12 जुलाई 2026
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ओएनजीसी ने लद्दाख की पुगा घाटी में दूसरे भू-तापीय कुएं की ड्रिलिंग पूरी की, भारत के पहले 1 MWe पायलट प्लांट की राह खुली

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ओएनजीसी ने लद्दाख की पुगा घाटी में दूसरे भू-तापीय कुएं की ड्रिलिंग पूरी की, भारत के पहले 1 MWe पायलट प्लांट की राह खुली

सारांश

ओएनजीसी ने लद्दाख की पुगा घाटी में दूसरे भू-तापीय कुएं की ड्रिलिंग पूरी कर एक ऐतिहासिक पड़ाव पार किया है। 14,000 फीट की ऊँचाई पर 1,000 मीटर गहराई तक की यह ड्रिलिंग पहले अभियान से कम समय और कम लागत में हुई — और अब भारत के पहले 1 MWe पायलट जियोथर्मल संयंत्र का रास्ता साफ हो गया है।

मुख्य बातें

ONGC ने 12 जुलाई 2026 को लद्दाख की पुगा घाटी में दूसरे भू-तापीय कुएं की ड्रिलिंग पूरी होने की पुष्टि की।
कुआँ 14,000 फीट से अधिक की ऊँचाई पर 1,000 मीटर की गहराई तक लगभग एक महीने में खोदा गया।
दूसरी ड्रिलिंग पहले अभियान की तुलना में कम समय और कम लागत में पूरी हुई।
अगला लक्ष्य 1 MWe क्षमता का पायलट भू-तापीय बिजली संयंत्र स्थापित करना है।
पुगा को भारत का सर्वाधिक संभावनाशील भू-तापीय क्षेत्र माना जाता है; पहले कुएं से उबलते पानी से अधिक तापमान की भाप मिली थी।
भारत की गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता 2014 के 81 GW से बढ़कर 288 GW हो चुकी है; 2030 तक 500 GW का लक्ष्य।

तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ONGC) ने 12 जुलाई 2026 को पुष्टि की कि उसने लद्दाख की पुगा घाटी में अपने दूसरे भू-तापीय कुएं की ड्रिलिंग सफलतापूर्वक पूरी कर ली है। यह उपलब्धि भारत के पहले 1 मेगावाट इलेक्ट्रिक (MWe) पायलट भू-तापीय बिजली संयंत्र की स्थापना की दिशा में निर्णायक कदम मानी जा रही है। 14,000 फीट से अधिक की ऊँचाई पर 1,000 मीटर की गहराई तक यह ड्रिलिंग लगभग एक महीने में पूरी हुई।

ड्रिलिंग अभियान का विवरण

यह कार्य ONGC की अनुसंधान एवं विकास इकाई ONGC एनर्जी सेंटर ने अंजाम दिया। कंपनी के बयान के अनुसार, दूसरा कुआँ पहले भू-तापीय ड्रिलिंग अभियान की तुलना में कम समय और कम लागत में पूरा किया गया — जो परिचालन दक्षता में सुधार का संकेत है। यह उपलब्धि इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि पुगा जैसे दुर्गम, उच्च-ऊँचाई वाले इलाकों में भारी मशीनरी संचालन अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता है।

पहले कुएं की सफलता ने बनाई नींव

ONGC के अनुसार, दूसरा कुआँ पुगा में खोदे गए पहले भू-तापीय कुएं की सफलता पर आधारित है। पहले कुएं से पानी के उबलने के तापमान से अधिक तापमान वाली भाप निकली थी, जिसने इस क्षेत्र में भू-तापीय ऊर्जा की व्यावसायिक संभावनाओं को प्रमाणित किया। पूर्वी लद्दाख में स्थित पुगा भू-तापीय क्षेत्र को भारत का सर्वाधिक संभावनाशील भू-तापीय संसाधन माना जाता है, हालाँकि तकनीकी और आर्थिक चुनौतियों के कारण अब तक यहाँ व्यावसायिक उत्पादन शुरू नहीं हो सका था।

आगे की योजना

परियोजना के अगले चरण में 1 MWe क्षमता वाला पायलट जियोथर्मल बिजली संयंत्र स्थापित करने की योजना है। दीर्घकालिक लक्ष्य लद्दाख को विश्वसनीय आधारभूत बिजली उपलब्ध कराना है — एक ऐसा क्षेत्र जहाँ ग्रिड कनेक्टिविटी सीमित और मौसमी बाधाएँ अधिक हैं। ONGC का कहना है कि यह परियोजना देश में भू-तापीय ऊर्जा के व्यावसायिक उपयोग का मार्ग भी प्रशस्त कर सकती है।

