UPI MDR पर नितिन कामथ का समर्थन, ब्रोकिंग सेक्टर के लिए अलग व्यवस्था की माँग
सारांश
मुख्य बातें
जेरोधा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी नितिन कामथ ने 16 सितंबर को व्यक्ति-से-व्यापारी (P2M) UPI भुगतान पर लागू किए गए मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि डिजिटल भुगतान के इस स्तर तक पहुँचने के बाद यह कदम अपरिहार्य था, हालाँकि ब्रोकिंग और निवेश जैसे क्षेत्रों के लिए इस ढाँचे में विशेष प्रावधान होने चाहिए।
MDR का समर्थन क्यों
कामथ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर एक पोस्ट में कहा, 'मुझे लगता है कि UPI पर MDR किसी न किसी समय लागू होना ही था, खासकर तब जब UPI का उपयोग इतने व्यापक स्तर पर हो चुका है। इससे अधिक प्रतिस्पर्धा भी देखने को मिल सकती है।' उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि वर्तमान में UPI बाज़ार का 95% से अधिक हिस्सा केवल तीन ऐप्स के पास है और नया शुल्क ढाँचा इस एकाग्रता को कम कर सकता है।
गौरतलब है कि UPI ने भारत में डिजिटल भुगतान को जन-जन तक पहुँचाया है, लेकिन इसके संचालन की लागत वहन करने का प्रश्न लंबे समय से बहस का विषय रहा है। MDR का यह कदम ऐसे समय में आया है जब सरकार डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम को टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी बनाने पर ध्यान दे रही है।
ब्रोकिंग सेक्टर के लिए चुनौती
कामथ ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित MDR संरचना निवेश और ब्रोकिंग कारोबार के लिए उपयुक्त नहीं है। उनके अनुसार, ब्रोकर्स के पास यह सुनिश्चित करने का कोई तरीका नहीं होता कि UPI के ज़रिए उनके खातों में आया पैसा अंततः किसी ट्रेड में लगेगा ही। ग्राहक फंड ट्रांसफर करने के बाद ट्रेड करें, यह ब्रोकर्स के वश में नहीं होता।
उन्होंने एक ठोस उदाहरण देते हुए समझाया: यदि 10,000 ग्राहक एक महीने में ₹2 लाख के 50-50 UPI ट्रांसफर करें और बाद में कोई ट्रेड न करें, तो प्रस्तावित MDR व्यवस्था के तहत किसी ब्रोकर पर लगभग ₹2 करोड़ का अतिरिक्त खर्च आ सकता है — बिना किसी अतिरिक्त राजस्व के।
त्रैमासिक निपटान नियमों का पेच
कामथ ने त्रैमासिक निपटान (Quarterly Settlement — QS) नियमों का भी उल्लेख किया। इन नियमों के तहत ब्रोकर्स को हर महीने या तिमाही में ग्राहकों के अप्रयुक्त फंड उनके बैंक खातों में वापस भेजने होते हैं। ग्राहक अक्सर यह राशि फिर से अपने ब्रोकिंग खातों में जमा करते हैं और ऐसे आधे से अधिक ट्रांसफर UPI के माध्यम से होते हैं।
इस चक्र में बार-बार फंड ट्रांसफर होने पर ब्रोकर्स को UPI शुल्क देना पड़ सकता है, जबकि उनके राजस्व में कोई वृद्धि नहीं होती। यह एक संरचनात्मक समस्या है जो ब्रोकिंग उद्योग की विशिष्ट प्रकृति से उपजती है।
कामथ की सिफारिश
कामथ का मानना है कि UPI पर MDR लागू करने के पीछे का तर्क मज़बूत है और इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, लेकिन निवेश व ब्रोकिंग जैसे क्षेत्रों की विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अलग व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, यदि ऐसा नहीं किया गया तो डिजिटल भुगतान की बढ़ती लागत उद्योग पर अनावश्यक बोझ बन जाएगी।
यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि नीति-निर्माता ब्रोकिंग सेक्टर की इन चिंताओं को MDR के अंतिम ढाँचे में किस हद तक समायोजित करते हैं।