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भारत-ब्रिटेन एफटीए ऐतिहासिक: जीरो-ड्यूटी पहुँच से निर्यात और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी — नाबार्ड चेयरमैन

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भारत-ब्रिटेन एफटीए ऐतिहासिक: जीरो-ड्यूटी पहुँच से निर्यात और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी — नाबार्ड चेयरमैन

सारांश

भारत-ब्रिटेन एफटीए को नाबार्ड चेयरमैन डॉ. शाजी कृष्णन वी ने ऐतिहासिक करार दिया है। जीरो-ड्यूटी पहुँच और व्यापक कवरेज के साथ यह समझौता निर्यात को नई ऊँचाई दे सकता है — लेकिन असली सवाल यह है कि क्या देश के भीतर का माहौल इसका पूरा फायदा उठाने के लिए तैयार है।

मुख्य बातें

शाजी कृष्णन वी ने 16 जुलाई को मुंबई में भारत-ब्रिटेन एफटीए को ऐतिहासिक समझौता बताया।
समझौते के तहत कई भारतीय उत्पादों को ब्रिटेन में जीरो-ड्यूटी पहुँच और अन्य पर शुल्क में कमी मिलेगी।
एफटीए में व्यापार, निवेश, सेवाएं और प्रौद्योगिकी — सभी क्षेत्र शामिल हैं।
नाबार्ड अब तक करीब 70,000 प्राथमिक सहकारी समितियों का कंप्यूटरीकरण कर चुका है।
संस्था एफपीओ और सहकारी संस्थाओं के साथ मिलकर ग्रामीण क्षमता निर्माण में जुटी है।
नाबार्ड कृषि मूल्य श्रृंखलाओं का मानचित्रण कर टिकाऊ ग्रामीण आजीविका सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर रहा है।

राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के चेयरमैन डॉ. शाजी कृष्णन वी ने 16 जुलाई को मुंबई में कहा कि भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) एक ऐतिहासिक उपलब्धि है, जो भारतीय निर्यात को नई गति देगा, उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को सुदृढ़ करेगा और दोनों लोकतांत्रिक देशों के बीच आर्थिक संबंधों को नई ऊँचाई पर ले जाएगा। उनके अनुसार, इस समझौते के तहत कई भारतीय उत्पादों को ब्रिटेन के बाजार में जीरो-ड्यूटी पहुँच मिलेगी, जबकि अन्य पर शुल्क में उल्लेखनीय कमी की जाएगी।

समझौते की मुख्य विशेषताएँ

डॉ. शाजी कृष्णन ने कहा, 'आर्थिक दृष्टि से यह समझौता भारत के निर्यात को बढ़ावा देगा, क्योंकि कई उत्पादों पर जीरो-ड्यूटी पहुँच मिलेगी और अन्य पर शुल्क कम होगा। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह एक व्यापक समझौता है, जिसमें व्यापार, निवेश, सेवाएं और प्रौद्योगिकी शामिल हैं।' उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि बाजार तक बेहतर पहुँच और आर्थिक उदारीकरण से भारतीय उद्योगों को वैश्विक स्तर पर अपनी उपस्थिति बढ़ाने और कारोबार का विस्तार करने में सीधी मदद मिलेगी।

उन्होंने जोर देकर कहा, 'अब सबसे महत्वपूर्ण कार्य यह सुनिश्चित करना है कि देश के भीतर ऐसा सक्षम माहौल तैयार किया जाए, जिससे भारत इस ऐतिहासिक समझौते का पूरा लाभ उठा सके।' यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत अपनी निर्यात-आधारित विकास रणनीति को और धार देने की कोशिश में है।

नाबार्ड की बदलती भूमिका

नाबार्ड चेयरमैन ने संस्था के विस्तारित जनादेश पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने स्पष्ट किया कि नाबार्ड अब केवल ऋण उपलब्ध कराने और ग्रामीण क्षेत्रों में तरलता बनाए रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण बुनियादी ढाँचे के वित्तपोषण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निवेश को प्रोत्साहित करने वाली एक प्रमुख संस्था के रूप में उभर रही है। उन्होंने कहा, 'नाबार्ड खुद को ग्रामीण अवसंरचना के वित्तपोषक के रूप में स्थापित कर रहा है और साथ ही ग्रामीण क्षेत्र में निवेश की कमियों की पहचान करने में भी मदद कर रहा है।'

कृषि मूल्य श्रृंखला और सहकारी सुधार

संस्था कृषि मूल्य श्रृंखलाओं (एग्रीकल्चर वैल्यू चेन) का मानचित्रण कर रही है, ताकि उत्पादन, प्रसंस्करण, विपणन और वितरण में निवेश के जरिए टिकाऊ आजीविका का सृजन सुनिश्चित हो सके। डॉ. शाजी ने बताया कि नाबार्ड किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) और सहकारी संस्थाओं के साथ मिलकर उनकी क्षमता बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उनकी भागीदारी मजबूत करने के लिए भी सक्रिय रूप से काम कर रहा है।