भू-तापीय ऊर्जा क्यों महत्वपूर्ण है

भू-तापीय ऊर्जा पृथ्वी की सतह के नीचे मौजूद प्राकृतिक ऊष्मा से बिजली और ताप उत्पन्न करती है। यह चौबीसों घंटे उपलब्ध, कम-कार्बन उत्सर्जन वाला ऊर्जा स्रोत है। सौर और पवन ऊर्जा के विपरीत, यह मौसम पर कम निर्भर होने के कारण अधिक स्थिर मानी जाती है — जो इसे बेसलोड बिजली के लिए उपयुक्त बनाती है। गौरतलब है कि भारत की गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित क्षमता 2014 के 81 गीगावाट से बढ़कर वर्तमान में 288 गीगावाट हो चुकी है — 256% से अधिक की वृद्धि। इसी अवधि में सौर ऊर्जा क्षमता 2.8 गीगावाट से 155 गीगावाट और पवन ऊर्जा 21 गीगावाट से 56.4 गीगावाट हो गई है।

राष्ट्रीय ऊर्जा लक्ष्य से जुड़ाव

भारत वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता हासिल करने के लक्ष्य पर काम कर रहा है। इस संदर्भ में पुगा परियोजना की सफलता महत्वपूर्ण है — यह ऐसे समय में आई है जब भारत अपने नवीकरणीय ऊर्जा पोर्टफोलियो में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है। यदि पायलट संयंत्र सफल रहा, तो यह देश के अन्य भू-तापीय-समृद्ध क्षेत्रों में विस्तार की संभावना खोल सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह ध्यान देने योग्य है कि पुगा को दशकों से भारत का सर्वश्रेष्ठ भू-तापीय क्षेत्र माना जाता रहा है और यहाँ बार-बार अन्वेषण कार्य हुए हैं — फिर भी व्यावसायिक उत्पादन अब तक नहीं हो सका। 1 MWe का पायलट संयंत्र एक छोटा लेकिन जरूरी कदम है; असली परीक्षा यह होगी कि क्या यह परियोजना तकनीकी और आर्थिक व्यवहार्यता साबित कर पाती है, जो अब तक इस क्षेत्र की सबसे बड़ी बाधा रही है। भारत के 500 GW नवीकरणीय लक्ष्य में भू-तापीय की हिस्सेदारी अभी नगण्य है — यह परियोजना उसे बदल सकती है, बशर्ते क्रियान्वयन में देरी न हो।
RashtraPress
12 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ओएनजीसी ने लद्दाख में दूसरे भू-तापीय कुएं की ड्रिलिंग कहाँ और कब पूरी की?
ONGC ने 12 जुलाई 2026 को पुष्टि की कि उसने लद्दाख की पुगा घाटी में 14,000 फीट से अधिक की ऊँचाई पर 1,000 मीटर गहराई तक दूसरे भू-तापीय कुएं की ड्रिलिंग लगभग एक महीने में पूरी कर ली है। यह कार्य ONGC एनर्जी सेंटर ने अंजाम दिया।
पुगा भू-तापीय परियोजना का अगला चरण क्या है?
अगले चरण में 1 MWe क्षमता का पायलट जियोथर्मल बिजली संयंत्र स्थापित करने की योजना है। दीर्घकालिक लक्ष्य लद्दाख को विश्वसनीय आधारभूत बिजली उपलब्ध कराना और देश में भू-तापीय ऊर्जा के व्यावसायिक उपयोग का मार्ग खोलना है।
पुगा घाटी को भारत का सबसे संभावनाशील भू-तापीय क्षेत्र क्यों माना जाता है?
पूर्वी लद्दाख में स्थित पुगा घाटी में पहले भू-तापीय कुएं से पानी के उबलने के तापमान से अधिक तापमान वाली भाप निकली थी, जो इस क्षेत्र में प्रचुर भू-तापीय ऊर्जा की पुष्टि करती है। इसीलिए इसे भारत का सर्वाधिक संभावनाशील भू-तापीय संसाधन माना जाता है।
भू-तापीय ऊर्जा सौर और पवन ऊर्जा से किस प्रकार अलग है?
भू-तापीय ऊर्जा पृथ्वी की सतह के नीचे की प्राकृतिक ऊष्मा से चौबीसों घंटे बिजली उत्पन्न करती है और मौसम पर कम निर्भर होती है। सौर और पवन ऊर्जा की तुलना में यह अधिक स्थिर बेसलोड स्रोत है और इसका कार्बन उत्सर्जन भी कम है।
भारत के नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य में यह परियोजना कहाँ फिट होती है?
भारत 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता हासिल करने के लक्ष्य पर काम कर रहा है। देश की स्थापित गैर-जीवाश्म क्षमता 2014 के 81 GW से बढ़कर 288 GW हो चुकी है, लेकिन भू-तापीय की हिस्सेदारी अभी नगण्य है। पुगा पायलट परियोजना इस खाई को पाटने का पहला ठोस प्रयास है।
राष्ट्र प्रेस
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