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₹2,000 से अधिक के कमर्शियल UPI भुगतान पर MDR शुल्क को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, अधिसूचना रद्द करने की माँग

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₹2,000 से अधिक के कमर्शियल UPI भुगतान पर MDR शुल्क को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, अधिसूचना रद्द करने की माँग

सारांश

₹2,000 से अधिक के कमर्शियल UPI लेनदेन पर 0.4% MDR शुल्क लगाने का सरकारी फैसला अब सुप्रीम कोर्ट में है। वकील अंजन दत्ता की याचिका अधिसूचना को असंवैधानिक बताती है, जबकि BJP के अनुराग ठाकुर ने बचाव किया और कांग्रेस ने विरोध जताया। डिजिटल इंडिया की नींव पर यह कानूनी लड़ाई निर्णायक मोड़ ला सकती है।

मुख्य बातें

वकील अंजन दत्ता ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर ₹2,000 से अधिक के कमर्शियल UPI भुगतान पर MDR शुल्क को चुनौती दी।
14 दिसंबर की अधिसूचना और 15 सितंबर से लागू MDR फ्रेमवर्क को असंवैधानिक घोषित करने की माँग।
कुछ मर्चेंट UPI लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लागू किया गया है; ₹2,000 तक के लेनदेन शुल्क-मुक्त।
BJP सांसद अनुराग ठाकुर ने फैसले का बचाव किया; कांग्रेस समेत विपक्ष ने विरोध कर वापसी की माँग की।
आलोचकों का कहना है कि शुल्क का बोझ अंततः आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।

सर्वोच्च न्यायालय में 16 सितंबर 2026 को एक याचिका दायर कर केंद्र सरकार के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें ₹2,000 से अधिक के कमर्शियल यूपीआई (UPI) भुगतान पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) शुल्क लगाने का प्रावधान किया गया है। याचिकाकर्ता ने सरकार की संबंधित अधिसूचना और नवीनतम MDR फ्रेमवर्क को असंवैधानिक घोषित करने तथा रद्द करने की माँग की है।

याचिका में क्या है मुख्य तर्क

वकील अंजन दत्ता द्वारा दायर इस याचिका में कहा गया है कि केंद्र सरकार ने पर्याप्त कानूनी आधार और व्यापक जनहित पर विचार किए बिना यह निर्णय लिया है। याचिकाकर्ता के अनुसार, 14 दिसंबर को जारी अधिसूचना और 15 सितंबर से लागू किए गए MDR फ्रेमवर्क दोनों को निरस्त किया जाना चाहिए।

याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि यूपीआई को मूल रूप से देश में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने और नागरिकों को कम लागत वाली भुगतान सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विकसित किया गया था। कथित तौर पर ऐसे में इस पर शुल्क लगाना डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहित करने की मूल नीति के विपरीत है।

MDR फ्रेमवर्क क्या है और किन लेनदेन पर असर

₹2,000 से अधिक के कुछ मर्चेंट यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लागू किए जाने का प्रावधान किया गया है। गौरतलब है कि यह शुल्क केवल कमर्शियल यानी व्यावसायिक श्रेणी के लेनदेन पर लागू है — व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) भुगतान इसके दायरे से बाहर बताए जा रहे हैं।

यह ऐसे समय में आया है जब भारत में यूपीआई लेनदेन की मात्रा लगातार नए रिकॉर्ड बना रही है और छोटे व्यापारियों से लेकर बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठान तक इस प्लेटफॉर्म पर निर्भर हो चुके हैं।

भाजपा का बचाव — अनुराग ठाकुर का पक्ष

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद अनुराग ठाकुर ने सरकार के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था दुनिया भर में मिसाल बन चुकी है। ठाकुर ने कहा, 'भारत के डिजिटल ट्रांज़ेक्शन मॉडल की दुनिया भर में चर्चा होती है। बड़े देशों के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भारत आकर देखते हैं कि कैसे चाय बेचने वाला, सड़क किनारे का विक्रेता और छोटे व्यापारी आसानी से डिजिटल भुगतान स्वीकार कर रहे हैं।'

