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UPI पर MDR टैक्स: विपक्ष का आरोप — अमेरिकी कंपनियों को फायदा पहुँचाने की साज़िश

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UPI पर MDR टैक्स: विपक्ष का आरोप — अमेरिकी कंपनियों को फायदा पहुँचाने की साज़िश

सारांश

यूपीआई पर MDR लागू करने का प्रस्ताव सिर्फ एक तकनीकी नीति बदलाव नहीं — यह डिजिटल भारत के उस वादे पर सवाल है जो शून्य-शुल्क भुगतान पर टिका था। विपक्ष का 'अमेरिकी साम्राज्यवाद' वाला तर्क भले ही राजनीतिक हो, लेकिन करोड़ों छोटे व्यापारियों और उपभोक्ताओं की चिंता बिल्कुल वास्तविक है।

मुख्य बातें

₹2,000 से अधिक के मर्चेंट यूपीआई ट्रांजैक्शन पर 0.4 फीसदी MDR लागू करने का प्रस्ताव विवाद में है।
APCC, कांग्रेस, RJD और NCP (शरद पवार गुट) ने सरकार से इस निर्णय को वापस लेने की माँग की।
RJD सांसद मनोज झा ने इसे 'अमेरिकी साम्राज्यवाद' से जोड़ा; कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने गूगल और वालमार्ट का नाम लिया।
NCP प्रवक्ता क्लाइड क्रास्टो ने कहा — दुकानदार यह बोझ अंततः ग्राहक पर डालेगा।
केंद्र सरकार ने अब तक इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक अंतिम निर्णय सार्वजनिक नहीं किया है।

यूपीआई ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने के प्रस्ताव के विरुद्ध 16 सितंबर को विपक्षी दलों ने एकजुट होकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। आंध्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी (APCC), राष्ट्रीय जनता दल (RJD), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) के नेताओं ने आरोप लगाया कि यह कदम आम उपभोक्ताओं और छोटे व्यापारियों पर आर्थिक बोझ डालेगा तथा अमेरिकी तकनीकी कंपनियों के हितों की पूर्ति करेगा। सभी नेताओं ने सरकार से इस निर्णय को तत्काल वापस लेने की माँग की।

क्या है विवाद का केंद्र

प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, ₹2,000 से अधिक के मर्चेंट यूपीआई ट्रांजैक्शन पर 0.4 फीसदी का शुल्क लगाया जा सकता है। यूपीआई को वर्षों तक शून्य-शुल्क प्रणाली के रूप में प्रचारित किया गया था और सरकार ने शुरुआती दौर में स्पष्ट किया था कि MDR के तहत इस तरह के लेनदेन पर कोई प्रभार नहीं लगेगा। विपक्ष का कहना है कि अब इस नीति को पलटना डिजिटल भुगतान की दिशा में की गई प्रगति को नुकसान पहुँचा सकता है।

नेताओं की प्रतिक्रियाएँ

APCC के वाइस प्रेसिडेंट गुरुनाधम ने कहा, 'शहरों व मेट्रो इलाकों में लोग अब चाय-कॉफी के लिए भी यूपीआई से पेमेंट करने के आदी हो गए हैं। शुरुआत में भारत सरकार ने कहा था कि ऐसे ट्रांजेक्शन पर कोई चार्ज नहीं लगेगा। अब सरकार कारोबारियों और आम लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ा रही है। इस फैसले पर सरकार को दोबारा विचार करना चाहिए।'

RJD सांसद मनोज झा ने इस कदम को 'अमेरिकी साम्राज्यवाद' से जोड़ते हुए कहा, 'लोगों को डिजिटल ट्रांजैक्शन अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप लोग कैश ट्रांजेक्शन से दूर होने लगे थे। अब आप यह शुरू कर रहे हैं और हम जानते हैं कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं। यह आपका अपना फैसला नहीं है।' उन्होंने चेतावनी दी कि इससे लोग फिर से नकद लेनदेन की ओर लौट सकते हैं।

NCP (शरद पवार गुट) के राष्ट्रीय प्रवक्ता क्लाइड क्रास्टो ने कहा, 'अगर कोई व्यक्ति कुछ खरीदता है, तो दुकानदार को टैक्स देना होगा। कौन सा दुकानदार अपनी जेब से यह टैक्स देगा? कहीं न कहीं, वह इस बोझ को उस ग्राहक पर डालने का तरीका ढूंढ ही लेगा जो खरीदारी कर रहा है।' उन्होंने सरकार से 'लोगों के विरुद्ध काम करना बंद' करने का आह्वान किया।

कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने सीधे अमेरिकी कंपनियों का नाम लेते हुए आरोप लगाया, 'भाजपा एक तरफ डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा दे रही थी और अब आम आदमी की जेब काटने की तैयारी कर रही है। अमेरिका की कंपनी गूगल, यूपीआई वालमार्ट को फायदा पहुँचाने के लिए यूपीआई ट्रांजेक्शन पर टैक्स लगाने की कवायद की जा रही है।'

आम जनता और व्यापारियों पर असर

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि MDR लागू होता है, तो इसका सबसे अधिक असर छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों और उन उपभोक्ताओं पर पड़ेगा जो रोज़मर्रा की खरीदारी के लिए यूपीआई का उपयोग करते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब भारत में यूपीआई लेनदेन की संख्या लगातार नए रिकॉर्ड बना रही है और डिजिटल भुगतान को वित्तीय समावेश का एक अहम स्तंभ माना जा रहा है।

क्या होगा आगे

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने अभी तक इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक अंतिम निर्णय सार्वजनिक नहीं किया है। विपक्ष की माँग है कि सरकार संसद में इस विषय पर चर्चा करे और छोटे व्यापारियों व उपभोक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते हुए MDR प्रस्ताव को वापस ले। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक और नीतिगत बहस तेज़ होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसके पीछे की नीतिगत चिंता वैध है — यूपीआई को शून्य-शुल्क के वादे पर खड़ा किया गया था और अब उस आधार को बदलना डिजिटल भुगतान की व्यापक स्वीकार्यता को नुकसान पहुँचा सकता है। छोटे व्यापारी, जो पहले से कम मार्जिन पर काम करते हैं, MDR का बोझ उपभोक्ता पर डालेंगे — यह आर्थिक तर्क निर्विवाद है। मुख्यधारा की कवरेज जो अक्सर चूकती है वह यह है कि यह बहस केवल एक शुल्क की नहीं, बल्कि डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के स्वामित्व और नियंत्रण की है। बिना पारदर्शी परामर्श प्रक्रिया के लिया गया ऐसा निर्णय उस विश्वास को तोड़ता है जिस पर भारत का फिनटेक पारिस्थितिकी तंत्र टिका है।
RashtraPress
16 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

UPI पर MDR टैक्स क्या है और इसे क्यों लागू करने की बात हो रही है?
मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) वह शुल्क है जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने पर व्यापारी से लिया जाता है। प्रस्ताव के अनुसार ₹2,000 से अधिक के यूपीआई मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर 0.4 फीसदी MDR लगाया जा सकता है, जो अब तक शून्य था।
विपक्ष UPI MDR के विरुद्ध क्यों है?
विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकार ने शुरुआत में वादा किया था कि यूपीआई ट्रांजैक्शन पर कोई शुल्क नहीं लगेगा। उनका आरोप है कि यह बदलाव आम उपभोक्ताओं और छोटे व्यापारियों पर बोझ डालेगा तथा अमेरिकी तकनीकी कंपनियों को लाभ पहुँचाएगा।
MDR लागू होने पर आम उपभोक्ता पर क्या असर पड़ेगा?
NCP प्रवक्ता क्लाइड क्रास्टो के अनुसार, दुकानदार यह शुल्क अपनी जेब से नहीं देगा — वह इसे उत्पाद की कीमत में जोड़कर ग्राहक से वसूलेगा। इससे रोज़मर्रा की खरीदारी महँगी हो सकती है।
क्या केंद्र सरकार ने UPI MDR पर कोई अंतिम निर्णय लिया है?
अभी तक केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक अंतिम निर्णय सार्वजनिक नहीं किया है। विपक्ष माँग कर रहा है कि इस मुद्दे पर संसद में चर्चा हो और प्रस्ताव वापस लिया जाए।
RJD सांसद मनोज झा ने UPI MDR को 'अमेरिकी साम्राज्यवाद' क्यों कहा?
मनोज झा का तर्क है कि यह निर्णय भारत के अपने हितों के बजाय विदेशी — विशेषकर अमेरिकी — तकनीकी कंपनियों के दबाव में लिया जा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे लोग डिजिटल भुगतान छोड़कर फिर से नकद की ओर लौट सकते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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