30 सितंबर 2026
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ज्वेलरी उद्योग में कौशल प्रशिक्षण को शैक्षणिक मान्यता देना ज़रूरी: कोलकाता में विशेषज्ञों की राय

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ज्वेलरी उद्योग में कौशल प्रशिक्षण को शैक्षणिक मान्यता देना ज़रूरी: कोलकाता में विशेषज्ञों की राय

सारांश

ज्वेलरी उद्योग के दिग्गजों ने कोलकाता में एकमत होकर कहा — कारीगरी को बचाना है तो कौशल को डिग्री से जोड़ना होगा। सरकार ने टास्क फोर्स बनाई, कक्षा 8 से उद्योग-आधारित शिक्षा का प्रस्ताव है। पश्चिम बंगाल के कारीगर देश के बड़े ज्वेलरी केंद्रों की रीढ़ हैं।

मुख्य बातें

ज्वेलरी उद्योग विशेषज्ञों ने 30 सितंबर 2026 को कोलकाता में कौशल प्रशिक्षण को औपचारिक शैक्षणिक मान्यता देने की माँग उठाई।
विनोद बामलवा (निदेशक, नेमिचंद बामलवा एंड संस) ने कहा कि कक्षा 8, 9 और 10 से ही उद्योग-सहयोगी ज्वेलरी शिक्षा शुरू करने की योजना है।
सुवंकर सेन (MD व CEO, सेनको गोल्ड एंड डायमंड्स) ने बताया कि पश्चिम बंगाल के कारीगर मुंबई, सूरत और दक्षिण भारत के ज्वेलरी केंद्रों की रीढ़ हैं।
सरकार ने उद्योग-केंद्रित पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए एक विशेष टास्क फोर्स का गठन किया है।
ज्वेलरी शिक्षा में धातु विज्ञान, मार्केटिंग, बिक्री तकनीक और उत्पाद प्रबंधन जैसे विषय शामिल करने का प्रस्ताव है।

ज्वेलरी उद्योग के विशेषज्ञों ने 30 सितंबर 2026 को कोलकाता में स्पष्ट रूप से कहा कि पारंपरिक आभूषण कारीगरी को जीवित रखने और युवाओं को इस क्षेत्र की ओर आकर्षित करने के लिए कौशल-आधारित प्रशिक्षण को औपचारिक शैक्षणिक मान्यता देना अब अनिवार्य हो गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, कारीगर इस उद्योग की सबसे बुनियादी और अपरिहार्य नींव हैं, और उनकी अगली पीढ़ी तैयार करने के लिए शिक्षा व उद्योग के बीच एक ठोस सेतु बनाना होगा।

नई पीढ़ी के कारीगरों की घटती रुचि — मुख्य चुनौती

इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स (ICC) की नेशनल एक्सपर्ट कमेटी ऑन ज्वेलरी एंड लाइफस्टाइल के अध्यक्ष और नेमिचंद बामलवा एंड संस के निदेशक विनोद बामलवा ने कहा कि ज्वेलरी उद्योग के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यह है कि नई पीढ़ी के कारीगर इस क्षेत्र में आने से कतरा रहे हैं।

उनके अनुसार, इसकी प्रमुख वजह यह है कि आभूषण निर्माण से जुड़े कार्य को अब तक औपचारिक व्यावसायिक शिक्षा के रूप में पर्याप्त मान्यता नहीं मिल पाई है। बामलवा ने कहा, 'यदि ज्वेलरी निर्माण से जुड़े कौशल को शैक्षणिक डिग्री और प्रमाणपत्रों से जोड़ा जाए, तो युवाओं का आकर्षण इस क्षेत्र की ओर स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा।'

कक्षा 8 से ही उद्योग-आधारित शिक्षा का प्रस्ताव

विनोद बामलवा ने बताया कि सरकार इस दिशा में प्रयासरत है कि कक्षा 8, 9 और 10 से ही छात्रों को उद्योग के सहयोग से ज्वेलरी निर्माण और संबंधित तकनीकी विषयों की शिक्षा दी जाए। उन्होंने कहा कि उद्योग जगत ने इस पहल को पूरा समर्थन देने का आश्वासन दिया है।

उन्होंने यह भी बताया कि संबंधित मंत्री ने उद्योग प्रतिनिधियों को स्पष्ट संदेश दिया है कि वे बिना किसी संकोच के कार्य करें और यदि कोई बाधा आती है तो सरकार उसके समाधान के लिए तत्पर है। सरकार का उद्देश्य है कि कौशल-आधारित प्रशिक्षण को उच्च शिक्षा के समकक्ष सम्मान और पहचान मिले।

पश्चिम बंगाल की कारीगरी परंपरा और राष्ट्रीय महत्व

ICC की उसी समिति के को-चेयरमैन तथा सेनको गोल्ड एंड डायमंड्स के प्रबंध निदेशक एवं सीईओ सुवंकर सेन ने बताया कि पश्चिम बंगाल में कारीगरी की परंपरा कई दशकों पुरानी है। देश के प्रमुख ज्वेलरी केंद्रों — मुंबई, सूरत और दक्षिण भारत — में काम करने वाले बड़ी संख्या में कारीगर बंगाल से आते हैं।

