टाटा ट्रस्ट्स ने चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को बताया 'गैरकानूनी', नोएल टाटा ने वोट किया विरोध में
सारांश
मुख्य बातें
टाटा ट्रस्ट्स ने 17 सितंबर 2026 को एक आधिकारिक प्रेस रिलीज़ जारी कर टाटा संस के चेयरमैन पद पर एन. चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को 'गैरकानूनी' और 'निराधार' करार दिया। ट्रस्ट्स के चेयरमैन एवं नॉमिनी डायरेक्टर नोएल एन. टाटा ने बोर्ड बैठक में इस प्रस्ताव के विरोध में मतदान किया, जिससे टाटा समूह के भीतर एक गंभीर कॉर्पोरेट विवाद उभर कर सामने आया है।
बोर्ड बैठक में क्या हुआ
टाटा संस की बोर्ड बैठक में एन. चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव रखा गया, जिसमें चार डायरेक्टरों ने पक्ष में और नोएल टाटा ने विरोध में मत दिया। टाटा ट्रस्ट्स के अनुसार यह मतविभाजन ही प्रस्ताव को कानूनी रूप से अमान्य बना देता है।
ट्रस्ट्स के बयान में स्पष्ट किया गया: 'आज बोर्ड मीटिंग में एन. चंद्रशेखरन को फिर से नियुक्त करने के लिए जो प्रस्ताव लाया गया था, जिसमें चार डायरेक्टरों ने पक्ष में और नोएल टाटा ने विरोध में वोट दिया, वह टाटा संस के 'आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन' के नियमों के हिसाब से कानूनी रूप से अमान्य था।'
नियमों का आधार: क्यों अमान्य है यह प्रस्ताव
टाटा ट्रस्ट्स ने अपनी प्रेस रिलीज़ में स्पष्ट किया कि टाटा संस के 'आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन' के तहत चेयरमैन की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति के लिए ट्रस्ट्स के नॉमिनी डायरेक्टर्स का बहुलता में समर्थन अनिवार्य है।
इसके अलावा, बयान के अनुसार टाटा संस का बोर्ड तब तक चेयरमैन की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति संबंधी बैठक नहीं बुला सकता, जब तक टाटा ट्रस्ट्स के दोनों नॉमिनी डायरेक्टर उपस्थित न हों। गौरतलब है कि इस शर्त का भी पालन न होने की स्थिति में कोई भी प्रस्ताव वैध नहीं माना जाएगा।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश की कानूनी राय भी पेश
बयान के अनुसार, नोएल एन. टाटा ने ट्रस्ट्स के रुख की वैधता के समर्थन में जस्टिस डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़ — जो भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश हैं — से ली गई कानूनी राय भी बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत की। यह कदम इस विवाद को और अधिक गंभीरता प्रदान करता है, क्योंकि देश के पूर्वतम न्यायिक प्राधिकार का हवाला ट्रस्ट्स की स्थिति को कानूनी बल देने के लिए दिया गया है।
आरबीआई निर्देश और लिस्टिंग की पृष्ठभूमि
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने टाटा संस को शेयर बाज़ार में लिस्टिंग की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है। उल्लेखनीय है कि 2022 में आरबीआई ने टाटा संस को 'अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी' (NBFC-UL) के रूप में वर्गीकृत किया था, जिसके अंतर्गत उसे तीन वर्षों के भीतर स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध होना अनिवार्य है।
यह ऐसे समय में आया है जब टाटा संस के भीतर नेतृत्व और स्वामित्व-संरचना को लेकर कई सवाल पहले से चर्चा में थे। लिस्टिंग की समय-सीमा और चेयरमैन-नियुक्ति विवाद एक साथ उभरने से समूह के लिए अगले कुछ माह निर्णायक साबित हो सकते हैं।
आगे क्या होगा
टाटा ट्रस्ट्स के बयान ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि वे इस मामले को न्यायालय में ले जाएंगे या नहीं, परंतु पूर्व मुख्य न्यायाधीश की कानूनी राय का हवाला देना यह संकेत देता है कि ट्रस्ट्स अपने रुख पर दृढ़ हैं। टाटा संस की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इस विवाद का समाधान न केवल टाटा समूह के भविष्य के नेतृत्व, बल्कि आरबीआई-निर्देशित लिस्टिंग की समयसीमा को भी प्रभावित कर सकता है।