्ली की भू-आर्थिक रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाया है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसे सभी समझौतों की जननी बताया, जिससे दोनों पक्षों को लगभग 30 अरब यूरो के निर्यात लाभ की उम्मीद है। साथ ही, एक नया रक्षा समझौता और कई अन्य समझौतों पर भी हस्ताक्षर किए गए हैं।

लेख में यह भी उल्लेख किया गया है कि ब्रसेल्स के साथ हुआ यह द्विपक्षीय आर्थिक समझौता, और ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त अरब अमीरात तथा अन्य देशों के साथ हाल के समझौतों ने भारत को अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और किसी एक शक्ति पर निर्भरता को कम करने में सहायता प्रदान की है।

भारत को कम्प्रीहेंसिव एंड प्रोग्रेसिव एग्रीमेंट फॉर ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप (सीपीटीपीपी) में शामिल होने का सुझाव भी दिया गया है, जिसे एशिया का सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक समूह माना जाता है।

सीपीटीपीपी, जो 2018 में हस्ताक्षरित हुआ था, उस समय अस्तित्व में आया जब डोनाल्‍ड ट्रंप ने पहले के समझौते, ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप (टीपीपी), से अमेरिका को बाहर कर लिया था। यह समझौता पूरे प्रशांत क्षेत्र में एक उच्च-स्तरीय मुक्त व्यापार क्षेत्र के निर्माण के लिए तैयार किया गया था।

सीपीटीपीपी विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं पर शुल्कों को समाप्त या कम करता है और सदस्य देशों को श्रम अधिकार, बौद्धिक संपदा और निवेश जैसे कई क्षेत्रों में कड़े साझा मानकों का पालन करने के लिए बाध्य करता है। ये मानक सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं में वास्तविक संरचनात्मक सुधार को बढ़ावा देते हैं।

इस एग्रीमेंट में अब 12 सदस्य हैं, जो दुनिया की अर्थव्‍यवस्‍था का लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा हैं। इनमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, चिली, जापान, मलेशिया, मैक्सिको, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, यूनाइटेड किंगडम और वियतनाम शामिल हैं। कई नए सदस्य, जैसे कंबोडिया और साउथ कोरिया, अब इसमें शामिल होना चाहते हैं।

हालांकि, भारत के लिए इस समूह में शामिल होना चुनौतीपूर्ण है, लेकिन इसका मामला भी मजबूत है। सीपीटीपीपी देशों को भारत के संभावित बड़े मार्केट तक विशेष पहुंच मिलेगी, जिससे पूरे समूह को भविष्य में ग्लोबल सुपरपावर बनने का लाभ होगा।

लेख में आगे कहा गया है कि भारत के लिए सदस्यता क्षेत्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं में उसके एकीकरण को तेज करेगी और निर्यात को बड़ा प्रोत्साहन देगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

यह स्पष्ट है कि भारत को नई आर्थिक साझेदारियों की आवश्यकता है। ट्रंप प्रशासन की नीतियों ने अमेरिका-भारत संबंधों को प्रभावित किया है, और भारत के लिए यह समय है कि वह वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति को मजबूत करे।
RashtraPress
8 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत को सीपीटीपीपी में शामिल होने की आवश्यकता क्यों है?
सीपीटीपीपी में शामिल होने से भारत को वैश्विक व्यापार में महत्वपूर्ण स्थान मिलेगा और क्षेत्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं में एकीकृत होने का अवसर मिलेगा।
क्या अमेरिका का दबाव भारत की व्यापारिक नीतियों को प्रभावित कर रहा है?
हाँ, ट्रंप प्रशासन की नीतियों ने भारत को नई साझेदारियों की तलाश करने को मजबूर किया है।
राष्ट्र प्रेस
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