ज्वेलरी उद्योग में कौशल प्रशिक्षण को शैक्षणिक मान्यता देना ज़रूरी: कोलकाता में विशेषज्ञों की राय
सारांश
मुख्य बातें
ज्वेलरी उद्योग के विशेषज्ञों ने 30 सितंबर 2026 को कोलकाता में स्पष्ट रूप से कहा कि पारंपरिक आभूषण कारीगरी को जीवित रखने और युवाओं को इस क्षेत्र की ओर आकर्षित करने के लिए कौशल-आधारित प्रशिक्षण को औपचारिक शैक्षणिक मान्यता देना अब अनिवार्य हो गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, कारीगर इस उद्योग की सबसे बुनियादी और अपरिहार्य नींव हैं, और उनकी अगली पीढ़ी तैयार करने के लिए शिक्षा व उद्योग के बीच एक ठोस सेतु बनाना होगा।
नई पीढ़ी के कारीगरों की घटती रुचि — मुख्य चुनौती
इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स (ICC) की नेशनल एक्सपर्ट कमेटी ऑन ज्वेलरी एंड लाइफस्टाइल के अध्यक्ष और नेमिचंद बामलवा एंड संस के निदेशक विनोद बामलवा ने कहा कि ज्वेलरी उद्योग के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यह है कि नई पीढ़ी के कारीगर इस क्षेत्र में आने से कतरा रहे हैं।
उनके अनुसार, इसकी प्रमुख वजह यह है कि आभूषण निर्माण से जुड़े कार्य को अब तक औपचारिक व्यावसायिक शिक्षा के रूप में पर्याप्त मान्यता नहीं मिल पाई है। बामलवा ने कहा, 'यदि ज्वेलरी निर्माण से जुड़े कौशल को शैक्षणिक डिग्री और प्रमाणपत्रों से जोड़ा जाए, तो युवाओं का आकर्षण इस क्षेत्र की ओर स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा।'
कक्षा 8 से ही उद्योग-आधारित शिक्षा का प्रस्ताव
विनोद बामलवा ने बताया कि सरकार इस दिशा में प्रयासरत है कि कक्षा 8, 9 और 10 से ही छात्रों को उद्योग के सहयोग से ज्वेलरी निर्माण और संबंधित तकनीकी विषयों की शिक्षा दी जाए। उन्होंने कहा कि उद्योग जगत ने इस पहल को पूरा समर्थन देने का आश्वासन दिया है।
उन्होंने यह भी बताया कि संबंधित मंत्री ने उद्योग प्रतिनिधियों को स्पष्ट संदेश दिया है कि वे बिना किसी संकोच के कार्य करें और यदि कोई बाधा आती है तो सरकार उसके समाधान के लिए तत्पर है। सरकार का उद्देश्य है कि कौशल-आधारित प्रशिक्षण को उच्च शिक्षा के समकक्ष सम्मान और पहचान मिले।
पश्चिम बंगाल की कारीगरी परंपरा और राष्ट्रीय महत्व
ICC की उसी समिति के को-चेयरमैन तथा सेनको गोल्ड एंड डायमंड्स के प्रबंध निदेशक एवं सीईओ सुवंकर सेन ने बताया कि पश्चिम बंगाल में कारीगरी की परंपरा कई दशकों पुरानी है। देश के प्रमुख ज्वेलरी केंद्रों — मुंबई, सूरत और दक्षिण भारत — में काम करने वाले बड़ी संख्या में कारीगर बंगाल से आते हैं।
सेन ने ज़ोर देकर कहा कि उद्योग और सरकार को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि इस कला और कौशल को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाया जाए। यह ऐसे समय में और भी ज़रूरी हो गया है जब वैश्विक आभूषण बाज़ार में भारतीय कारीगरी की माँग तेज़ी से बढ़ रही है।
ज्वेलरी शिक्षा का दायरा — सिर्फ आभूषण बनाना नहीं
सुवंकर सेन ने स्पष्ट किया कि ज्वेलरी उद्योग से जुड़ी पढ़ाई केवल आभूषण बनाने तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा, 'इसमें धातु विज्ञान, मार्केटिंग, बिक्री तकनीक और उत्पाद प्रबंधन जैसे कई विषय शामिल होते हैं।' उनके अनुसार, यदि स्कूल और कॉलेज स्तर पर इस तरह की शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए, तो युवाओं को रोज़गार और उद्यमिता के नए अवसर मिल सकते हैं।
गौरतलब है कि सरकार ने इस उद्देश्य के लिए एक विशेष टास्क फोर्स का गठन किया है, जिसका काम यह सुनिश्चित करना है कि छात्रों को ऐसा प्रशिक्षण मिले जिससे उनके करियर को वास्तविक और दीर्घकालिक लाभ पहुँचे। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उद्योग जगत और शैक्षणिक संस्थान मिलकर पाठ्यक्रम तैयार करें, तो स्किल डेवलपमेंट और नॉलेज ट्रेनिंग कहीं अधिक प्रभावी होगी।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शिक्षा को उद्योग की ज़रूरतों के अनुरूप ढाला जाए और कौशल प्रशिक्षण को डिग्री या औपचारिक मान्यता से जोड़ा जाए, तो कारीगरों की अगली पीढ़ी तैयार करने में मदद मिलेगी और भारत की पारंपरिक आभूषण कला को भी संरक्षित किया जा सकेगा। सरकार की यह पहल ज्वेलरी क्षेत्र को एक संगठित, पेशेवर और भविष्योन्मुखी उद्योग के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।