पारंपरिक भारतीय शिल्प कौशल आर्थिक विकास की धुरी बन सकती है: PM मोदी ने 'एक जिला, एक उत्पाद' की सराहना की
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 जुलाई 2026 को कहा कि इनोवेशन और वैश्विक साझेदारियों के माध्यम से पारंपरिक भारतीय शिल्प कौशल देश के आर्थिक विकास में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का एक लेख साझा करते हुए यह बात कही, जिसमें 'एक जिला, एक उत्पाद' पहल की सफलता का विस्तार से उल्लेख किया गया था।
एक जिला, एक उत्पाद: स्थानीय शिल्पों को वैश्विक मंच
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने लेख में बताया कि 'एक जिला, एक उत्पाद' पहल स्थानीय शिल्पों को बाज़ार तक पहुँच दिलाने, टिकाऊ आजीविका सृजित करने, सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को मज़बूत करने में सहायक सिद्ध हो रही है। उन्होंने चेन्नई स्थित संस्था 'वस्त्रकला' को इस दिशा में एक प्रेरक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया।
भारत-फ्रांस साझेदारी: हाउट कूचर से मिली वैश्विक पहचान
वित्त मंत्री के अनुसार, पेरिस में हाल ही में आयोजित एक निवेशक बैठक के दौरान भारत में फ्रांस के राजदूत ने स्वयं 'वस्त्रकला' का उल्लेख किया। यह भारत-फ्रांस साझेदारी का एक अनूठा उदाहरण है, जिसने फ्रांस की हाउट कूचर (उच्चस्तरीय फैशन कला) को भारत की सदियों पुरानी कढ़ाई परंपरा के साथ जोड़ा है। इस सहयोग ने भारतीय कारीगरों को सीधे वैश्विक फैशन बाज़ारों से जोड़ने का मार्ग प्रशस्त किया है।
गाँव की ओर लौटी कंपनी: रोज़गार का उल्टा प्रवाह
भारत लौटने के बाद वित्त मंत्री चेन्नई के निकट तिरुवल्लूर जिले के गुडापक्कम स्थित वस्त्रकला की कार्यशाला में गईं। कारीगरों के साथ दोपहर के भोजन के दौरान उन्हें पता चला कि वस्त्रकला ने जानबूझकर अपनी पहली चेन्नई स्थित कार्यशाला को गुडापक्कम स्थानांतरित किया — ताकि पीढ़ियों से इन पारंपरिक कौशलों को संजोए हुए गाँवों के लोगों तक उच्च मूल्य वाले रोज़गार पहुँचाए जा सकें। यह प्रचलित प्रवृत्ति के विपरीत है: आमतौर पर युवा रोज़गार के लिए गाँव छोड़कर शहर जाते हैं, लेकिन यहाँ एक कंपनी ने शहर छोड़कर गाँव में बसने का फैसला किया।
सूखे की ज़मीन से उपजी कला: कारीगरों की अदम्य जिजीविषा
वित्त मंत्री ने बताया कि वस्त्रकला कांचीपुरम-श्रीपेरंबुदूर-तिरुवल्लूर के सूखा-प्रभावित क्षेत्र में स्थित है। उन्होंने कहा, 'पुराने समय में जब बारिश नहीं होती थी, तो खेती का काम रुक जाता था। जब हल चलना बंद हो जाता था, तब किसान सुई-धागा उठाकर सूती और रेशमी कपड़ों पर सुंदर कढ़ाई किया करते थे। अपनी रचनात्मकता के बल पर ग्रामीण सूखे की कठिनाइयों का सामना कर लेते थे। यह कला असाधारण धैर्य, बारीकी और अनुशासन की माँग करती है, और ये गुण शुष्क क्षेत्रों के किसानों में भरपूर होते हैं।' यह टिप्पणी इस बात की ओर संकेत करती है कि पारंपरिक शिल्प केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि आर्थिक लचीलेपन का भी प्रतीक हैं।
आगे की राह
गौरतलब है कि 'एक जिला, एक उत्पाद' पहल के तहत देशभर के सैकड़ों जिलों के स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों से जोड़ने का प्रयास जारी है। वस्त्रकला जैसे उदाहरण यह दर्शाते हैं कि सही नीतिगत समर्थन और वैश्विक साझेदारियों के संयोजन से पारंपरिक भारतीय शिल्प न केवल जीवित रह सकते हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी भी बन सकते हैं।