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विक्रम-1 की उड़ान के नायक: पवन चंदाना और नागा भरत डाका ने बदली भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र की दिशा

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विक्रम-1 की उड़ान के नायक: पवन चंदाना और नागा भरत डाका ने बदली भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र की दिशा

सारांश

इसरो के दो पूर्व वैज्ञानिकों का 2018 में बोया सपना आज 1.1 अरब डॉलर की कंपनी बन चुका है। पवन चंदाना और नागा भरत डाका ने विक्रम-1 से भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च कर साबित किया कि सरकारी संस्थान से निकला जुनून देश की अंतरिक्ष तस्वीर बदल सकता है।

मुख्य बातें

पवन कुमार चंदाना (CEO) और नागा भरत डाका (COO) ने 2018 में हैदराबाद में स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना की।
दोनों संस्थापक इसरो के पूर्व वैज्ञानिक हैं — चंदाना ने जीएसएलवी मार्क-3 पर और डाका ने फ्लाइट कंप्यूटर एवियोनिक्स पर काम किया।
विक्रम-1 भारत का पहला सफल निजी ऑर्बिटल रॉकेट है, जिसने श्रीहरिकोटा से उड़ान भरी।
कंपनी की वैल्यूएशन 1.1 अरब डॉलर ; जीआईसी और टेमासेक जैसे वैश्विक निवेशकों का समर्थन प्राप्त।
18 नवंबर 2022 को 'विक्रम-एस' की उड़ान से भारत ने पहली बार निजी रॉकेट को आसमान में उड़ते देखा।
कंपनी में अब 1,000 से अधिक पेशेवर कार्यरत हैं।

स्काईरूट एयरोस्पेस के सह-संस्थापकों पवन कुमार चंदाना और नागा भरत डाका ने 2018 में हैदराबाद में जो सपना बोया था, वह आज भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि बन चुका है। इसरो के पूर्व वैज्ञानिकों की इस जोड़ी ने विक्रम-1 — भारत के पहले निजी ऑर्बिटल रॉकेट — को श्रीहरिकोटा से सफलतापूर्वक लॉन्च कर इतिहास रच दिया। यह उपलब्धि न केवल दो उद्यमियों की व्यक्तिगत जीत है, बल्कि भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी के एक नए युग की शुरुआत भी है।

दो वैज्ञानिकों का साझा सपना

पवन कुमार चंदाना ने पहले ही प्रयास में आईआईटी प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की और आईआईटी खड़गपुर से इंजीनियरिंग की। जब अधिकांश साथी टेक्नोलॉजी कंपनियों में उच्च वेतन की ओर बढ़े, चंदाना का जुनून रॉकेट और अंतरिक्ष की ओर खिंचा रहा। कैंपस प्लेसमेंट के ज़रिए सीधे इसरो में चुने गए चंदाना ने तिरुवनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर में 6 वर्ष काम किया। इस दौरान उन्होंने भारत के सबसे शक्तिशाली लॉन्च व्हीकल जीएसएलवी मार्क-3 के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इसरो का प्रतिष्ठित इंटरनल इनोवेशन अवॉर्ड भी प्राप्त किया।

वहीं, नागा भरत डाका आईआईटी मद्रास के पूर्व छात्र हैं और उनके पास माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स एवं वीएलएसआई डिजाइन में मास्टर्स डिग्री के साथ-साथ इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि भी है। इसरो में फ्लाइट कंप्यूटर इंजीनियर के रूप में उन्होंने भारतीय लॉन्च व्हीकल्स के लिए कई एवियोनिक्स मॉड्यूल डिज़ाइन और विकसित किए। एवियोनिक्स, सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी और एफपीजीए सिस्टम्स में उनकी विशेषज्ञता स्काईरूट के लॉन्च व्हीकल कार्यक्रम की रीढ़ साबित हुई।

स्काईरूट की स्थापना और शुरुआती संघर्ष

2018 में दोनों ने इसरो छोड़कर स्काईरूट एयरोस्पेस की नींव रखी — लक्ष्य था सैटेलाइट लॉन्च को कमर्शियल फ्लाइट की बुकिंग जितना सरल और किफायती बनाना। शुरुआत आसान नहीं थी। कोई भी निवेशक फंडिंग देने को तैयार नहीं था। उस कठिन दौर में फ्लिपकार्ट के सह-संस्थापक बिन्नी बंसल ने सबसे पहले भरोसा जताया और निवेश किया। इसके तुरंत बाद कोविड महामारी ने कंपनी के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी कर दीं, लेकिन ग्रीनको ने उस संकट में साथ दिया। यह ऐसे समय में आया जब भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम भी अनिश्चितता के दौर से गुज़र रहा था।

