17 सितंबर 2026
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टाटा ट्रस्ट्स ने चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को बताया 'गैरकानूनी', नोएल टाटा ने वोट किया विरोध में

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टाटा ट्रस्ट्स ने चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को बताया 'गैरकानूनी', नोएल टाटा ने वोट किया विरोध में

सारांश

टाटा समूह के भीतर बड़ा टकराव — टाटा ट्रस्ट्स ने चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को 'आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन' का उल्लंघन बताया और पूर्व मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ की कानूनी राय पेश की। यह विवाद ऐसे वक्त में उभरा है जब आरबीआई ने टाटा संस को लिस्टिंग का निर्देश दिया है।

मुख्य बातें

टाटा ट्रस्ट्स ने 17 सितंबर 2026 को एन.
चंद्रशेखरन की टाटा संस चेयरमैन पद पर पुनर्नियुक्ति को 'गैरकानूनी' और 'निराधार' घोषित किया।
बोर्ड बैठक में चार डायरेक्टरों ने प्रस्ताव के पक्ष में और नोएल एन.
टाटा ने विरोध में वोट दिया।
टाटा संस के 'आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन' के तहत चेयरमैन नियुक्ति के लिए ट्रस्ट्स के दोनों नॉमिनी डायरेक्टर्स की उपस्थिति व बहुलता से समर्थन अनिवार्य है।
नोएल टाटा ने ट्रस्ट्स के रुख के समर्थन में पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी.वाई.
चंद्रचूड़ की कानूनी राय बोर्ड के समक्ष पेश की।
आरबीआई ने 2022 में टाटा संस को NBFC-UL वर्गीकृत किया था और तीन वर्षों के भीतर लिस्टिंग अनिवार्य की थी; आरबीआई ने हाल ही में लिस्टिंग प्रक्रिया आगे बढ़ाने का निर्देश भी दिया है।

टाटा ट्रस्ट्स ने 17 सितंबर 2026 को एक आधिकारिक प्रेस रिलीज़ जारी कर टाटा संस के चेयरमैन पद पर एन. चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को 'गैरकानूनी' और 'निराधार' करार दिया। ट्रस्ट्स के चेयरमैन एवं नॉमिनी डायरेक्टर नोएल एन. टाटा ने बोर्ड बैठक में इस प्रस्ताव के विरोध में मतदान किया, जिससे टाटा समूह के भीतर एक गंभीर कॉर्पोरेट विवाद उभर कर सामने आया है।

बोर्ड बैठक में क्या हुआ

टाटा संस की बोर्ड बैठक में एन. चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव रखा गया, जिसमें चार डायरेक्टरों ने पक्ष में और नोएल टाटा ने विरोध में मत दिया। टाटा ट्रस्ट्स के अनुसार यह मतविभाजन ही प्रस्ताव को कानूनी रूप से अमान्य बना देता है।

ट्रस्ट्स के बयान में स्पष्ट किया गया: 'आज बोर्ड मीटिंग में एन. चंद्रशेखरन को फिर से नियुक्त करने के लिए जो प्रस्ताव लाया गया था, जिसमें चार डायरेक्टरों ने पक्ष में और नोएल टाटा ने विरोध में वोट दिया, वह टाटा संस के 'आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन' के नियमों के हिसाब से कानूनी रूप से अमान्य था।'

नियमों का आधार: क्यों अमान्य है यह प्रस्ताव

टाटा ट्रस्ट्स ने अपनी प्रेस रिलीज़ में स्पष्ट किया कि टाटा संस के 'आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन' के तहत चेयरमैन की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति के लिए ट्रस्ट्स के नॉमिनी डायरेक्टर्स का बहुलता में समर्थन अनिवार्य है।

इसके अलावा, बयान के अनुसार टाटा संस का बोर्ड तब तक चेयरमैन की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति संबंधी बैठक नहीं बुला सकता, जब तक टाटा ट्रस्ट्स के दोनों नॉमिनी डायरेक्टर उपस्थित न हों। गौरतलब है कि इस शर्त का भी पालन न होने की स्थिति में कोई भी प्रस्ताव वैध नहीं माना जाएगा।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश की कानूनी राय भी पेश

बयान के अनुसार, नोएल एन. टाटा ने ट्रस्ट्स के रुख की वैधता के समर्थन में जस्टिस डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़ — जो भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश हैं — से ली गई कानूनी राय भी बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत की। यह कदम इस विवाद को और अधिक गंभीरता प्रदान करता है, क्योंकि देश के पूर्वतम न्यायिक प्राधिकार का हवाला ट्रस्ट्स की स्थिति को कानूनी बल देने के लिए दिया गया है।

