नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर उठाए सवाल, बोर्ड मीटिंग के मिनट्स और वीडियो की मांग
सारांश
मुख्य बातें
टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने टाटा संस के बोर्ड को पत्र लिखकर सितंबर 2026 में एन. चंद्रशेखरन की एग्जीक्यूटिव चेयरमैन के रूप में दोबारा नियुक्ति की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मामले से जुड़े सूत्रों के अनुसार, उन्होंने बोर्ड से उस बैठक की वीडियो रिकॉर्डिंग, मीटिंग के मिनट्स और बाद में ली गई कानूनी राय माँगी है।
विवाद की जड़: एजेंडा में नहीं था मामला
नोएल टाटा ने 30 सितंबर को भेजे एक ईमेल में आरोप लगाया कि चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का प्रस्ताव 17 सितंबर की बोर्ड मीटिंग के आधिकारिक एजेंडे में शामिल नहीं था। उनके अनुसार, इस विषय को 'एनआरसी (नॉमिनेशन एंड रिम्यूनरेशन कमेटी) की तरफ से जानकारी' वाले हिस्से में उठाया गया। उन्होंने इस आधार पर यह भी कहा कि उक्त बैठक में कोई औपचारिक प्रस्ताव पास नहीं हुआ था।
टाटा ट्रस्ट्स का कड़ा रुख
टाटा समूह की सबसे बड़ी शेयरहोल्डर, टाटा ट्रस्ट्स ने चंद्रशेखरन को तीसरे कार्यकाल के लिए दोबारा नियुक्त करने वाले बोर्ड के फैसले को 'गैर-कानूनी' और 'कानूनी रूप से अमान्य' करार दिया है। ट्रस्ट के बयान के अनुसार, नोएल टाटा — जो टाटा संस बोर्ड में नॉमिनी डायरेक्टर भी हैं — ने इस बैठक में दोबारा नियुक्ति के खिलाफ मतदान किया।
ट्रस्ट का तर्क है कि दोनों नॉमिनी डायरेक्टरों का इस प्रस्ताव का समर्थन करना अनिवार्य था। अपने पक्ष को मज़बूत करने के लिए ट्रस्ट ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की कानूनी राय का हवाला दिया है।
टाटा संस का बचाव: दो पूर्व न्यायाधीशों की राय
टाटा संस ने अपने फैसले को उचित ठहराने के लिए भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश उदय उमेश ललित और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश बी. एन. श्रीकृष्ण की कानूनी राय पेश की है। रिपोर्टों के अनुसार, दोनों न्यायाधीशों ने इस प्रस्ताव को 'सही तरीके से पारित' माना। उनका तर्क है कि जब आर्टिकल 104(बी) के तहत नियुक्त डायरेक्टर बराबर-बराबर बँटे हुए थे, तो आर्टिकल 121 की शर्तों के अंतर्गत कास्टिंग वोट ने प्रस्ताव को वैध बनाया।
कैसे पड़े वोट
टाटा ट्रस्ट्स के दूसरे नॉमिनी डायरेक्टर वेणु श्रीनिवासन ने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का समर्थन किया। चंद्रशेखरन स्वयं इस मतदान प्रक्रिया से अलग रहे और स्वतंत्र निदेशक हरीश मनवानी ने चर्चा की अध्यक्षता की। अंततः प्रस्ताव चेयरमैन के कास्टिंग वोट (निर्णायक मत) के ज़रिए पारित किया गया।
विवाद का केंद्र: आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन
इस पूरे विवाद की धुरी टाटा संस के 'आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन' हैं — विशेषकर नॉमिनी डायरेक्टर की भूमिका और चेयरमैन के 'कास्टिंग वोट' से संबंधित नियम। यह टकराव उस समय आया है जब समूह की प्रशासन संरचना और ट्रस्ट-बोर्ड शक्ति संतुलन पर व्यापक बहस जारी है। गौरतलब है कि टाटा संस एक प्राइवेट कंपनी है और उसकी प्रमुख शेयरहोल्डर टाटा ट्रस्ट्स है, जो इस विवाद को सिर्फ कॉर्पोरेट नहीं, बल्कि परोपकारी संस्थानों की जवाबदेही का सवाल भी बनाती है। आगे यह मामला कानूनी मंचों तक जा सकता है, जब तक दोनों पक्ष किसी आंतरिक समाधान पर नहीं पहुँचते।