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टाटा ट्रस्ट्स ने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को दी चुनौती, AoA के तहत शर्त पूरी न होने का दिया हवाला

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टाटा ट्रस्ट्स ने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को दी चुनौती, AoA के तहत शर्त पूरी न होने का दिया हवाला

सारांश

टाटा ट्रस्ट्स ने 17 सितंबर की बोर्ड बैठक में AoA की शर्त पूरी न होने का हवाला देकर एन. चंद्रशेखरन की टाटा संस चेयरमैन पद पर दोबारा नियुक्ति को चुनौती दी। साइरस मिस्त्री मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देकर ट्रस्ट्स ने अपने अफर्मेटिव वोटिंग राइट्स को अटल बताया। यह विवाद टाटा समूह के कॉर्पोरेट प्रशासन पर गहरे सवाल खड़े करता है।

मुख्य बातें

टाटा ट्रस्ट्स ने 20 सितंबर 2026 को एन.
चंद्रशेखरन की टाटा संस चेयरमैन पद पर दोबारा नियुक्ति को औपचारिक रूप से चुनौती दी।
17 सितंबर की बोर्ड बैठक में ट्रस्ट्स के एक नामित निदेशक ने प्रस्ताव के विपक्ष में मत दिया, जिससे AoA की 'बहुलता' शर्त पूरी नहीं हुई।
टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस में 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है और बोर्ड में उनके दो नामित निदेशक हैं।
ट्रस्ट्स ने चेयरमैन के कास्टिंग वोट को अप्रासंगिक बताया — यह केवल पूरे बोर्ड में बराबरी की स्थिति में लागू होता है।
साइरस मिस्त्री मामले में सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले का हवाला दिया गया जिसमें ट्रस्ट के अफर्मेटिव वोटिंग राइट्स को वैध ठहराया गया था।
ट्रस्ट्स ने समूह के भीतर किसी गतिरोध की अटकलों को खारिज करते हुए इसे AoA का सामान्य क्रियान्वयन बताया।

टाटा ट्रस्ट्स ने 20 सितंबर 2026 को टाटा संस के चेयरमैन पद पर एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को औपचारिक रूप से चुनौती दी। ट्रस्ट्स का तर्क है कि आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (AoA) के अनुसार किसी भी प्रस्ताव को पास होने के लिए टाटा ट्रस्ट्स द्वारा नामित निदेशकों का बहुमत में मत मिलना अनिवार्य है — और 17 सितंबर को हुई बोर्ड बैठक में यह शर्त पूरी नहीं हुई। यह विवाद टाटा समूह के आंतरिक कॉर्पोरेट प्रशासन को लेकर एक अहम कानूनी मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।

मुख्य घटनाक्रम

टाटा संस में 66 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि बोर्ड में उनके दो नामित निदेशक हैं। AoA की शर्त के अनुसार प्रस्ताव को पास करने के लिए दोनों नामित निदेशकों का पक्ष में मत होना जरूरी है।

17 सितंबर की बोर्ड बैठक में चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के प्रस्ताव पर ट्रस्ट्स के एक नामित निदेशक ने विपक्ष में मत दिया। ट्रस्ट्स के अनुसार, 'बहुलता का अर्थ दो है, न कि एक' — और यह शर्त इस मामले में पूरी नहीं हुई।

चेयरमैन के वोटिंग अधिकार पर स्पष्टीकरण

टाटा ट्रस्ट्स ने चेयरमैन के कास्टिंग वोट को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की। ट्रस्ट्स के अनुसार, चेयरमैन का मत केवल तभी प्रभावी होता है जब पूरे बोर्ड स्तर पर मत बराबरी पर हों।

यह नियम टाटा ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों पर लागू नहीं होता। ट्रस्ट्स ने कहा कि मतों का अनुपात 4:1 रहा हो या कुछ और, यह अप्रासंगिक है — एकमात्र निर्णायक बात यह थी कि AoA की शर्त या तो पूरी होती है या नहीं, और इस मामले में वह पूरी नहीं हुई।

गतिरोध के आरोप से इनकार

टाटा ट्रस्ट्स ने समूह के भीतर किसी गतिरोध की अटकलों को खारिज किया। ट्रस्ट्स का कहना है कि 'बोर्ड ने एक सवाल पूछा और AoA ने उसका जवाब 'नहीं' में दिया।'