आरबीआई निर्देश और लिस्टिंग की पृष्ठभूमि

यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने टाटा संस को शेयर बाज़ार में लिस्टिंग की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है। उल्लेखनीय है कि 2022 में आरबीआई ने टाटा संस को 'अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी' (NBFC-UL) के रूप में वर्गीकृत किया था, जिसके अंतर्गत उसे तीन वर्षों के भीतर स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध होना अनिवार्य है।

यह ऐसे समय में आया है जब टाटा संस के भीतर नेतृत्व और स्वामित्व-संरचना को लेकर कई सवाल पहले से चर्चा में थे। लिस्टिंग की समय-सीमा और चेयरमैन-नियुक्ति विवाद एक साथ उभरने से समूह के लिए अगले कुछ माह निर्णायक साबित हो सकते हैं।

आगे क्या होगा

टाटा ट्रस्ट्स के बयान ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि वे इस मामले को न्यायालय में ले जाएंगे या नहीं, परंतु पूर्व मुख्य न्यायाधीश की कानूनी राय का हवाला देना यह संकेत देता है कि ट्रस्ट्स अपने रुख पर दृढ़ हैं। टाटा संस की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इस विवाद का समाधान न केवल टाटा समूह के भविष्य के नेतृत्व, बल्कि आरबीआई-निर्देशित लिस्टिंग की समयसीमा को भी प्रभावित कर सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन वास्तव में यह टाटा समूह की सर्वोच्च सत्ता-संरचना में एक गहरी दरार को उजागर करता है — एक तरफ परिचालन नेतृत्व है जिसे बोर्ड बहुमत का समर्थन है, और दूसरी तरफ ट्रस्ट्स जो संस्थापक-विरासत की संरक्षक हैं। नोएल टाटा का पूर्व मुख्य न्यायाधीश की कानूनी राय का सहारा लेना यह स्पष्ट करता है कि यह मामला बोर्डरूम से बाहर न्यायालय तक जा सकता है। आरबीआई की लिस्टिंग की समय-सीमा और नेतृत्व-विवाद एक साथ उभरना टाटा संस के लिए एक दोहरा संकट है, जिसका असर समूह की दीर्घकालिक रणनीतिक दिशा पर पड़ सकता है।
RashtraPress
17 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

टाटा ट्रस्ट्स ने चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को गैरकानूनी क्यों बताया?
टाटा ट्रस्ट्स के अनुसार, टाटा संस के 'आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन' के तहत चेयरमैन की नियुक्ति के लिए ट्रस्ट्स के नॉमिनी डायरेक्टर्स की बहुलता में सहमति अनिवार्य है। चूँकि नॉमिनी डायरेक्टर नोएल एन. टाटा ने प्रस्ताव के विरोध में वोट दिया, इसलिए यह पुनर्नियुक्ति नियमों के अनुसार अमान्य हो गई।
इस विवाद में नोएल टाटा की भूमिका क्या है?
नोएल एन. टाटा, टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन और टाटा संस के नॉमिनी डायरेक्टर हैं। उन्होंने बोर्ड बैठक में चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव के विरोध में मतदान किया और ट्रस्ट्स के रुख की वैधता के समर्थन में पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की कानूनी राय भी प्रस्तुत की।
जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की कानूनी राय इस मामले में क्यों अहम है?
जस्टिस डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़ भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश हैं। नोएल टाटा ने उनकी कानूनी राय बोर्ड के समक्ष यह साबित करने के लिए प्रस्तुत की कि टाटा ट्रस्ट्स का रुख कानूनी रूप से सही है। इस कदम से यह संकेत मिलता है कि विवाद न्यायालय तक जा सकता है।
टाटा संस पर आरबीआई का लिस्टिंग निर्देश क्या है और इसका इस विवाद से क्या संबंध है?
आरबीआई ने 2022 में टाटा संस को 'अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी' (NBFC-UL) के रूप में वर्गीकृत किया था, जिसके तहत तीन वर्षों के भीतर लिस्टिंग अनिवार्य है। आरबीआई ने हाल ही में लिस्टिंग प्रक्रिया आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है। नेतृत्व विवाद और लिस्टिंग की समय-सीमा एक साथ उभरने से टाटा संस के लिए यह स्थिति और जटिल हो गई है।
इस विवाद का टाटा समूह पर क्या असर पड़ सकता है?
यदि यह विवाद कानूनी लड़ाई में तब्दील होता है, तो टाटा संस के नेतृत्व में अनिश्चितता बढ़ सकती है और आरबीआई-निर्देशित लिस्टिंग की समयसीमा प्रभावित हो सकती है। समूह की दीर्घकालिक रणनीतिक दिशा और निवेशकों का विश्वास भी इस विवाद के परिणाम पर निर्भर करेगा।
राष्ट्र प्रेस
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