UPI शुल्क विवाद: सीतारमण ने जयराम रमेश के आरोपों को नकारा, MDR केवल व्यापारियों पर लागू
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 6 अगस्त 2026 को वरिष्ठ कांग्रेस नेता जयराम रमेश के उन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया, जिनमें दावा किया गया था कि कराधान एवं अन्य विधियाँ (संशोधन) विधेयक, 2026 के ज़रिए यूपीआई लेनदेन को शुल्क के दायरे में लाया जा रहा है। सीतारमण ने स्पष्ट किया कि मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) केवल व्यापारियों पर लागू होता है, न कि आम उपभोक्ताओं या अंतिम उपयोगकर्ताओं पर।
मुख्य घटनाक्रम
वित्त मंत्री सीतारमण ने नई दिल्ली में पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि रमेश को 'अफवाह फैलाने से पहले' तथ्यों की जाँच करनी चाहिए। उन्होंने कहा, 'MDR केवल व्यापारियों पर लागू होता है, न कि अंतिम उपयोगकर्ताओं या ग्राहकों पर। इससे बैंकों और फिनटेक कंपनियों को बुनियादी ढाँचे, नवाचार और सुरक्षा में अधिक निवेश करने में मदद मिलेगी। यूपीआई के सभी उपयोगकर्ता इस निवेश का लाभ उठाएंगे।'
यह ऐसे समय में आया है जब संसद के मानसून सत्र में विपक्ष सरकार की डिजिटल भुगतान नीतियों पर लगातार दबाव बना रहा है।
कांग्रेस की आपत्ति और रमेश के तर्क
इससे पहले, जयराम रमेश ने आरोप लगाया था कि प्रस्तावित संशोधन उस वैधानिक गारंटी को समाप्त कर देता है जिसके तहत यूपीआई लेनदेन अब तक शुल्क-मुक्त रहे हैं। उनका कहना था कि इससे भविष्य में डिजिटल भुगतानों पर MDR लगाने का रास्ता खुल जाएगा। रमेश ने सरकार के 'आर्थिक टिकाऊपन' वाले तर्क को भी अस्वीकार किया।
कांग्रेस नेता ने भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा 2025-26 में केंद्र सरकार को हस्तांतरित ₹2.86 लाख करोड़ के अधिशेष का हवाला देते हुए तर्क दिया कि व्यापारियों या उपभोक्ताओं पर कोई अतिरिक्त बोझ डाले बिना डिजिटल भुगतान बुनियादी ढाँचे को समर्थन देने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं।
सरकार की प्रतिक्रिया
वित्त मंत्री सीतारमण ने कांग्रेस की संसद के बाहर इस मुद्दे को उठाने की रणनीति पर भी कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, 'यदि आपकी पार्टी विधेयक पेश होने के समय लोकसभा और राज्यसभा में रचनात्मक रूप से भाग लेती, तो इन सभी मुद्दों पर सदन में चर्चा हो सकती थी।' गौरतलब है कि यह टिप्पणी विपक्ष की संसदीय भागीदारी पर एक सीधा प्रहार है।
आम जनता पर असर
यदि MDR केवल व्यापारियों पर ही लागू रहता है, जैसा कि सरकार का दावा है, तो करोड़ों आम यूपीआई उपयोगकर्ताओं के लिए लेनदेन पहले की तरह निःशुल्क बने रहेंगे। हालाँकि, आलोचकों का कहना है कि व्यापारियों पर MDR का बोझ अंततः उत्पादों और सेवाओं की कीमतों के ज़रिए उपभोक्ताओं तक पहुँच सकता है।
क्या होगा आगे
कराधान एवं अन्य विधियाँ (संशोधन) विधेयक, 2026 अभी संसद में विचाराधीन है। इस विधेयक पर राजनीतिक बहस के तेज़ होने की संभावना है, विशेष रूप से यह देखते हुए कि भारत में यूपीआई लेनदेन की संख्या हर महीने अरबों में है और डिजिटल भुगतान करोड़ों नागरिकों की दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।