निवेश और वैल्यूएशन की छलांग

बाद के वर्षों में कंपनी ने 5.1 करोड़ डॉलर और फिर 6 करोड़ डॉलर की बड़ी फंडिंग राउंड सफलतापूर्वक पूरी की। आज जीआईसी और टेमासेक जैसे वैश्विक संस्थागत निवेशक कंपनी पर विश्वास जता चुके हैं। आँकड़ों के अनुसार, स्काईरूट की वैल्यूएशन 1.1 अरब डॉलर तक पहुँच चुकी है, जो इसे भारत के स्पेस-टेक क्षेत्र का पहला यूनिकॉर्न बनाती है। वर्तमान में कंपनी में 1,000 से अधिक पेशेवर रॉकेट डिज़ाइन, प्रोपल्शन, एवियोनिक्स और लॉन्च सिस्टम्स पर काम कर रहे हैं।

मील के पत्थर: रमन से विक्रम तक

गौरतलब है कि 2020 में स्काईरूट ने 'रमन-1' इंजन का सफल परीक्षण कर भारत की पहली निजी कंपनी होने का गौरव अर्जित किया। इसके बाद 'धवन-1' क्रायोजेनिक इंजन का विकास हुआ। 2021 में इसरो के साथ पहला निजी समझौता एक ऐतिहासिक कदम था। 18 नवंबर 2022 को 'विक्रम-एस' की सफल उड़ान ने पहली बार किसी भारतीय निजी रॉकेट को आसमान में उड़ते दिखाया। और अंततः विक्रम-1 — भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट — ने श्रीहरिकोटा से उड़ान भरकर वैश्विक मंच पर भारत की अंतरिक्ष शक्ति का परचम लहराया।

आगे की राह

चंदाना और डाका की यह यात्रा भारत के उन युवा इंजीनियरों और वैज्ञानिकों के लिए एक नई राह खोलती है जो सरकारी संस्थानों से परे अंतरिक्ष क्षेत्र में उद्यमिता का सपना देखते हैं। स्काईरूट अब विक्रम-2 और उससे आगे के मिशनों की तैयारी में है, और भारत का निजी अंतरिक्ष उद्योग एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

या यह एक टिकाऊ व्यावसायिक मॉडल की शुरुआत है जो वैश्विक लॉन्च बाज़ार में SpaceX और RocketLab से मुकाबला कर सके। 1.1 अरब डॉलर की वैल्यूएशन निवेशकों का भरोसा दिखाती है, लेकिन असली कसौटी वाणिज्यिक पेलोड की निरंतर डिलीवरी और प्रतिस्पर्धी लागत होगी — जो अभी सिद्ध होनी बाकी है।
RashtraPress
18 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

स्काईरूट एयरोस्पेस के संस्थापक कौन हैं?
स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना इसरो के दो पूर्व वैज्ञानिकों — पवन कुमार चंदाना (CEO) और नागा भरत डाका (COO) — ने 2018 में हैदराबाद में की थी। चंदाना आईआईटी खड़गपुर और डाका आईआईटी मद्रास के पूर्व छात्र हैं।
विक्रम-1 मिशन क्यों ऐतिहासिक है?
विक्रम-1 भारत का पहला सफल निजी ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च है, जिसने श्रीहरिकोटा से उड़ान भरी। इससे पहले 18 नवंबर 2022 को 'विक्रम-एस' सब-ऑर्बिटल उड़ान भर चुका था, लेकिन ऑर्बिटल सफलता भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र में एक नई पीढ़ी की शुरुआत मानी जा रही है।
स्काईरूट एयरोस्पेस की वैल्यूएशन कितनी है और इसमें किसने निवेश किया है?
आँकड़ों के अनुसार, स्काईरूट एयरोस्पेस की वैल्यूएशन 1.1 अरब डॉलर तक पहुँच चुकी है। कंपनी में फ्लिपकार्ट के सह-संस्थापक बिन्नी बंसल, ग्रीनको, और वैश्विक निवेशक जीआईसी तथा टेमासेक ने निवेश किया है।
पवन कुमार चंदाना का इसरो में क्या योगदान था?
पवन कुमार चंदाना ने तिरुवनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर में 6 वर्ष काम किया और जीएसएलवी मार्क-3 के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए उन्हें इसरो का इंटरनल इनोवेशन अवॉर्ड भी प्राप्त हुआ।
स्काईरूट एयरोस्पेस ने अब तक कौन-कौन से प्रमुख मील के पत्थर हासिल किए हैं?
2020 में 'रमन-1' इंजन का सफल परीक्षण, 'धवन-1' क्रायोजेनिक इंजन का विकास, 2021 में इसरो के साथ पहला निजी समझौता, 18 नवंबर 2022 को 'विक्रम-एस' की सफल उड़ान, और अंततः विक्रम-1 से भारत का पहला निजी ऑर्बिटल लॉन्च — ये सभी स्काईरूट की प्रमुख उपलब्धियाँ हैं।
राष्ट्र प्रेस
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