80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले में 'पीएम विश्वकर्मा' के 100 कारीगर होंगे विशेष अतिथि
सारांश
मुख्य बातें
सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय (एमएसएमई) ने 14 अगस्त 2026 को घोषणा की कि दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के 'पीएम विश्वकर्मा' योजना के 100 लाभार्थियों को लाल किले पर आयोजित 80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। ये कारीगर और शिल्पकार अपने जीवनसाथी या किसी साथी के साथ इस राष्ट्रीय आयोजन में भाग लेंगे।
कौन हैं ये विशेष अतिथि
आमंत्रित लाभार्थी 18 पारंपरिक व्यवसायों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनमें दर्जी, बढ़ई, सुनार, लोहार और ताला बनाने वाले कारीगर सहित अन्य परंपरागत पेशों से जुड़े लोग शामिल हैं। मंत्रालय के अनुसार, इनमें विभिन्न पारंपरिक व्यवसायों से जुड़ी महिला कारीगर भी शामिल हैं, जो योजना के महिला सशक्तीकरण के उद्देश्य को रेखांकित करती हैं। इन सभी लाभार्थियों ने योजना के तहत पंजीकरण, बुनियादी कौशल प्रशिक्षण और टूलकिट जैसी सुविधाओं का लाभ उठाया है।
समारोह में सम्मान और पहचान
मंत्रालय ने बताया कि समारोह के दौरान इन लाभार्थियों को स्मृति चिह्न भी प्रदान किए जाएंगे, जो उनके योगदान के प्रति सम्मान और सराहना का प्रतीक होंगे। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि लाल किले पर इन कारीगरों की उपस्थिति भारत की सांस्कृतिक विरासत में पारंपरिक शिल्पकारों के योगदान की औपचारिक मान्यता है।
पीएम विश्वकर्मा योजना: पृष्ठभूमि
'पीएम विश्वकर्मा' योजना सरकार की प्रमुख पहलों में से एक है, जिसे पारंपरिक व्यवसायों में लगे कारीगरों और शिल्पकारों को व्यापक सहायता देने के लिए शुरू किया गया था। इस योजना के तहत कौशल उन्नयन, आधुनिक उपकरण, वित्तीय सहायता, डिजिटल सुविधाएँ और बाज़ार से जुड़ाव प्रदान किया जाता है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, अब तक इस योजना के तहत 30 लाख पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों का पंजीकरण किया जा चुका है।
आम जनता और कारीगरों पर असर
यह योजना विशेष रूप से महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण को बढ़ावा देने, उनकी आजीविका के अवसरों को मजबूत करने और भारत की पारंपरिक हस्तकलाओं तथा सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने पर ध्यान केंद्रित करती है। इसका दीर्घकालिक उद्देश्य कारीगरों का सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण करना और टिकाऊ आजीविका के अवसर सुनिश्चित करना है।
आगे की राह
15 अगस्त 2026 को लाल किले पर इन 100 कारीगरों की उपस्थिति इस बात का संकेत है कि सरकार पारंपरिक शिल्प क्षेत्र को मुख्यधारा की राष्ट्रीय पहचान से जोड़ने की कोशिश कर रही है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस प्रतीकात्मक कदम के साथ-साथ योजना के क्रियान्वयन में भी गति आती है या नहीं।