डिजिटल अर्थव्यवस्था पर कराधान: निर्मला सीतारमण बोलीं — सावधानीपूर्वक अध्ययन जरूरी, निवेश पर असर देखना होगा
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 16 सितंबर 2026 को बेंगलुरु में स्पष्ट किया कि डिजिटल अर्थव्यवस्था पर कर लगाने के निर्णय लेते समय भारत, अन्य देशों और भविष्य में आने वाले निवेश पर पड़ने वाले प्रभावों का गहन एवं शांतचित्त अध्ययन अनिवार्य है। इंटरनेशनल टैक्स रिसर्च एंड एनालिसिस फाउंडेशन (ITRAF) द्वारा आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि क्लाउड सेवाओं, डिजिटल उत्पादों और डिजिटल सेवाओं की खपत से जुड़े मामलों में यह तय करना सरल नहीं है कि कर कहाँ और किस पर लगाया जाए।
जटिलता की स्वीकृति और सावधान दृष्टिकोण
सीतारमण ने कहा, 'इस जटिलता का शांतिपूर्वक अध्ययन किया जाना चाहिए। भारत पर इसके प्रभाव, अन्य देशों पर इसके प्रभाव और सबसे महत्वपूर्ण, भारत में भविष्य में आने वाले निवेश पर इसके असर का भी गहराई से अध्ययन होना चाहिए।' यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर डिजिटल कर ढाँचे को लेकर देशों के बीच तनाव बना हुआ है।
वित्त मंत्री ने यह भी रेखांकित किया कि इस मुद्दे को केवल भारत के कर राजस्व में संभावित नुकसान के नजरिए से नहीं देखना चाहिए, क्योंकि डिजिटल कारोबार पर कराधान व्यापक वैश्विक वार्ताओं का अभिन्न हिस्सा है।
वैश्विक टू-पिलर वार्ता में भारत का अनुभव
सीतारमण ने वैश्विक टू-पिलर टैक्स वार्ताओं में भारत की भागीदारी का उल्लेख करते हुए बताया कि इन वार्ताओं के दौरान भारत ने डिजिटल कंपनियों पर लगाए गए दो करों को वापस लिया था, ताकि उभरते हुए वैश्विक समझौते के प्रति विश्वसनीयता और भरोसा बढ़ाया जा सके। गौरतलब है कि यह निर्णय उस समय आया था जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के इक्वलाइजेशन लेवी को लेकर दबाव बढ़ रहा था।
भविष्य की कर नीति के प्रमुख विषय
वित्त मंत्री ने बताया कि आने वाले समय में कर नीति की चर्चा में कई जटिल विषय केंद्र में होंगे — जिनमें महत्वपूर्ण आर्थिक उपस्थिति (Significant Economic Presence), वर्चुअल परमानेंट एस्टैब्लिशमेंट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रोबोटिक्स, गिग इकोनॉमी, वैश्विक गतिशीलता, वर्चुअल डिजिटल एसेट्स, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर और डिजिटल लेनदेन में वस्तुओं एवं सेवाओं का वर्गीकरण शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि सरकार एक ऐसे संस्थागत तंत्र के लिए तैयार है जो यह स्पष्ट कर सके कि डिजिटल लेनदेन को जीएसटी और आयकर कानूनों के तहत वस्तु माना जाए या सेवा। इस संबंध में उन्होंने उद्योग जगत से ठोस सुझाव और प्रस्ताव भेजने का आग्रह किया।
जीएसटी 2.0 और उद्योग से अपेक्षाएँ
सीतारमण ने बताया कि जीएसटी परिषद की अगली बैठक 7 अक्टूबर को होगी, जिसमें जीएसटी 2.0 के तहत प्रक्रिया संबंधी सुधारों — विशेषकर ई-इनवॉइसिंग से जुड़े मुद्दों — पर विचार किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि पिछली बैठक में दरों के युक्तिकरण पर ध्यान केंद्रित था, जबकि प्रक्रिया सुधारों को इस बार की एजेंडे में रखा गया है।
वित्त मंत्री ने कर विशेषज्ञों, उद्योग संगठनों और शोधकर्ताओं को सलाह दी कि वे केवल कम कर दरों, छूटों और रियायतों की माँग तक सीमित न रहें, बल्कि उन प्रावधानों की पहचान करने में भी सहयोग दें जो अब कर प्रणाली के लिए प्रासंगिक नहीं रहे — भले ही वर्तमान में उनसे उद्योग को लाभ मिल रहा हो। उन्होंने कहा, 'परामर्श का अर्थ केवल सभी को अपना पक्ष रखने का अवसर देना नहीं होना चाहिए। यह तथ्यों, अनुभवों और विचारों पर आधारित एक वास्तविक प्रक्रिया होनी चाहिए।'
एफडीआई विस्तार और गिफ्ट सिटी की भूमिका
वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार ने 2014 के बाद से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की सीमाओं का लगातार विस्तार किया है और अब अधिकांश निवेश स्वचालित मार्ग से आ रहे हैं — केवल सुरक्षा से जुड़े कुछ क्षेत्रों में ही प्रतिबंध लागू हैं। उन्होंने 'चीन प्लस वन' रणनीति का उल्लेख करते हुए कहा कि वैश्विक निवेशक अपनी आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाने की कोशिश कर रहे हैं और भारत की मजबूत व्यापक आर्थिक स्थिति उन्हें आकर्षित कर रही है।
सीतारमण ने गिफ्ट सिटी की भूमिका को भी रेखांकित किया और कहा कि यह ऑफशोर पूंजी को भारत तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है — विशेषकर एमआरओ (रखरखाव, मरम्मत एवं ओवरहाल), जहाज निर्माण, जहाज मरम्मत और फिनटेक क्षेत्रों में। आने वाले समय में डिजिटल कर नीति की स्पष्टता इन क्षेत्रों में निवेश की गति को और तेज कर सकती है।