भारत की फार्मा इंडस्ट्री: उत्पादन में तीसरा और मूल्य में 11वां स्थान
सारांश
Key Takeaways
- भारत की फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री का वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण स्थान है।
- उत्पादन में तीसरा और मूल्य में 11वां स्थान।
- 2030 तक घरेलू दवा बाजार का 130 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान।
- भारत जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा सप्लायर है।
- दवा निर्यात में पिछले 10 वर्षों में लगातार वृद्धि।
नई दिल्ली, 21 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। भारत की फार्मास्यूटिकल (दवा) इंडस्ट्री ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है। यह उत्पादन (वॉल्यूम) के मामले में दुनिया में तीसरे और मूल्य (वैल्यू) के मामले में 11वें स्थान पर है, जिसमें 3,000 से अधिक कंपनियां और 10,500 से ज्यादा मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स शामिल हैं।
भारत का घरेलू दवा बाजार वर्तमान में 60 अरब डॉलर का है और अनुमान है कि यह 2030 तक 130 अरब डॉलर तक पहुँच जाएगा।
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में इस क्षेत्र का कुल कारोबार 4.72 लाख करोड़ रुपए तक पहुँचने का अनुमान है। पिछले 10 वर्षों में दवा निर्यात में औसतन 7 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा जेनेरिक दवाओं का सप्लायर है, और इसकी वैश्विक सप्लाई में हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत है। देश में 60 विभिन्न चिकित्सा श्रेणियों में लगभग 60,000 जेनेरिक दवाएं बनाई जाती हैं।
मजबूत मैन्युफैक्चरिंग क्षमता, बढ़ता निर्यात, विदेशी निवेश और सरकारी योजनाओं ने मिलकर देश में उत्पादन को बढ़ाया है, आयात पर निर्भरता को कम किया है और भारत की वैश्विक बाजार में पकड़ को मजबूत किया है।
सस्ती दवाओं की उपलब्धता, इनॉवेशन, गुणवत्ता नियंत्रण और सख्त नियमों के कारण देश की स्वास्थ्य सेवाओं में भी सुधार हुआ है और भारत की विश्वसनीयता बढ़ी है।
यूरोपीय संघ, यूनाइटेड किंगडम और न्यूजीलैंड के साथ हाल ही में हुए व्यापार समझौतों से इस क्षेत्र को और मजबूती मिलने की संभावना है। इससे नए बाजार खुलेंगे और निवेश व रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
यह गौर करने वाली बात है कि भारत में अमेरिका के बाहर सबसे अधिक ऐसे मैन्युफैक्चरिंग प्लांट हैं जिन्हें यूएसएफडीए की मंजूरी मिली है, जो भारतीय दवाओं की गुणवत्ता और सुरक्षा पर वैश्विक भरोसा प्रदर्शित करता है।
देश में लगभग 500 सक्रिय दवा कच्चा माल (एपीआई) बनाने वाली कंपनियां हैं, जो वैश्विक एपीआई इंडस्ट्री का लगभग 8 प्रतिशत हिस्सा रखती हैं।
भारत डिप्थीरिया, टिटनेस और काली खांसी (डीपीटी), बीसीजी और खसरा जैसी वैक्सीनेशन सप्लाई में भी दुनिया में अग्रणी है।
भारत की कंपनियां यूनिसेफ को करीब 60 प्रतिशत वैक्सीन सप्लाई करती हैं, जबकि डीपीटी और बीसीजी वैक्सीन की वैश्विक मांग का 40-70 प्रतिशत और डब्ल्यूएचओ की खसरा वैक्सीन की मांग का 90 प्रतिशत भारत पूरा करता है।
यह दर्शाता है कि भारत का फार्मा निर्यात कितना मजबूत है और यह वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का दवा निर्यात 30.5 अरब डॉलर तक पहुँच गया, जो 2000-01 के 1.9 अरब डॉलर के मुकाबले लगभग 16 गुना अधिक है।