UPI पर MDR टैक्स: विपक्ष का आरोप — 'अमेरिकी कंपनियों को फायदा पहुँचाने की साजिश'
सारांश
मुख्य बातें
यूपीआई (UPI) भुगतान पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने के प्रस्ताव के विरोध में कई विपक्षी दलों के नेता एकजुट हो गए हैं। आंध्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी (APCC), राष्ट्रीय जनता दल (RJD), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP-SP) और कांग्रेस के नेताओं ने केंद्र की भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार पर आरोप लगाया है कि यह कदम अमेरिकी तकनीकी कंपनियों को लाभ पहुँचाने के लिए उठाया जा रहा है। इन नेताओं ने इस आदेश को तत्काल वापस लेने की माँग की है।
विरोध का केंद्र: क्या है MDR विवाद
प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार ₹2,000 से अधिक के व्यापारिक UPI लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत चार्ज लागू किया जा सकता है। वर्तमान में UPI ट्रांजेक्शन पर शून्य MDR लागू है, और सरकार ने डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इसे मुफ़्त रखा था। आलोचकों का कहना है कि यह नीतिगत बदलाव उसी प्रतिबद्धता के विरुद्ध है।
गौरतलब है कि भारत में UPI के ज़रिये प्रतिमाह अरबों लेनदेन होते हैं और देश की डिजिटल भुगतान क्रांति की रीढ़ यही प्रणाली है। ऐसे में किसी भी शुल्क का बोझ सीधे करोड़ों व्यापारियों और उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।
विपक्षी नेताओं के तीखे बयान
आंध्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष गुरुनाधम ने कहा, 'भारत सरकार ने काफी समय पहले UPI पेमेंट सिस्टम शुरू किया था। शहरों व मेट्रो इलाकों में लोग अब चाय-कॉफी के लिए भी UPI से पेमेंट करने के आदी हो गए हैं। शुरुआत में सरकार ने कहा था कि ऐसे ट्रांजेक्शन पर कोई चार्ज नहीं लगेगा। अब सरकार कारोबारियों और आम लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ा रही है। इस फैसले पर सरकार को दोबारा विचार करना चाहिए।'
RJD सांसद मनोज झा ने इस मुद्दे को 'अमेरिकी साम्राज्यवाद' से जोड़ते हुए कहा, 'लोगों को डिजिटल ट्रांजैक्शन अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप लोग कैश ट्रांजेक्शन से दूर होने लगे थे। अब आप यह शुरू कर रहे हैं और हम जानते हैं कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं। यह आपका अपना फैसला नहीं है।' उन्होंने आगाह किया कि यह कदम डिजिटल लेनदेन को वापस शुरुआती स्थिति में ला सकता है और लोग फिर से नकदी को प्राथमिकता देने लग सकते हैं।
आम उपभोक्ता पर असर
NCP (SP) के राष्ट्रीय प्रवक्ता क्लाइड क्रास्टो ने कहा, 'अगर कोई व्यक्ति कुछ खरीदता है, तो दुकानदार को टैक्स देना होगा। कौन सा दुकानदार अपनी जेब से यह टैक्स देगा? वह इस बोझ को उस ग्राहक पर डालने का तरीका ढूंढ ही लेगा।' यह आशंका व्यावहारिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है — MDR का बोझ व्यापारी से होते हुए अंततः उपभोक्ता की जेब तक पहुँचता है।
यह ऐसे समय में आया है जब भारत में छोटे और मझोले व्यापारी पहले से ही बढ़ती लागत और मंदी की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि UPI पर किसी भी चार्ज से किराना दुकानों, ठेले-खोमचे और छोटे रेस्तरौं जैसे व्यवसाय सबसे पहले प्रभावित होंगे।
अमेरिकी कंपनियों के हित का आरोप
कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने सीधे आरोप लगाते हुए कहा, 'भाजपा एक तरफ डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा दे रही थी और अब आम आदमी की जेब काटने की तैयारी कर रही है। अमेरिका की कंपनी Google और Walmart को फायदा पहुँचाने के लिए UPI ट्रांजेक्शन पर टैक्स लगाने की कवायद की जा रही है।' यह आरोप उल्लेखनीय है क्योंकि Google Pay और PhonePe (जो Walmart की अनुषंगी Flipkart की कंपनी है) भारत के UPI बाज़ार में प्रमुख खिलाड़ी हैं। हालाँकि MDR से इन कंपनियों को होने वाले प्रत्यक्ष लाभ का कोई आधिकारिक विवरण अभी सामने नहीं आया है।
आगे क्या होगा
केंद्र सरकार की ओर से अभी तक इन आरोपों का कोई आधिकारिक खंडन या स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। विपक्षी दलों ने संसद में इस मुद्दे को उठाने और जन-आंदोलन की चेतावनी भी दी है। यदि MDR प्रस्ताव को अंतिम रूप दिया जाता है, तो भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) और वित्त मंत्रालय को इसकी रूपरेखा स्पष्ट करनी होगी। डिजिटल भुगतान क्षेत्र के जानकारों की नज़र इस नीतिगत निर्णय पर टिकी है।