सेन ने ज़ोर देकर कहा कि उद्योग और सरकार को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि इस कला और कौशल को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाया जाए। यह ऐसे समय में और भी ज़रूरी हो गया है जब वैश्विक आभूषण बाज़ार में भारतीय कारीगरी की माँग तेज़ी से बढ़ रही है।

ज्वेलरी शिक्षा का दायरा — सिर्फ आभूषण बनाना नहीं

सुवंकर सेन ने स्पष्ट किया कि ज्वेलरी उद्योग से जुड़ी पढ़ाई केवल आभूषण बनाने तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा, 'इसमें धातु विज्ञान, मार्केटिंग, बिक्री तकनीक और उत्पाद प्रबंधन जैसे कई विषय शामिल होते हैं।' उनके अनुसार, यदि स्कूल और कॉलेज स्तर पर इस तरह की शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए, तो युवाओं को रोज़गार और उद्यमिता के नए अवसर मिल सकते हैं।

गौरतलब है कि सरकार ने इस उद्देश्य के लिए एक विशेष टास्क फोर्स का गठन किया है, जिसका काम यह सुनिश्चित करना है कि छात्रों को ऐसा प्रशिक्षण मिले जिससे उनके करियर को वास्तविक और दीर्घकालिक लाभ पहुँचे। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उद्योग जगत और शैक्षणिक संस्थान मिलकर पाठ्यक्रम तैयार करें, तो स्किल डेवलपमेंट और नॉलेज ट्रेनिंग कहीं अधिक प्रभावी होगी।

आगे की राह

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शिक्षा को उद्योग की ज़रूरतों के अनुरूप ढाला जाए और कौशल प्रशिक्षण को डिग्री या औपचारिक मान्यता से जोड़ा जाए, तो कारीगरों की अगली पीढ़ी तैयार करने में मदद मिलेगी और भारत की पारंपरिक आभूषण कला को भी संरक्षित किया जा सकेगा। सरकार की यह पहल ज्वेलरी क्षेत्र को एक संगठित, पेशेवर और भविष्योन्मुखी उद्योग के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन ठोस नीतिगत कदम सीमित रहे हैं। टास्क फोर्स का गठन और कक्षा 8 से उद्योग-आधारित पाठ्यक्रम का प्रस्ताव सकारात्मक संकेत हैं, मगर असली परीक्षा क्रियान्वयन में होगी। भारत में व्यावसायिक शिक्षा की ऐतिहासिक उपेक्षा को देखते हुए, बिना बाध्यकारी उद्योग-शिक्षा साझेदारी और प्रमाणित रोज़गार परिणामों के, यह पहल भी कागज़ी घोषणाओं की कतार में खड़ी हो सकती है।
RashtraPress
30 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ज्वेलरी उद्योग में कौशल प्रशिक्षण को शैक्षणिक मान्यता देने की माँग क्यों उठ रही है?
विशेषज्ञों के अनुसार, नई पीढ़ी के कारीगर इस क्षेत्र में इसलिए नहीं आ रहे क्योंकि आभूषण निर्माण को अब तक औपचारिक व्यावसायिक शिक्षा का दर्जा नहीं मिला है। यदि इस कौशल को डिग्री या प्रमाणपत्र से जोड़ा जाए, तो युवाओं का रुझान बढ़ेगा और पारंपरिक कारीगरी भी सुरक्षित रहेगी।
सरकार ज्वेलरी शिक्षा के लिए क्या कदम उठा रही है?
सरकार ने एक विशेष टास्क फोर्स का गठन किया है और कक्षा 8, 9 व 10 से उद्योग के सहयोग से ज्वेलरी निर्माण व तकनीकी विषयों की शिक्षा देने की योजना बनाई है। संबंधित मंत्री ने उद्योग प्रतिनिधियों को आश्वस्त किया है कि किसी भी बाधा का समाधान किया जाएगा।
पश्चिम बंगाल के कारीगरों की भूमिका राष्ट्रीय ज्वेलरी उद्योग में कितनी अहम है?
सुवंकर सेन के अनुसार, पश्चिम बंगाल में कारीगरी की परंपरा कई दशकों पुरानी है और मुंबई, सूरत व दक्षिण भारत के प्रमुख ज्वेलरी केंद्रों में काम करने वाले बड़ी संख्या में कारीगर बंगाल से आते हैं। इस परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुँचाना उद्योग और सरकार दोनों की ज़िम्मेदारी है।
ज्वेलरी की पढ़ाई में कौन-कौन से विषय शामिल होते हैं?
सुवंकर सेन ने बताया कि ज्वेलरी शिक्षा केवल आभूषण बनाने तक सीमित नहीं है — इसमें धातु विज्ञान, मार्केटिंग, बिक्री तकनीक और उत्पाद प्रबंधन जैसे विषय भी शामिल होते हैं। इन्हें पाठ्यक्रम में शामिल करने से युवाओं को रोज़गार और उद्यमिता के नए अवसर मिल सकते हैं।
उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों की साझेदारी से क्या फायदा होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उद्योग जगत और शैक्षणिक संस्थान मिलकर पाठ्यक्रम तैयार करें, तो स्किल डेवलपमेंट और नॉलेज ट्रेनिंग अधिक प्रभावी होगी। इससे शिक्षा उद्योग की वास्तविक ज़रूरतों के अनुरूप बनेगी और प्रशिक्षित कारीगरों की आपूर्ति सुनिश्चित होगी।
राष्ट्र प्रेस
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