ट्रस्ट्स के अनुसार, कंपनी के अपने संविधान से मिले सुरक्षा अधिकार का उपयोग करना गतिरोध नहीं है — यह उस संविधान का उसी तरह काम करना है, जिस उद्देश्य से उसे बनाया गया था। ट्रस्ट्स ने यह भी कहा कि AoA कोई ऐसा साधन नहीं है जिसे सुविधानुसार अपनाया या अनदेखा किया जाए।

साइरस मिस्त्री मामले का संदर्भ

ट्रस्ट्स ने साइरस मिस्त्री को हटाने से जुड़ी कार्यवाही का हवाला देते हुए कहा कि टाटा संस पहले ही इसके विपरीत रुख को भारत के सर्वोच्च न्यायालय में सफलतापूर्वक स्थापित कर चुकी है।

उस मामले में नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) ने आर्टिकल 104बी और 121 के तहत ट्रस्ट के नामित निदेशकों के 'अफर्मेटिव वोटिंग राइट्स' को दमनकारी ठहराया था। टाटा संस ने उस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी, जिसने कंपनी का पक्ष स्वीकार कर NCLAT के फैसले को रद्द किया था।

ट्रस्ट्स ने तर्क दिया कि अब टाटा संस उस सुरक्षा तंत्र से पीछे नहीं हट सकती, जिसे बनाए रखने के लिए वह स्वयं सर्वोच्च न्यायालय तक गई थी। यह विवाद आने वाले दिनों में टाटा समूह की कॉर्पोरेट संरचना और शासन को नई दिशा दे सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

आज वही ढाल उसके अपने प्रमुख की नियुक्ति को रोकने के काम आ रही है। मुख्यधारा की कवरेज इस कानूनी पेचीदगी में उलझकर यह बड़ा सवाल चूक जाती है कि क्या टाटा समूह के भीतर नियंत्रण को लेकर दीर्घकालिक असहमति उभर रही है। अगर यह विवाद कानूनी मोर्चे पर जाता है, तो टाटा संस की वही कानूनी मिसाल उसके खिलाफ हथियार बन सकती है जो उसने खुद बनाई थी।
RashtraPress
20 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

टाटा ट्रस्ट्स ने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को क्यों चुनौती दी?
टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि AoA के अनुसार किसी भी प्रस्ताव के पास होने के लिए उनके दोनों नामित निदेशकों का पक्ष में मत होना जरूरी है। 17 सितंबर की बोर्ड बैठक में एक नामित निदेशक ने विपक्ष में मत दिया, जिससे यह संवैधानिक शर्त पूरी नहीं हुई।
AoA की 'बहुलता' शर्त का क्या अर्थ है?
AoA की 'बहुलता' शर्त का अर्थ है कि टाटा ट्रस्ट्स के दोनों नामित निदेशकों को प्रस्ताव के पक्ष में मत देना होगा। ट्रस्ट्स के अनुसार, 'बहुलता का मतलब दो है, न कि एक।'
चेयरमैन के कास्टिंग वोट का इस मामले में क्या महत्व था?
टाटा ट्रस्ट्स के अनुसार, चेयरमैन का मत केवल तभी लागू होता है जब पूरे बोर्ड में मत बराबरी पर हों। यह नियम ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों पर लागू नहीं होता, इसलिए मतों का अनुपात 4:1 होना भी अप्रासंगिक था।
साइरस मिस्त्री मामले का इस विवाद से क्या संबंध है?
साइरस मिस्त्री को हटाने की कार्यवाही में NCLAT ने ट्रस्ट के अफर्मेटिव वोटिंग राइट्स को दमनकारी माना था, जिसे टाटा संस ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देकर रद्द करवाया था। अब ट्रस्ट्स का तर्क है कि टाटा संस उसी सुरक्षा तंत्र से पीछे नहीं हट सकती जिसे बनाए रखने के लिए वह खुद सर्वोच्च न्यायालय गई थी।
क्या टाटा समूह में कोई गतिरोध है?
टाटा ट्रस्ट्स ने किसी गतिरोध से इनकार किया है। ट्रस्ट्स का कहना है कि यह AoA का सामान्य क्रियान्वयन है — कंपनी के संविधान से मिले सुरक्षा अधिकार का उपयोग करना गतिरोध नहीं, बल्कि उस संविधान का अपेक्षित संचालन है।
राष्ट्र प्रेस
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