इन प्रयासों के तहत अब तक करीब 70,000 प्राथमिक सहकारी समितियों का कंप्यूटरीकरण किया जा चुका है। उनके अनुसार, इससे पारदर्शिता, ट्रेसबिलिटी और परिचालन दक्षता में उल्लेखनीय सुधार होगा।

संस्थान-निर्माण की दिशा में कदम

चेयरमैन ने कहा कि संस्थागत सुधार और क्षमता निर्माण की ये पहलें नाबार्ड को केवल एक वित्तीय संस्था नहीं, बल्कि संस्थान निर्माण करने वाली और टिकाऊ ग्रामीण विकास को गति देने वाली एक अग्रणी संस्था में परिवर्तित कर रही हैं। गौरतलब है कि यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है जब ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। भारत-ब्रिटेन एफटीए के लागू होने के बाद नाबार्ड की यह विस्तारित भूमिका ग्रामीण निर्यातकों और किसानों के लिए नए अवसरों का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी यह होगी कि जीरो-ड्यूटी पहुँच का लाभ छोटे किसानों और ग्रामीण निर्यातकों तक कितनी तेजी से पहुँचता है। भारत के कृषि निर्यात में प्रसंस्करण और लॉजिस्टिक्स की बाधाएं पहले से मौजूद हैं, और एफटीए इन्हें अपने आप नहीं हटाएगा। नाबार्ड की 70,000 सहकारी समितियों के कंप्यूटरीकरण की पहल सकारात्मक है, पर सवाल यह है कि डिजिटल बुनियादी ढाँचा बनने से व्यावसायिक परिणाम मिलने तक की खाई को कैसे पाटा जाएगा। बिना मजबूत घरेलू सक्षम माहौल के, ऐतिहासिक समझौते भी कागजी उपलब्धि बनकर रह जाते हैं।
RashtraPress
16 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) क्या है?
भारत-ब्रिटेन एफटीए दोनों देशों के बीच हुआ एक व्यापक आर्थिक समझौता है, जिसके तहत कई भारतीय उत्पादों को ब्रिटेन के बाजार में जीरो-ड्यूटी पहुँच मिलेगी और अन्य पर शुल्क में कमी की जाएगी। यह समझौता व्यापार, निवेश, सेवाओं और प्रौद्योगिकी — सभी क्षेत्रों को कवर करता है।
नाबार्ड चेयरमैन ने एफटीए पर क्या कहा?
नाबार्ड चेयरमैन डॉ. शाजी कृष्णन वी ने 16 जुलाई को मुंबई में इसे ऐतिहासिक समझौता बताया और कहा कि यह भारतीय निर्यात को बढ़ावा देगा तथा उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को सुदृढ़ करेगा। उन्होंने यह भी जोर दिया कि इसका पूरा लाभ उठाने के लिए देश के भीतर सक्षम माहौल तैयार करना सबसे ज़रूरी कदम है।
एफटीए से भारतीय उद्योगों को क्या फायदा होगा?
बाजार तक बेहतर पहुँच और आर्थिक उदारीकरण से भारतीय उद्योग वैश्विक स्तर पर अपनी उपस्थिति बढ़ा सकेंगे, प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता सुधार सकेंगे और कारोबार का विस्तार कर सकेंगे। विशेष रूप से वे उत्पाद जिन्हें जीरो-ड्यूटी पहुँच मिलेगी, उनके निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि की संभावना है।
नाबार्ड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में क्या नई भूमिका है?
नाबार्ड अब केवल ऋण देने वाली संस्था नहीं रही, बल्कि ग्रामीण बुनियादी ढाँचे के वित्तपोषण, कृषि मूल्य श्रृंखलाओं के मानचित्रण और एफपीओ व सहकारी संस्थाओं की क्षमता बढ़ाने में भी अग्रणी भूमिका निभा रही है। अब तक करीब 70,000 प्राथमिक सहकारी समितियों का कंप्यूटरीकरण किया जा चुका है।
सहकारी समितियों के कंप्यूटरीकरण से क्या बदलाव आएगा?
नाबार्ड द्वारा करीब 70,000 प्राथमिक सहकारी समितियों के कंप्यूटरीकरण से पारदर्शिता, ट्रेसबिलिटी और परिचालन दक्षता में सुधार होगा। यह कदम ग्रामीण वित्तीय प्रणाली को अधिक जवाबदेह और कुशल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संस्थागत सुधार है।
राष्ट्र प्रेस
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