ठाकुर ने यह भी स्पष्ट किया कि ₹2,000 तक के लेनदेन पर कोई शुल्क नहीं है और ₹2,000 से अधिक के अधिकांश लेनदेन भी शुल्क के दायरे से बाहर रहेंगे। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) पर इस मुद्दे को लेकर जनता को भ्रमित करने का आरोप लगाया और कहा कि पूरी रिपोर्ट का गंभीरता से अध्ययन किया जाना चाहिए।

विपक्ष का विरोध और आम जनता पर असर

कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने सरकार के इस फैसले का कड़ा विरोध किया है और इसे वापस लेने की माँग की है। आलोचकों का कहना है कि यह शुल्क अंततः आम उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ डालेगा, क्योंकि व्यापारी इस लागत को वस्तु और सेवाओं की कीमतों में जोड़ सकते हैं।

विशेषज्ञों के एक वर्ग का मानना है कि यह कदम छोटे और मझोले व्यापारियों को यूपीआई से दूर कर नकद लेनदेन की ओर वापस धकेल सकता है, जो डिजिटल इंडिया के दृष्टिकोण के लिए प्रतिकूल होगा।

आगे क्या होगा

सर्वोच्च न्यायालय अब इस याचिका पर सुनवाई का निर्धारण करेगा। यदि न्यायालय प्रारंभिक सुनवाई में केंद्र सरकार को नोटिस जारी करता है, तो सरकार को अपना जवाब दाखिल करना होगा। इस मामले का निष्कर्ष भारत में डिजिटल भुगतान ढाँचे की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि नीतिगत पहचान की भी है — भारत ने शून्य-MDR को अपनी डिजिटल सफलता की आधारशिला के रूप में वैश्विक मंचों पर प्रचारित किया है। अब उसी नींव में बदलाव करने से न केवल व्यापारियों में असमंजस पैदा होगा, बल्कि भारत की 'सस्ती डिजिटल अर्थव्यवस्था' की ब्रांडिंग भी कमज़ोर पड़ेगी। सरकार का तर्क कि अधिकांश लेनदेन शुल्क-मुक्त रहेंगे, आश्वस्त करने वाला है, लेकिन 0.4% की दर के दीर्घकालिक प्रभाव — खासकर छोटे व्यापारियों के लिए — का स्वतंत्र आकलन अभी सामने नहीं आया है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला देश की डिजिटल भुगतान नीति की दिशा पर दशकों तक असर डाल सकता है।
RashtraPress
16 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

₹2,000 से अधिक के UPI भुगतान पर MDR शुल्क क्या है?
केंद्र सरकार ने ₹2,000 से अधिक के कुछ कमर्शियल (मर्चेंट) UPI लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) शुल्क लागू किया है। यह शुल्क 15 सितंबर से लागू MDR फ्रेमवर्क के तहत आता है और व्यक्ति-से-व्यक्ति भुगतान पर लागू नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में क्या माँगा गया है?
वकील अंजन दत्ता द्वारा दायर याचिका में 14 दिसंबर की सरकारी अधिसूचना और 15 सितंबर से लागू MDR फ्रेमवर्क को असंवैधानिक घोषित कर रद्द करने की माँग की गई है। याचिका में तर्क है कि यह निर्णय पर्याप्त कानूनी आधार और जनहित पर विचार किए बिना लिया गया।
क्या ₹2,000 से कम के UPI लेनदेन पर कोई शुल्क है?
नहीं, भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर के अनुसार ₹2,000 तक के लेनदेन पर कोई शुल्क नहीं लगेगा। उन्होंने यह भी कहा कि ₹2,000 से अधिक के अधिकांश लेनदेन भी शुल्क के दायरे से बाहर रहेंगे।
विपक्ष इस फैसले का विरोध क्यों कर रहा है?
कांग्रेस समेत विपक्षी दलों का कहना है कि यह शुल्क डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने की मूल नीति के विपरीत है और इसका बोझ अंततः आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। उन्होंने सरकार से इस फैसले को वापस लेने की माँग की है।
इस मामले में आगे क्या होगा?
सर्वोच्च न्यायालय याचिका पर सुनवाई की तारीख तय करेगा। यदि प्रारंभिक सुनवाई में केंद्र सरकार को नोटिस जारी होता है, तो सरकार को अपना जवाब दाखिल करना होगा। इस मामले का फैसला भारत की डिजिटल भुगतान नीति की दिशा पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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